
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: दो महीने में निपटें जमानत और अग्रिम जमानत की याचिकाएँ
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को वर्षों तक लंबित रखना असंवैधानिक; हाई कोर्ट्स को तंत्र विकसित करने का निर्देश
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में कहा है कि देशभर की हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट्स को जमानत और अग्रिम जमानत की याचिकाओं का निस्तारण अधिकतम दो महीने के भीतर करना होगा। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदिवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से सीधे तौर पर जुड़े ऐसे मामलों को वर्षों तक लंबित रखना न्याय की आत्मा और संविधान की भावना के विपरीत है। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को अनिश्चितता में रखना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने Anna Waman Bhalerao बनाम राज्य महाराष्ट्र मामले की सुनवाई के दौरान दिया। इस प्रकरण में राजस्व विभाग के दो सेवानिवृत्त अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिकाएँ वर्ष 2019 से लंबित थीं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने जुलाई 2025 में इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ताओं को नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी, लेकिन साथ ही देशभर की अदालतों को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी कर दिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत और अग्रिम जमानत जैसी याचिकाएँ सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी होती हैं। इसलिए ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने राज्यों में एक तंत्र विकसित करें, जिससे इस तरह की याचिकाएँ लंबित न हों और समयबद्ध तरीके से सुनवाई पूरी हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि निचली अदालतें अनावश्यक स्थगन से बचें और ऐसे प्रकरणों को प्राथमिकता से सूचीबद्ध कर निपटाएँ।
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न्यायपालिका में लंबित जमानत आवेदनों की संख्या में कमी आएगी और लोगों को त्वरित राहत मिल सकेगी। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न्याय में देरी को रोकने और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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