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भूकंप की तबाही को कम करने में सक्षम होगा भारत, कुल 135 वेधशालाएं होंगी स्थापित

आए दिन हम सुनते रहते हैं कि इस राज्य में भूकंप के झटके महसूस किए गए। भारतीय उपमहाद्वीप, भूकंप, तूफान, बाढ़, सुनामी और भूस्खलन के लिए एक हाई रिस्क क्षेत्र है। सेस्मिक जोनिंग मैपिंग के हिसाब से भारत को 4 जोन में बांटा गया है। ये जोन भूकंप की तीव्रता के अनुमान के आधार पर बांटे गए हैं। भारत जोन 2, जोन 3, जोन 4 और जोन 5 में विभक्त है। जोन 2 वाला क्षेत्र कम खतरनाक और जोन 5 वाला क्षेत्र अत्यधिक खतरनाक होता है। भूकंप हमेशा अपने साथ बर्बादी लेकर आता है।

भूकंप का आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे रोकना मानव के बूते से बहार है। बचाव ही सिर्फ एकमात्र तरीका है। इस प्रक्रिया में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है भूकंप आने के समय का सटीक पूर्वानुमान लगा पाना। यह काम भूकंपीय वेधशालाएं करती हैं। भारत सरकार ने भूकंपीय वेधशालाओं की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है, जिससे देशभर में वेधशालाओं का एक सघन नेटवर्क स्थापित हो सके और हर क्षेत्र समय से पहले भूकंप से बचाव की तैयारी कर सके।

केन्द्रीय मंत्री ने की घोषणा

विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग में केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में इस साल के अंत तक 35 भूकंपीय वेधशालाएं स्थापित की जाएंगी। उन्होंने आगे कहा कि अगले पांच वर्षों में ऐसी 100 और वेधशालाएं केंद्र सरकार द्वारा देश में बनाई जाएंगी।

देश में 65 साल में सिर्फ 115 वेधशालाएं ही थीं

इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ जियोमैग्नेटिज्म एंड एरोनॉमी (IAGA) – इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ सीस्मोलॉजी एंड फिजिक्स ऑफ द अर्थ इंटीरियर (IASPEI) के संयुक्त वैज्ञानिक सभा के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रिय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि आजादी के बाद से पिछले साढ़े छह दशकों यानि 65 साल के इतिहास में, देश में केवल 115 भूकंपीय वेधशालाएं थीं, लेकिन अब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, देश में भूकंपीय वेधशालाओं की संख्या में एक बड़ी बढ़ोतरी होने जा रही है।

क्यों आते हैं भूकंप

भूकंप में जमीन का भयंकर रूप से हिलना और जमीन के ऊपर मौजूद संरचनाओं का बुरी तरह से हिलना इसकी पहचान है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार ऐसा गतिशील स्थल-मण्डलीय (मूविंग लिथोस्फेरिक) अथवा क्रस्टल (भूपटल) प्लेटों के संचरित दबाव के मुक्त होने के कारण होता है। पृथ्वी की परत 7 बड़ी प्लेटों में बटी हुई है, जो कि 50 मील मोटाई वाली होती है। यह पृथ्वी के आंतरिक तथा अनेक छोटी प्लेटों के ऊपर धीमी गति से लगातार गतिशील रहती हैं। भूकंप मूलतः विवर्तनिक (टेक्टोनिक) होते हैं अर्थात् जमीन में आने वाले झटकों के लिए गतिषील (मूविंग) प्लेटें जिम्मेदार होती हैं।

हिमालय के आसपास आते हैं बड़े भूकंप

भारत की बढ़ती आबादी तथा इसमें व्यापक रूप से लगातार बढ़ रहे अवैज्ञानिक निर्माण और असंयमित प्राकृतिक संसाधनों का दोहन की वजह से भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंपों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पिछले 15 सालों के दौरान, देश ने 10 बड़े भूकंपों को झेला है, जिसके कारण देश की संपत्ति के साथ 20,000 से अधिक लोगों की जानें गई हैं। देश के वर्तमान भूकंपीय क्षेत्र मानचित्र के अनुसार, भारत की भूमि का 59% हिस्सा सामान्य से गंभीर भूकंपीय खतरों की चेतावनी के अधीन है, जिसका अर्थ यह है कि भारत में 7 और उससे अधिक तीव्रता के झटकों का खतरा रहता है।

वास्तव में संपूर्ण हिमालय क्षेत्र को 8.0 की तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के अनुकूल माना जाता है। 50 साल की अपेक्षाकृत अल्पावधि में 4 ऐसे बड़े भूकंप आ चुके हैं, जिन्होंने इस बात को सिद्ध किया है। 1897 शिलांग में 8.7 तीव्रता का, 1905 में कांगड़ा 8.0 तीव्रता का, 1934 में बिहार-नेपाल बॉर्डर पर 8.3 तीव्रता का, और 1950 में असम-तिब्बत बॉर्डर में 8.6 तीव्रता का भूकंप आया था। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार वैज्ञानिक प्रकाशनों में हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े शक्तिशाली भूकप के आने की संभावना के बारे में चेतावनी दी है, जिनसे भारत में करोड़ों लोगों की जिंदगी पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र है अधिक जोखम वाला

देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर (फ्रिक्वेंट इंटरवल्स) में सामान्य से लेकर बड़े किस्म के भूकंपों का आना जारी है। 1950 से इस क्षेत्र में अनेक हल्के भूकंप आए हैं। एक औसत के अनुसार, इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 6.0 से अधिक शक्ति वाला एक भूकंप आया है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी इंटर-प्लेट बाउंड्री पर स्थित है और इनमें भी बार-बार विनाशकारी भूकंप आने की संभावना बनी रहती हैं।

कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री डॉ. सिंह ने कहा कि हमारे ग्रह को नियंत्रित करने वाली संरचना, और प्रक्रियाओं के एक मान्यता प्राप्त विज्ञान के रूप में, भूविज्ञान का महत्व शायद आज अपने चरम पर पहुंच है क्योंकि मानव समाज आज पृथ्वी के साथ कई स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रहा है।

IAGA और IASPEI ले जाएंगे देश को आगे

केन्द्रीय मंत्री ने आशा व्यक्त की कि इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ जियोमैग्नेटिज्म एंड एरोनॉमी (IAGA) – इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ सीस्मोलॉजी एंड फिजिक्स ऑफ द अर्थ इंटीरियर (IASPEI) की संयुक्त वैज्ञानिक सभा अधिक से अधिक संख्या में वैश्विक समुदाय के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को समाज से संबंधित मुद्दों पर काम करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

उन्होंने कहा कि यह दो वैज्ञानिक समुदायों के लिए अपने-अपने क्षेत्र में अनुसंधान को आगे बढ़ाने के साथ-साथ परस्पर नए रास्ते तलाशने के लिए एक उपयुक्त वातावरण है। मंत्री ने कहा कि गहन पृथ्वी संरचना और भू-चुंबकत्व के बीच संबंध, और भूकंप न्यूक्लिएशन में तरल पदार्थ की भूमिका, कुछ ऐसे उदाहरण हैं दोनों संस्थाओं द्वारा क्रॉस-डिसिप्लिनरी रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है IAGA और IASPEI 2021 में एक संयुक्त सभा आयोजित करने के लिए एक साथ आए हैं, जिसकी मेजबानी सीएसआईआर-एनजीआरआई द्वारा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से की जा रही है। उम्मीद है ये दोनों संस्था इस क्षेत्र में देश को ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।

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