धरम पाजी: गाँव से बॉलीवुड तक एक दिल छू लेने वाली यात्रा
धर्मेन्द्र सिंह देओल पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे हैं और डॉक्टरों की निगरानी में आराम कर रहे हैं। उनके बेटे और अभिनेता सनी देओल ने सोशल मीडिया पर कहा - “पापा अब बेहतर महसूस कर रहे हैं। आपकी दुआओं ने चमत्कार किया है। हम सब आभारी हैं।” वहीं अभिनेत्री हेमा मालिनी ने भी कहा -“धरम जी हमेशा से मजबूत रहे हैं। उन्हें आप सबके प्रेम और आशीर्वाद की जरूरत है। वह जल्द स्वस्थ होकर फिर मुस्कुराएंगे।”परिवार की ओर से लगातार सकारात्मक संदेश दिए जा रहे हैं, और फैंस देशभर से दुआएँ भेज रहे हैं।
- सादगी, देसीपन और दिल से जुड़े अभिनय की मिसाल बने धर्मेन्द्र – जिन्होंने सिर्फ कैमरे पर नहीं, बल्कि जीवन के हर फ्रेम में दर्शकों का दिल जीता।
धरम पाजी – सिनेमा का वो सफर जो दिल से शुरू होकर दिल में बस गया
जाड़ों की सुबह थी जब पंजाब के लुधियाना ज़िले के साहनेवाल (नजराली) गाँव में एक चौदह-सत्रह साल का लड़का अपने किताबों में डूबा बैठा था। वह था धर्मेन्द्र सिंह देओल – एक सादा परिवार में पला-बढ़ा किसान पुत्र, जिसके पिता गाँव के सरकारी स्कूल के शिक्षक और माँ गृहिणी थीं। फिल्मों का जुनून उसकी रग-रग में बसता था। गाँव में सिनेमा घर मुश्किल से होते थे, लेकिन धर्मेन्द्र के दिल ने हमेशा ही बड़े सपने देखे थे। वह अक्सर रेल की पटरी पर बैठकर यह सोचता कि कब मुंबई (तब बॉम्बे) जाऊंगा और किस्मत चमकेगी। खुद कहते हैं – “मुझे लगता था कि पर्दे पर जो लोग हैं, वो किसी और दुनिया के हैं, और मैं उसी दुनिया में जाना चाहता था।” इस उम्मीद और जज़्बे ने ही आखिरकार उस गाँव के उस लड़के को फिल्मों की दुनिया तक पहुंचाया।
मुंबई की पहली सुबह – संघर्ष और उम्मीदें
1958 में धर्मेन्द्र ने फिल्मफेयर के एक बड़े टैलेंट कॉन्टेस्ट में पुरस्कार जीता, और उसे मुंबई आने का मौका मिला। गाँव का सीधे-सादे युवा मुंबई की चमक-दमक में आया, जेब में सिर्फ आत्मविश्वास। शुरुआत में संघर्ष की कहानियाँ एक से बढ़कर एक थीं। स्टूडियो के बाहर घंटों इंतज़ार करता, चलने वाली फिल्मों के पूरे बोर्ड देखे, कभी किसी फिल्म के सेट पर छोटे-मोटे काम किया और कई ऑडिशन में रिजेक्ट भी रहा। बावजूद इसके, हिम्मत नहीं हारी। सन 1960 में उसे अरुण हिंगोरानी की फिल्म “दिल भी तेरा हम भी तेरे” में मुख्य अभिनेता की भूमिका मिली। हालांकि यह फिल्म बड़ी हिट नहीं रही, पर धर्मेन्द्र की मुस्कान, सादगी और देसी अंदाज़ सबकी नज़रों में उतर गए। धीरे-धीरे फिल्म दर फिल्म काम करते-करते उन्होंने साबित कर दिया कि मेहनत और ईमानदारी कभी व्यर्थ नहीं जाती।
‘फूल और पत्थर’ से ‘शोले’ तक – सफलता की सीढ़ियाँ
1966 में धर्मेन्द्र के करियर में एक बड़ा मोड़ आया जब उनका “फूल और पत्थर” रिलीज़ हुआ। यह फिल्म सुपरहिट रही और धर्मेन्द्र को रोमांटिक हीरो के साथ-साथ एक्शन हीरो के रूप में भी स्वीकार्यता मिली। 1970 के दशक में सफलता की बहार आई: “चुपके चुपके” (1975) में हास्य की कसकेदार भूमिका निभाई, और उसी साल “शोले” ने भारत में सिनेमा का इतिहास रचा। वीरू के रूप में धर्मेन्द्र की जोड़ी अमिताभ बच्चन के जय के साथ आज भी बेशुमार प्यार से याद की जाती है। इन फिल्मों में उनकी गंभीरता, संवादों की गहराई और देसीपन ने दर्शकों के दिल जीत लिए।
इसके बाद तो सफलता ने उनका पीछा ही नहीं छोड़ा – “अनुपमा”, “मेरा गाँव मेरा देश”, “सत्यकाम”, “राजा जानी”, “धरम वीर”, “प्रतिज्ञा”, “शालीमार” और कई सारी सुपरहिट फिल्में लगातार आईं। प्रत्येक भूमिका में धर्मेन्द्र अलग अंदाज़ लेकर सामने आते रहे: कभी वो देहाती नौजवान बने, तो कभी क्रांतिकारी इंस्पेक्टर; कभी आम इंसान की तरह दुख बांटते दिखे, तो कभी मनोरंजन की देसी मसाला भर देते।
धरम पाजी – सादगी, आकर्षण और देसीपन का प्रतीक
धरम पाजी (धर्मेन्द्र जी के फ़िल्मी दुनिया में प्यार से बुलाने का नाम) ने हिंदी सिनेमा को “मर्दानगी के साथ भावनाओं का मेल” दिया। उनकी कदकाठी मजबूत थी, लेकिन दिल उतना ही कोमल। अभिनय में उन्होंने कभी कृत्रिमता नहीं अपनाई; स्क्रीन पर जो दिखाया, वह अपनी असलियत की तरह था। उनका पहनावा और हुलिया चाहे भले ही बदलता रहे, पर वह शख़्सियत की शालीनता और देसीपन हमेशा बरकरार रहा। उनकी आवाज़ में ठेठ पंजाब का लहजा था, जो संवादों में आत्मीयता भर देता था।
मज़ेदार ये भी है कि धर्मेन्द्र ने रोमांटिक और कॉमेडी दोनों ही शैलियों में एक से बढ़कर एक फिल्में दीं। “ख़ामोशी” जैसी पारिवारिक ड्रामा फिल्म में उन्होंने चुप रहने वाले किरदार की संवेदनशील परतें दिखाईं, तो “चुपके चुपके” में अद्भुत हास्य प्रदान किया। इन किरदारों ने यह सिद्ध किया कि धरेन्द्र का अभिनय सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं था; उनमें भावनाओं को समझने और जाहिर करने की अद्भुत क्षमता थी।
फिल्मी परिवार – दो युगों की कहानी
फिल्म जगत में अपना नाम बनाने के साथ-साथ धर्मेन्द्र ने परिवार की भी परंपरा को नई ऊँचाइयों पर रखा। उन्होंने अपने पहले विवाह से सनी देओल और बॉबी देओल जैसे दो बेटे और अन्य बच्चे पाए, जिन्होंने बाद में खुद बड़े अभिनेता बने। वहीं प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ विवाह से उन्हें दो बेटियाँ – ईशा देओल और अहाना देओल – हैं, जो फिल्मों के करीबी क्षेत्र में हैं। धर्मेन्द्र जी अपने दोनों परिवारों के बीच हमेशा प्यार और सम्मान का सेतु बनाए रखते आए हैं। उनका खुद का कथन है – “प्यार बांटने से बढ़ता है, छिपाने से नहीं।” यही सोच उन्होंने परिवारों पर भी लागू की।
देओल परिवार आज भी भारतीय सिनेमा की बड़ी कड़ी है। तीन पीढ़ियाँ “अपने” फिल्म में साथ दिखाई दीं – धर्मेन्द्र, उनके बेटे सनी देओल और पोता करण देओल (सनी के बेटे) ने साथ काम कर देश को दिखाया कि यह परिवार अपनी विरासत को गर्व से आगे बढ़ा रहा है। धर्मेन्द्र की सादगी और पारिवारिक मूल्यों ने दो पीढ़ियों के कलाकारों को एक मिसाल दी है कि कैसे पेशे में चमक के साथ भी घर की ज़मीन से जुड़े रहना चाहिए।
राजनीति और जन-जीवन – ज़मीन से जुड़े धरम
सिनेमा की दुनिया के इस सितारे ने 2004 में लोकसभा चुनाव लड़ा और बीकानेर (राजस्थान) से भाजपा के टिकट पर सांसद बने। वैसे धर्मेन्द्र अकसर कहते रहे, “मैं नेता नहीं, जनता का आदमी हूं।” सांसद रहते उन्होंने अपने क्षेत्र की जनता के लिए कई सामाजिक -कल्याणकारी प्रयास किए। हालांकि राजनीति उन्हें पूरी तरह रास नहीं आई, पर उन्होंने इस क्षेत्र में भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। यह साबित करने के लिए काफी है कि अपने ग्लैमर के परदे से परे भी धर्मेन्द्र एक जमीनी और प्रतिबद्ध नागरिक हैं।
कविता, भावनाएँ और एक संवेदनशील आत्मा
धर्मेन्द्र सिर्फ महान अभिनेता ही नहीं, एक संवेदनशील कवि भी हैं। वे अक्सर अपने विचार सोशल मीडिया पर कविताओं के रूप में साझा करते हैं – कुछ में दर्द, कुछ में उम्मीद, लेकिन हमेशा दिल से जुड़े हुए। उन्होंने लिखा है – “मैंने ज़िंदगी में बहुत कमाया, लेकिन सबसे बड़ा धन है लोगों का प्यार।” उनकी कविताओं में गाँव की मिट्टी की खुशबू, माँ की ममता और रिश्तों की सच्चाई की महक सुनने को मिलती है। खुद कहते हैं – “मैं स्टार नहीं, इंसान बनकर जीना चाहता हूँ।” यही प्रेम और विनम्रता उनके व्यक्तित्व की पहचान है।
विरासत – वह मुस्कान जो अमर रहेगी
60 साल से भी अधिक का करियर, 300 से ज़्यादा फिल्में और अनगिनत किरदार – धर्मेन्द्र ने हर रोल में जान फूंक दी। उन्होंने दिखाया कि असली मास्टरी चेहरे के भावों में होती है, चमक-दमक में नहीं। उनकी हर मुस्कान, उनकी हर आंखों की चमक शुद्ध दिल की अभिव्यक्ति थी।
आज जब सिनेमा के दौर भी बदल रहे हैं, धर्मेन्द्र अभी भी प्रासंगिक हैं। उनकी नविनतम भूमिका “रॉकी और रानी की प्रेम कहानी” (2023) में देखकर नई पीढ़ी और आलोचक भी यही कह रहे हैं – “धरम पाजी अब भी दिलों के हीरो हैं।” यह यकीनन उनके लिए सबसे बड़ी विरासत है कि एक सदी बाद भी उनकी अदा के कायल लोग उन्हें याद रखें।
धर्मेन्द्र के यादगार संवाद और उद्धरण
धर्मेन्द्र के संवाद हिन्दी सिनेमा के इतिहास में छाप छोड़ गए हैं। जीवन के संदेश लिए इनके कुछ पंक्तियाँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं:
- “जो डर गया समझो मर गया।” – शोले
- “प्यार इंसान को बड़ा बनाता है।” – सत्यकाम
- “माँ की ममता और मिट्टी की खुशबू, दोनों ही अमर हैं।” – अनुपमा
इन अमर पंक्तियों में सिर्फ किरदार की बात नहीं है, बल्कि जीवन का दर्शन भी छुपा है।
धर्मेन्द्र का सफर
1935 —पंजाब के लुधियाना में जन्म
1958 —फ़िल्मफेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट विजेता
1960 —डेब्यू – “दिल भी तेरा हम भी तेरे”
1966 —सुपरहिट – “फूल और पत्थर”
1975 —“शोले” – ऐतिहासिक सफलता
1980 —हेमा मालिनी से विवाह, देओल परिवार की शुरुआत
2004 —सांसद – बीकानेर, लोकसभा सदस्य बनें
2012 —भारत सरकार ने प्रदान किया पद्म भूषण
2023 —“रॉकी और रानी की प्रेम कहानी” में अभिनय
“मैं जनता के प्यार से ज़िंदा हूँ।” – धर्मेन्द्र
यह शब्द धर्मेन्द्र की दिल की आवाज़ हैं। पूरे देश के चाहने वाले उनकी हर मुस्कान को हमेशा संजोए रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि सितारा बनने से पहले इंसान बनना ज़रूरी है।
भारतीय सिनेमा के दिल में बसे एक युग की गूँज
धर्मेन्द्र ने जिस युग में सिनेमा जिया, वह सादगी और समर्पण का युग था। उनकी मुस्कान, उनकी आँखों की चमक और संवादों की ईमानदारी आज भी दर्शकों के दिलों में बसती है। वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक युग, एक एहसास हैं। उन्होंने सिखाया कि सफलता का मतलब केवल शोहरत नहीं, बल्कि विनम्रता और प्यार भी है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में धर्मेन्द्र का नाम केवल एक सितारे के रूप में ही नहीं, बल्कि एक भावना के रूप में दर्ज रहेगा। “सच्चा हीरो वही है जो कैमरे के बाहर भी दिल जीत ले।” यही कृति, यही विरासत हमें धर्मेन्द्र से मिली है – धरम पाजी, हमारे दिलों के सच्चे नायक।
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