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आदिवासी आस्था और परंपरा के पावन केंद्र में पीएम मोदी की विशेष पूजा-अर्चना

गुजरात के नर्मदा जिले स्थित देवमोगरा धाम पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांडोरी माताजी के दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की। सतपुड़ा पर्वतमाला की गोद में बसे इस प्राचीन धाम को आदिवासी समुदाय की कुलदेवी याहामोगी पांडोरी माता का पवित्र स्थान माना जाता है। हजारों वर्षों पुरानी आस्था के इस केंद्र में माताजी के चमत्कार, अन्न भंडार की कभी न खत्म होने वाली परंपरा और महाशिवरात्रि पर होने वाली भव्य गढ़ यात्रा विशेष आकर्षण हैं। पीएम मोदी के आगमन पर लोगों ने लोकनृत्य और तिरंगा लहराकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।

  • प्रधानमंत्री मोदी ने किए देवमोगरा धाम में पांडोरी माता के दर्शन

नर्मदा : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को गुजरात के नर्मदा जिले की अपनी यात्रा के दौरान प्रसिद्ध याहामोगी देवमोगरा धाम में पांडोरी माता के दर्शन किये।श्री मोदी ने देवमोगरा धाम मंदिर में पांडोरी माताजी के दर्शन, विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती की। इससे पहले सड़क के दोनों ओर खड़े लोगों ने लोकनृत्य के माध्यम से हाथों में तिरंगा लिए उनका भव्य स्वागत किया।

सतपुड़ा पर्वतमाला में प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह मनमोहक धाम आदिवासी समाज के लोगों की आस्था का केन्द्र है, जिसकी महिमा अनूठी है। सतपुड़ा की पर्वतमाला के बीच स्थित पौराणि मंदिर देवमोगरा धाम बाहर से नेपाल के पशुपतिनाथ जैसा दिखायी देता है।नर्मदा जिले की सागबारा तहसील के देवमोगरा में आदिवासियों की कुलदेवी पांडोरी माता (याहमोगी) का मंदिर है। सतपुड़ा की पर्वतमालाओं में प्रकृति की गोद में बसे इस धाम में स्वयंभू याहा पांडोरी देवमोगरा माता आदि-अनादि काल से स्वयं कणी-कंसरी के रूप में विराजमान हैं। यहां गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के आदिवासी समुदाय के लोग याहामोगी पांडोरी की कुलदेवी के रूप में अपार श्रद्धा-आस्था तथा भक्ति के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।

इस पवित्र हेला दाब (एक शक्तिशाली और पूजनीय देवी हैं, जिन्हें याहामोगी पांडोरी के नाम से भी जाना जाता है और देश के आदिवासी समुदाय द्वारा पूजी जाती हैं।) की आदि-अनादि काल से बहुत अनूठी महिमा रही है।हजारों वर्ष पूर्व जब इस प्रदेश में भीषण अकाल पड़ा था, तब पांडोरी माताजी ने देवमोगरा धाम पर स्वयं वास किया था।

भीषण अकाल के कारण अन्न-जल की किल्लत पैदा हुई और पशु-पक्षी तथा मानव; सभी दुःखी हो गये। ऐसे संकट की घड़ी में इस क्षेत्र के प्रजापालक गोर्या कोठार ने आवश्यक अन्न का वितरण करना शुरू किया, लेकिन आगे चलकर गोर्या कोठार के अन्न भंडार भी खाली होने लगे। तब उनकी पालक पुत्री याहा पांडोरी ने कणी-कंसरी का रूप धारण कर अन्न वितरण का कार्य संभाला। तब से आज तक अनाज के भंडार कभी खाली नहीं हुए हैं। अर्थात आदि-अनादि काल से लेकर आज तक माताजी के अन्न भंडार समग्र मानव जाति के लिए सदैव भरे रहे हैं।

सागबारा तहसील के देवमोगरा गांव में स्थित इस मंदिर में अनेक पीढ़ियों से लाखों भक्त माताजी के चरणों में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ अपनी समस्याओं तथा दुःखों का निवारण प्राप्त करने के लिए आते हैं। मंदिर के पुजारी द्वारा माताजी का आह्वान किया जाता है और आशीर्वाद देकर हर व्यक्ति के कल्याण की मंगलकामना की जाती है। मान्यता है कि माताजी के चरणों में जो भी दुःखी व्यक्ति रोता हुआ आता है, वह हंसता हुआ वापस लौटता है।देवमोगरा में जहां राजा पांठा-विनादेव का स्थानक है, वहां हर वर्ष महाशिवरात्रि पर एक भव्य गढ़ यात्रा आयोजित की जाती है।

इस यात्रा में परंपरागत वाद्ययंत्रों तथा नृत्य के साथ माताजी को गढ़ में जंगलों-पर्वतों के बीच स्थित प्राकृतिक झरने में स्नान कराया जाता है। इतना ही नहीं, माताजी की पूजा करके आगामी वर्ष के लिए खेतीबाड़ी और बरसाती मौसम का (होलको ठोक कर) अनुमान लगाया जाता है। हजारों श्रद्धालु इस अनुमान के अनुसार खेतीबाड़ी का पूर्व आयोजन करते हैं। मेले के दौरान माता के प्रांगण में स्थित काकड़ के पेड़ पर एक ही रात में फूल आ जाते हैं। सुबह श्रद्धालु उसके दर्शन करते हैं और मानते हैं कि जिस दिशा में सबसे ज्यादा फूल हों, उस दिशा में वर्ष के दौरान खेतीबाड़ी का काम अच्छा होगा।प्रतिवर्ष माघ महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तथा महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व से लगातार पांच दिनों तक लगने वाला यह मेला आदिवासी लोक संस्कृति का अनूठा दर्शन कराता है।

इस मेले में लाखों भक्त माताजी के दर्शन के लिए जुटते हैं, जो वास्तव में आह्लादक दृश्य होता है। इस मंदिर में बाईं ओर श्यामवर्णी महाकाली माता की मूर्ति के भी लोग दर्शन करते हैं। इस प्रकार, एक ही मंदिर में दो माताजी विराजमान हैं।आदिवासी समुदाय हजारों वर्षों से अपनी अनूठी परंपरा का पालन करता है, जिसमें वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ नयी फसल को बांस की टोकरी में रखते हैं और सब्जी- भाजी, पूजा सामग्री की हिजारी (हिंगारी) बांधकर उसे सिर पर रखकर एवं रंगबिरंगी वस्त्र पहनकर तथा महिलाएं सोने-चांदी के आभषणों से सज्ज होकर गाजे- बाजे के साथ होब यात्रा पर निकलते हैं। आदिवासी लोग सवा महीने का व्रत-उपवास कर याहा पांडोरी देवमोगरा के चरणों में धान-अन्न श्रद्धापूर्वक समर्पित करते हैं और इसके बाद नये धान का सेवन किया जाता है।

देवमोगरा धाम केवल एक स्थानक ही नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा एवं संस्कृतिक का जीवंत प्रतीक है और स्थानीय प्रदेश के घेरिया (महिला पोशाक में पुरुषों की टोली) होली-धुलंडी के त्योहार के दौरान सवा महीने घर से बाहर निकल कर घर-घर घूमते हैं और घेरिया बनते हैं और नौ रस के श्रृंगार के साथ मुक्त मन से नाच-गान करते हैं। धुलंडी से पूर्व के दिन होली चौक में होलिका प्रज्ज्वलित की जाती है और महिलाएं भी परंपरागत वेशभूषा में सज्ज होकर कर वाद्ययंत्रों के साथ नाच-गान करते हुए होली के लोले (लोक गीत) गाकर आनंद-उत्सव मनाती हैं।

भगवान बिरसा मुंडा को उनकी 150वीं जयंती मोदी ने किया नमन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा को उनकी 150वीं जयंती पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।गौरतलब है कि इस दिन को आधिकारिक तौर पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो भारत के इतिहास में आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका का सम्मान करता है। श्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर स्वतंत्रता आंदोलन में भगवान बिरसा मुंडा की महत्वपूर्ण भूमिका और देश की आदिवासी विरासत की रक्षा के उनके प्रयासों का उल्लेख किया है।

उन्होंने कहा, “जनजातीय गौरव दिवस केइस पावन अवसर पर पूरा देश मातृभूमि के गौरव की रक्षा में देश के महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा के अद्वितीय योगदान को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है।भगवान बिरसा मुंडा द्वारा दिए गए बलिदान और विदेशी उत्पीड़न के प्रति उनका प्रतिरोध राष्ट्रीय प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बना हुआ है। विदेशी शासन के अन्याय के विरुद्ध उनका संघर्ष और बलिदान हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा। देश के महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा जी को उनकी 150वीं जयंती पर शत-शत नमन।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि 2021 में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ की स्थापना यह सुनिश्चित करने के लिए की गई थी कि भारत की अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी नायकों के अभूतपूर्व योगदान को व्यापक रूप से मान्यता मिल सके और उन्हें याद किया जा सके।(वार्ता)

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