
- कृष्ण कुमार निगम
मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए उपवास श्रेष्ठ साधन है। महात्मा गांधी प्रायश्चित और आत्म शुद्धि के लिए उपवास को सर्वोत्तम साधन मानते थे। साधनों में उपवास का महत्वपूर्ण स्थान है, किसी भी शुभ कार्य को शुरू करते हुए प्राय: उपवास का सहारा लेते हैं। कन्यादान के दिन माता पिता उपवास रखते हैं, यज्ञोपवीत वेदारंभ आदि में ब्रह्मचारी को उपवास रखना होता है। अनुष्ठान के दिन यजमान और आचार्य को उपवास रखना पड़ता है। एकादशी, प्रदोष, त्रयोदशी, नवदुर्गा के 9 दिन उपवास रखे जाते हैं।
भूल, अपराध, पाप न करने योग्य कार्य हो जाने पर उपवास द्वारा प्रायश्चित किया जाता है, आत्मबल बढ़ाने और आंतरिक पवित्रता में वृद्धि के लिए उपवास श्रेष्ठ साधन है। सत्याग्रह के लिए भी उपवास किया जाता है, भगवान महावीर और बुद्ध ने लंबे लंबे उपवास कर तपश्चर्या के प्रभाव से आत्मदर्शन में सफल हुए थे । उपवास के संकल्प के साथ-साथ सात्विकता की तरंगे अंत:करण में उठना शुरू होती है और रजोगुण, तमोगुण की कमी होने लगती है, निराहार रहने से विषय निवृत्त होते है। शुभ कर्मों के लिए सात्विकता की अधिक जरूरत है, इसलिए प्रत्येक धर्मकृत्य के साथ उपवास जोड़ा गया है। आवेशों का उफान भूखे रहने से घट जाता है। विषय विकारों का बोझ हल्का हो जाता है और भवताप से पीडि़त मनुष्य को उपवास रुपी औषधि से पवित्रता की शीतलता अनुभव होने लगती है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास का असाधारण महत्व है । प्राचीन काल में संक्रामक कष्ट साध्य रोगों में उपवास अर्थात निराहार साधन ही एकमात्र चिकित्सा मानी जाती थी, मोतीझीरा, निमोनिया, विशूचिका,प्लेग, सन्निपात, टाइफाइड जैसे रोगों में चिकित्सक इसे व्यर्थ नहीं कहते। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में उपवास को सर्व प्रधान उपचार बताया गया है। इसे हमारे ऋषि गण अच्छी तरह से जानते थे इसीलिए उन्होंने धार्मिक कृतियों में इस साधना को महत्व दिया है । एकादशी, रविवार से शनिवार तक हर दिन, अमावस्या, पूर्णिमा, त्रयोदशी, प्रदोष, चतुर्थी, के उपवास निश्चित है, इसके अतिरिक्त हर महीने दो-चार विशेष व्रत भी होते हैं इनका पुराणों में विशेष महात्म्यों का वर्णन है, यह इतने आकर्षक इसलिए है कि लोगों की रूचि इस ओर आकर्षित हो और वह उपवास से होने वाले शारीरिक एवं आत्मिक लाभों को उठावें ।
अध्यात्म मार्गियों के लिए उपवास साधना जरूरी है, इससे उनके आत्मिक दोष घटते हैं और आत्मबल बढ़ता है। उपवास तीन प्रकार के होते हैं दैनिक उपवास, नियत कालीन उपवास और विशिष्ट उपवास
दैनिक उपवास:-
इस व्रत में नित्य अन्न ग्रहण करना स्वल्पाहारकी तरह होता है। इसमें सात्विक, नमक आदि स्वादिष्ट मिश्रणों से रहित आहार लिया जाता है। दैनिक उपवास करने वाले को दोपहर को एक बार पूर्ण आहार लेना चाहिए, उसमें मिर्च, मसालों का पूर्णरूपेण त्याग रहे, केवल नमक लिया जा सकता है, मीठा लेना भी हो तो बहुत थोड़ा लेना चाहिए। रोटी में कई अनाजों का मिश्रण ना रहे, एक ही किस्म का अन्न होना चाहिए, रोटी के साथ दूध, दही, छाछ, दाल, साग इनमें से कोई एक ही चीज ली जा सकती है, कई दलों या कई दालों का मिश्रण नहीं होना चाहिए। चावल, दलिया, खिचड़ी आदि में भी यही नियम है। दो चीजों का मिश्रण नहीं होना चाहिए, भोजन अपने हाथ से बनाने या विश्वस्त के द्वारा ही बनाया जाए जो सात्विक प्रकृति और शुद्ध चरित्र का हो, कारण यह है कि भोजन बनाने वाले की मनोवृतिओं का आहार पर भारी प्रभाव पड़ता है और उसे खाने वाले के मन में में भी वैसा ही प्रभाव पड़ता है। शाम को अन्नाहार ना लेकर, फल या दूध लिया जा सकता है। अर्थात् अन्न दिन में एक बार ही ग्रहण करें। बांसी, तला, भुना, गरिष्ठ, मिर्च, मसाला, खटाई, मिठाई से सराबोर आहार त्याज्य है, इस प्रकार विवेक पूर्वक जो सात्विकता प्रधान आहार लेता है। वह फलाहार स्वल्पाहार के समान हैं, इस प्रकार के आहार करता हुआ मनुष्य उपवास के फल को प्राप्त करता है ।
नियत कालीन उपवास:-
किसी निर्धारित समय में जो उपवास होते हैं वह नियत कालीन उपवास कहलाते हैं। एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, नवदुर्गा आदि नियत कालीन उपवास है । दैनिक उपवास की तुलना में इसमें अधिक कड़ाई बरती जाती है, इसमें एक ही बार फलाहार करना चाहिए। समय-समय पर निराहार रहने से पेट में संचित मलों का पाचन हो जाता है और मनोविकारों की शुद्धि होती रहती है। महीने में कम से कम 2 उपवास अवश्य करना चाहिए, महीने में 4 दिन संभव हो तो सप्ताह का कोई एक दिन नियत कर लेना चाहिए, रविवार तेज वृद्धि और प्रतिभा विकास के लिए उत्तम माना गया है।
विशिष्ट उपवास:-
आत्म शुद्धि के लिए, अपराधों के प्रायश्चित हेतु अथवा किसी विशेष प्रयोजन के लिए जो उपवास किए जाते हैं, वह विशिष्ट उपवास कहलाते हैं। इसकी कोई मर्यादा नियत होना चाहिए। बिल्कुल निराहार व्रत स्वस्थ अवस्था में एक दिन से अधिक नहीं करना चाहिए ।
उपवास संबंधी आवश्यक नियम:-
(1) उपवास के दिन कड़ा शारीरिक या मानसिक श्रम नहीं करना चाहिए, हो सके तो विश्राम करना चाहिए।
(2) उपवास के दिन खूब पानी पीना चाहिए, पानी के साथ नींबू और नमक लेना चाहिए जिससे पेट की
अच्छी तरह सफाई हो जाती है।
(3) उपवास समाप्त करते ही गरिष्ठ चीजें अधिक मात्रा में खाने से उल्टी से हानि होती है, इसलिए उपवास
तोड़ते समय हल्की सुपाच्य चीजें लेनी चाहिए। जितने समय का उपवास किया जाए उतने ही समय का
पीछे भी साधारण आहार लेना चाहिए।
(4) उपवास काल में जरूरत के अनुसार सुपाच्य फल, साग, दूध लेना चाहिए गरिष्ठ पकवान मिठाइयां खाने से उपवास को व्यर्थ बना देता है।
(5) उपवास काल में आत्म चिंतन ईश्वर आराधना स्वाध्याय, सत्संग, आदि सात्विकता बढ़ाने वाले कामों में विशेष रुप से समय देना चाहिए।
(6) उपवास करने वालों को सत्य निष्ठा का पालन करना चाहिए। परोपकार और दया का भाव रखना चाहिए।



