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“60 दिनों का अद्भुत अधिमास: क्यों बढ़ जाता है पुण्य का फल कई गुना, जानिए पूरा रहस्य”

अधिमास के कारण इस वर्ष ज्येष्ठ मास अत्यंत विशेष और लंबा हो गया है, जो लगभग 60 दिनों तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय पूजा, जप, तप और दान के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। खासकर अन्न और जल दान का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। मंदिरों में विशेष अनुष्ठान, भंडारे और सेवा कार्य आयोजित हो रहे हैं। श्रद्धालु इस अवधि में भगवान की आराधना कर पुण्य अर्जित करने का प्रयास कर रहे हैं।

पुरुषोत्तम मास (अधिक मास/मलमास) हिन्दू पंचांग में लगभग हर तीन साल पर आने वाला एक अतिरिक्त चन्द्र मास है। इसे पुरुषोत्तम, अधिक या मलमास भी कहते हैं। यह वह महीना है जिसमें सूर्य किसी राशि में संक्रांति नहीं करता। सूर्य-चन्द्र गति के अंतर को संतुलित करने हेतु हर तीन साल में एक महीने की वृद्धि होती है, इसलिए वर्ष में 13 महीने हो जाते हैं। वर्ष 2026 में यह महीना 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक चला। इस कारण ज्येष्ठ मास इस बार लगभग 60 दिन का हो गया (ज्योतिष अनुसार 2026 के ज्येष्ठ अधिक मास का काल 17 मई से 15 जून रहा) । अतः पुरूषोत्तम मास में सनातन धर्म की विशिष्ट अनुष्ठान व्यवस्था लागू होती है।

तिथि और अवधि

पुरुषोत्तम मास की अवधि खगोलीय गणना से निर्धारित होती है। 2026 में धनु से मीन राशि में सूर्या के गोचर 15 जून को हुआ, इसलिए उससे पूर्व का चन्द्रमास अधिमास माना गया । इस तरह 17 मई से 15 जून 2026 तक का समय पुरूषोत्तम मास रहा। पंचांगानुसार यह वही महीना है जिसमें कोई सूर्य-संक्रांति नहीं हुई। आंचलिक भिन्नता के कारण माह निर्धारित करने में भी अंतर होता है: दक्षिण भारत में अमावस्या पर माह समाप्त माना जाता है (अमावस्यांतर), जबकि उत्तर भारत में पूर्णिमा पर माह बदलता है (पूर्णिमांत)। उदाहरण के लिए वट सावित्री व्रत अमावस्या तथा पूर्णिमा दोनों पर अलग-अलग माह में पड़ सकता है।आने वाले वर्षों में भी पुरूषोत्तम मास पूर्वानुमानित हैं: जैसे 2029 में चैत्र, 2031 में भाद्रपद, 2034 में आषाढ़ और 2037 में ज्येष्ठ में अधिमास होगा।

पौराणिक कथा और महात्म्य

पुरुषोत्तम मास का पुराणिक महत्व विशाल है। पुराणों के अनुसार जब देवताओं ने देखा कि वर्ष में 12 के अतिरिक्त एक 13वाँ मास आ गया है, तो उसने अपना कोई स्वामी नहीं था, अतः इसे कोई मान-सम्मान नहीं देता था। दुखी होकर यह मास भगवान् विष्णु की शरण में गया और श्रीहरि ने उसे वरदान दिया कि अब से तुमका पुरुषोत्तम नाम देकर मैं स्वयं आपका अधिपति हूँ। श्रीकृष्ण ने इसे दिव्य गुणों से युक्त कर दिया और कहा कि अब से तुम सभी मासों में श्रेष्ठ हो। तब से यह मास “पुरुषोत्तम मास” कहलाया। इसलिए इस मास में भगवान् विष्णु की विशेष आराधना की जाती है।

भगवद्-पुराण और पद्म पुराण की कथाओं में वर्णित है कि पुरुषोत्तम मास की उपासना करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अकथनीय पुण्य फल प्राप्त होते हैं। शास्त्र कहते हैं कि इस मास में किया गया साधनातीत व्रत-पूजन और दान-तप अत्यधिक फलदायी होता है। यहाँ तक कि कहा गया है कि इस मास में किया गया प्रत्येक दान सौ गुणा फल देता है । विशेष रूप से तुलसी की पूजा का महत्त्व बताया गया है।“इस मास के समय जप, तप, दान से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है… तुलसी अर्चना करने का विशेष महत्त्व बताया गया है”. पुराणों में यह भी उल्लेख है कि इस मास में विष्णु के नामों का मनन तथा भगवत्-गीता या श्रीराम कथा का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

पूजा-व्रत विधि एवं सामग्री

पुरुषोत्तम मास में विष्णु और तुलसी की पूजा पर विशेष जोर होता है। प्रतिदिन की साधना में प्रातः-स्नान के बाद तुलसी के पौधे का अभिवादन और जल अर्पण विशेष माना जाता है । इस मास में तुलसी की सुबह की आरती करना और पूरे दिन तुलसी के दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है। तुलसी-वृक्ष को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है, इसलिए तुलसी पूजन से विष्णु प्रसन्न होते हैं। पूजा सामग्री में तुलसी की पत्तियाँ, अक्षत (चावल), कुमकुम-हल्दी, रोली, दीपक (घी का दीपक), धूप-अगरबत्ती, पुष्प, फल, गंगाजल, नारियल, सुपारी आदि शामिल होते हैं। पूजा के समय दीपक-प्रदीप जलाना और नैवेद्य (फलों, फलाहार अथवा पकवान) अर्पित करना चाहिए।

पूजा विधि में श्रीविष्णु या श्रीराम के मंत्रों का जाप किया जाता है। जैसे प्रसिद्ध मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप भी किया जाता है। अधिकांश शास्त्रों के अनुसार इस मास में स्नानादि से लेकर एकादशी-व्रत और कथा-श्रवण तक सब पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। उदाहरणस्वरूप स्नान के समय तुलसी की पत्तियां पानी में मिलाकर स्नान करने से उस स्नान का फल तीर्थ-तर्पण के तुल्य हो जाता है। संध्या समय एकादशी व्रत में विष्णु-पूजन, कथा-पाठ और दान-धर्म पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इस मास में दीपदान, तुलसी-अर्चना, यज्ञ एवं साधना का भी विशेष महत्व है। परंपरागत आरती में लोग “जय पुरुषोत्तम देव…” से आरंभ करते हैं। लोकप्रचलित पुरुषोत्तम आरती के दोहे इस प्रकार हैं (उदाहरणार्थ):

  • “जय पुरुषोत्तम देवा, स्वामी जय पुरुषोत्तम देवा। महिमा अमित तुम्हारी, सुर-मुनि करें सेवा॥”
  • “जय पुरुषोत्तम देवा… सब मासों में उत्तम, तुमको बतलाया। कृपा हुई जब हरि की, कृष्ण रूप पाया॥”

पूजा के उपरांत अगर संभव हो तो एकासन व्रत रखना चाहिए – यानि दिन में एक ही बार भोजन लेना, रात्रि फलाहार रखना।

दान एवं परोपकार

पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य अत्यंत लाभकारी माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि इस मास में दान दिया गया प्रत्येक रूपया भी सौ गुणा फल देता है। प्रमुख दान सामग्री की परम्परा प्राचीन है। उदाहरणार्थ नौवेद्य (भोजन) के रूप में दही, चीनी और तुलसी के पत्तों का मिश्रण यत्नपूर्वक तैयार करके भोग लगाने के बाद प्रसाद स्वरूप बांटना अमृत तुल्य फलदायी कहा गया है।

इसके अतिरिक्त आमतौर पर निम्न वस्तुओं का दान विशेष फलदायी माना जाता है:

  • केला – कहा जाता है कि केले का दान करने से घर में सकारात्मकता आती है।
  • पीले वस्त्र – गुरुवार के दिन पीले वस्त्र गरीबों को अर्पित करने से विष्णु की कृपा बनी रहती है।
  • खाद्य पदार्थ – भूखे निर्धनों को भोजन दान करने से माँ लक्ष्मी- अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं।
  • पुस्तकें – तुलसी पुराण, रामायण या भागवत कथाएँ आदि पुण्यग्रंथ गरीब विद्यार्थियों को दान करने से सरस्वतीवाणी की कृपा मिलती है।
  • नारियल – नारियल का दान घर में धन-वैभव और सुख-शांति की वृद्धि करता है।
  • दीपदान – घर- मंदिरों में दीपक जलाकर दीपदान करना मोक्षदायी फल देता है।

इनके अतिरिक्त गंगा जल (पवित्र नदी का जल) देना, तुलसी पौधा अथवा द्वारका चंदन का दान भी शुभ माना जाता है। सामाजिक कार्यों का दान (अन्न, वस्त्र, चारा आदि) भी समयानुकूल पुण्य होता है।

क्या करें, क्या नहीं

पुरुषोत्तम मास में साधु-सत्-कर्मों को प्रोत्साहित किया जाता है, और समस्त मांगलिक कार्य वर्जित रखे जाते हैं। क्या करें: इस महीने में नियमित विष्णु-पूजन, तुलसी-आरती, पाठ एवं दान करें। संतोषपूर्वक नित्य एकादशी या द्वादशी का व्रत रखें, सत्यनिष्ठता से कथा-श्रवण करें और गरीबों को अन्न, वस्त्र, गाय का चारा आदि दान करें। गंगा, काशी या अन्य पवित्र तीर्थों पर स्नान-साधना फलदायी होता है।

क्या न करें: इस मास में नया शारिरिक या मांगलिक कार्य प्रारंभ नहीं करना चाहिए। जैसे कि विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश, जनेऊ संस्कार, बड़े व्यापार- निवेश या गृह-क्रय आदि टालने की सलाह दी जाती है। इसके अतिरिक्त बड़े सामाजिक उत्सव या नाट्य-आयोजन भी न करें। व्रत की घोषणा या उद्यापन न करें। इन नियमों का पालन करने से उपवास की पुण्य-प्राप्ति अक्षुण्ण रहती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार नियमित उपवास से शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव होता है। उपवास से शरीर का शोधन (detoxification) होता है, रक्त शुद्ध होता है और पाचन-उत्सर्जन तंत्र की कार्यक्षमता सुधरती है। अध्ययन बताते हैं कि उपवास हृदय की सेहत के लिए अच्छा है, कोलेस्ट्रॉल स्तर में कमी लाता है तथा कई रोगों (जैसे डायबिटीज, उच्च रक्तचाप) की आशंका को घटाता है। उपवास के दौरान शरीर जमा ऊर्जा (कार्बोहाइड्रेट, वसा) को व्यय करता है जिससे ताजगी महसूस होती है और स्मरण-शक्ति बढ़ती है। मानसिक रूप से भी संयमित उपवास आत्म–नियंत्रण, संवेदनशीलता और ध्यानशीलता को बढ़ाता है। सामाजिक दृष्टि से उपवास और दान-पुण्य के कार्यक्रम परस्पर सहयोग और संवेदनशीलता को बढ़ावा देते हैं। कुल मिलाकर, शास्त्रीय मान्यताओं के साथ आधुनिक शोध भी संतुलित रूप से उपवास के लाभ की पुष्टि करते हैं।

पुरुषोत्तम मास धर्मदृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसे श्रीविष्णु-पुराण कहता है “इस मास में किए गए जप, तप, दान से हजार गुना पुण्य मिलता है”, वैसे ही आयुर्वेद प्राचीन काल में उपवास को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा भी मानता आया है। इस मास के पालन से अधर्म नष्ट होकर पुण्य का उदय होता है। श्रीकृष्ण स्वयं ने कहा कि इस मास में विष्णु–भक्ति करने से सारे पाप समाप्त हो जाते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। अतः पुरूषोत्तम मास के दौरान दान-पुण्य, तपस्या, तुलसी-पूजा एवं व्रत रखकर संकल्पपूर्वक समय व्यतीत करने से आत्मा की शुद्धि और परम धर्म-सिद्धि होती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय गणनाओं और पुराणों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल जन-सामान्य को सूचित करना और आस्था से जुड़ी परंपराओं का परिचय कराना है। विभिन्न क्षेत्रों, पंचांगों और परंपराओं के अनुसार तिथियों, विधियों एवं मान्यताओं में भिन्नता संभव है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या निर्णय से पूर्व अपने स्थानीय विद्वान, पंडित या प्रमाणिक स्रोत से पुष्टि अवश्य करें।

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