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“ममता बनर्जी के गढ़ में बड़ा राजनीतिक भूचाल, 58 विधायक हुए अलग, विधानसभा में बदल गया पूरा खेल”

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। विधानसभा अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय के नेतृत्व वाले 58 विधायकों के गुट को मान्यता दे दी है। बंदोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी घोषित किया गया है। हालिया विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में बढ़ते असंतोष के बीच यह फैसला ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। दलबदल कानून के तहत भी इस गुट की स्थिति मजबूत बताई जा रही है।

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में सुश्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को बुधवार को उस समय एक और झटका लगा जब विधानसभा अध्यक्ष रवीन्द्र नाथ बोस ने पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय के नेतृत्व वाले 58 विधायकों वाले समूह को मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दे दी।विधानसभा ने श्री बंदोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी है।

मई में हुए विधान सभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राज्य की 294 सीटों वाली विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को मात्र 80 सीटें मिली थीं। पराजय के बाद पार्टी में बिखराव की स्थिति उत्पन्न होने लगी थी।श्री बंदोपाध्याय के नेतृत्व में आज ही तृणमूल के अधिकतर विधायकों के समूह ने विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर दावा किया था कि वे ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं।

श्री बंदोपाध्याय, श्री संदीपन साहा और सुश्री ममता बनर्जी से नाराज विधायकों ने स्पीकर को 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र सौंपा और सदन में पार्टी की नयी टीम का प्रस्ताव दिया। विधायकों के इस समूह ने श्री बंदोपाध्याय को तृणमूल विधायक दल का नेता, सर्वश्री जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप-नेता तथा श्री अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक चुना है।विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात से पहले श्री बंदोपाध्याय और उनके साथी विधायकों ने विधानसभा परिसर में एक बैठक की। इस बैठक में शामिल कोई भी विधायक गत मंगलवार को मध्य कोलकाता में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के धरने में शामिल नहीं हुए थे।

सुश्री बनर्जी के करीबी माने जाने वाले सदस्य शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बंद्योपाध्याय, मदन मित्रा और कुणाल घोष जैसे वरिष्ठ नेता बंदोपाध्याय गुट की आज की बैठक से दूर रहे।दलबदल रोधी कानून के तहत किसी भी अलग गुट को विधानसभा में अपनी सदस्यता बचाने के लिए मूल विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। मौजूदा सदन में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों की संख्या को देखते हुए अयोग्यता से बचने के लिए यह कानूनी सीमा 54 विधायकों की बैठती है।

राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार, चूंकि सुश्री ममता द्वारा निष्काषित श्री ऋतब्रत बंदोपाध्य के साथ कुल मिला कर कम से कम 58 विधायकों का मजबूत समूह है , इसलिए इस समूह को मान्यता देने के विधान सभा अध्यक्ष के फैसले को दलबदल कानून के तहत चुनौती देना कठिन है। (वार्ता)

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