“92% मतदान का रहस्य: क्या सच में बदल रहा है बंगाल का सियासी खेल?”
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 92% से अधिक रिकॉर्ड मतदान दर्ज हुआ, जिसे राजनीतिक दल अपने पक्ष में बता रहे हैं, लेकिन विश्लेषण इससे कहीं अधिक जटिल तस्वीर पेश करता है। मतदाता सूची से लाखों नाम हटने के कारण कुल मतदाताओं की संख्या कम हुई, जिससे प्रतिशत बढ़ा दिखा। वहीं कई क्षेत्रों में ‘प्रतिशोध वोटिंग’ और प्रवासी श्रमिकों की वापसी ने भी मतदान बढ़ाया। सीमावर्ती जिलों में सबसे अधिक मतदान दर्ज हुआ। इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने शांतिपूर्ण मतदान पर संतोष जताते हुए इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत बताया, हालांकि नाम हटाने से जुड़ी अपीलों पर धीमी सुनवाई चिंता का विषय बनी हुई है।
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मतदान के पहले चरण में 92.88 प्रतिशत का अभूतपूर्व मतदान राजनीतिक उत्साह का सीधा संकेत होने के बजाय ढांचागत और व्यवहारिक कारकों के मिलन का परिणाम अधिक लगता है , हालांकि तृणमूल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने दावा किया है कि मतदान का यह ऊंचा आंकड़ा उनके पक्ष में जनता के समर्थन को प्रदर्शित करता है।भाजपा ने आधिकारिक तौर पर दावा किया है कि यह ‘ममता बनर्जी सरकार को सत्ता से बेदखल करने’ के लिए दिया गया वोट था। इसके जवाब मेंहीं तृणमूल सुप्रीमो ने शुक्रवार को ट्वीट किया, “मैंने लोगों को स्पष्ट इरादे, दृढ़ संकल्प और एकजुटता के साथ बंगाल की रक्षा के लिए तैयार देखा।
“आंकड़ों का विश्लेषण संकेत देता है कि इस कहानी के पीछे कुछ अन्य बाहरी कारक भी हो सकते हैं। पहला कारण यह है कि यह मुख्य आंकड़ा आंशिक रूप से सांख्यिकीय कलाकारी है। दोहराव, प्रवास और लगभग 34 लाख व्यक्तियों के नाम विचाराधीन होने के कारण पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में लगभग 9.4 प्रतिशत की कटौती की गयी है, जिसने प्रभावी रूप से चुनावी आधार को कम कर दिया है। कुल संख्या कम होने से मतदान का प्रतिशत अनिवार्य रूप से बढ़ जाता है, जिससे भागीदारी वास्तविक भागीदारी से कहीं अधिक मजबूत दिखाई देती है।दूसरा, इसमें ‘प्रतिशोध के वोट’ के प्रमाण भी दिखते हैं। जिन चुनाव क्षेत्रों में परिवारों ने पाया कि उनके सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये हैं, वहां मतदान करना अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का जरिया बन गया। यह एक ऐसी व्यवस्था के भीतर अपना अधिकार वापस पाने का प्रयास था, जिसे ‘बहिष्करण’ के रूप में देखा गया।
पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने यूनीवार्ता से कहा , “ये दो नैरेटिव- कि यह ‘बंगाली गौरव’ के लिए तृणमूल का वोट है और भाजपा का यह दावा कि यह सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ वोट है- बहुत प्रभावी नहीं लगते।”चुनाव आयोग के लगभग 91 लाख लोगों के नाम हटाये जाने की ओर इशारा करते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) ने कहा, “चुनाव कराने के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह मानूंगा कि उन संख्याओं में से आधे लोग अनुपस्थित थे, पलायन कर चुके थे या मृत थे जबकि शेष जीवित और वास्तविक मतदाता हैं।”पश्चिम बंगाल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी रहे सरकार ने यह भी उल्लेख किया, “लगभग 34 लाख लोगों ने सूची से बाहर किये जाने के खिलाफ अपील की है और यह साबित करने के लिए दस्तावेज जमा किये हैं कि वे वास्तविक भारतीय निवासी हैं, न कि सीमा पार से आये बंगलादेशी। अन्य 15 लाख गरीब और असहाय प्रवासी श्रमिक होंगे, जिन्हें यह भी नहीं पता कि उनके नाम हटा दिये गये हैं।”कुल मिलाकर, ये परिस्थितियां मतदान के किसी भी एकतरफा राजनीतिक अर्थ को जटिल बनाती हैं।
भागीदारी की उच्च दर की व्याख्या स्पष्ट रूप से किसी एक पार्टी के पक्ष में या उसके खिलाफ लहर के रूप में नहीं की जा सकती। इसके बजाय, यह एक बहुस्तरीय चुनावी क्षण को दर्शाता है, जो प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ मतदाताओं की भावनाओं और राजनीतिक इरादों से भी आकार ले रहा है।’विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) अभियान के बाद बंगाल की मतदाता सूची से हटाये गये 91 लाख नामों में से लगभग 57 प्रतिशत नाम बंगलादेश की सीमा से सटे 10 जिलों के हैं, जिनमें से छह जिलों में गुरुवार को मतदान हुआ। इन सभी जिलों में भारी मतदान दर्ज किया गया। कूचबिहार में सबसे अधिक 96.04 प्रतिशत, उत्तर दिनाजपुर में 94.16 प्रतिशत और दक्षिण दिनाजपुर में 95.44 प्रतिशत मतदान हुआ।मतदाताओं के नाम हटाने के मामले में सबसे आगे रहने वाले दो बड़े जिलों, मालदा और मुर्शिदाबाद में क्रमशः 94.46 और 93.61 प्रतिशत मतदान देखा गया।
मौलाना अबुल कलाम आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज के पूर्व प्रमुख रणबीर समद्दर ने कहा , “हम जानते हैं कि इस बार प्रवासी श्रमिक वोट डालने के लिए सामान्य से अधिक संख्या में वापस आये हैं और इन जिलों से बड़ी संख्या में मौसमी पलायन होता है। व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि ये मतदाता एसआईआर से डरे हुए हैं और उन्हें डर है कि यदि उन्होंने इस बार वोट नहीं दिया, तो अगली बार उनका नाम काट दिया जा सकता है।”विश्लेषकों का हालांकि यह भी मानना है कि मतदान के प्रति कुछ उत्साह ‘सत्ता-विरोधी’ या ‘सत्ता-समर्थक’ भावनाओं के कारण भी हो सकता है।
प्रो. समद्दर ने स्वीकार किया, “ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टियों के नैरेटिव ने मतदाताओं के वर्गों को लामबंद किया है। कुछ मतदाताओं के लिए, मतपत्र समर्थन के बजाय स्थानीय गौरव पर कथित हमलों या शासन से असंतोष जताने का संकेत अधिक था।”कई मतदाताओं, विशेष रूप से बंगाली मध्यम वर्ग के लिए, बाहरी लोगों के वर्चस्व के खिलाफ तृणमूल का ‘बंगालियाना’ और बंगाली गौरव पर जोर देना गहरी बेचैनी को छूता है। उन्हें डर है कि प्रवास और बाहरी राजनीतिक प्रभाव के बीच उनकी भाषा, संस्कृति और जनसांख्यिकीय प्रभुत्व कम हो सकता है।जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई अन्य लोगों को लगता है कि औद्योगिकीकरण की कमी और बंगाल की छवि केवल ‘श्रम निर्यातक’ राज्य की होने के कारण यहां का विकास प्रभावित हो रहा है। उनका मानना है कि सत्ता संरचना में बदलाव से राज्य को लाभ और केंद्र की ओर से उदार आर्थिक सहायता मिल सकती है।
पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक मतदान, शांतिपूर्ण वोटिंग : उच्चतम न्यायालय ने जताया संतोष
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लगभग 92 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान की सराहना करते हुए संतोष जताया कि चुनाव शांतिपूर्ण रहे और हिंसा की कुछ घटनाएं ही सामने आईं।उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मतदान प्रक्रिया पर संतोष जताते हुए कहा, “भारत के नागरिक के तौर पर मैं मतदान प्रतिशत देखकर बहुत खुश हुआ। जब लोग अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होती है।”न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इसी भावना को दोहराते हुए मतदान के दौरान हिंसा नहीं होने का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “हिंसा की भी कोई घटना नहीं हुई है।” इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “जब लोग मतपत्र में अपनी ताकत को पहचान लेते हैं, तो वे हिंसा में शामिल नहीं होते।”न्यायालय को बताया गया कि मतदाता,जिनमें प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं, अपने वोट डालने के लिए बड़ी संख्या में बाहर निकले, जिससे मतदान का एक ऐतिहासिक आंकड़ा सामने आया। पीठ ने इसे एक सकारात्मक संकेत माना, खासकर तब जब पहले मतदाता सूचियों के संशोधन को लेकर चिंताएं जताई गई थीं। इससे पहले 2011 में सबसे अधिक मतदान लगभग 84 प्रतिशत रहा था।न्यायालय को हालांकि मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर अपीलों के निपटारे की धीमी गति को लेकर भी चिंता से अवगत कराया गया। न्यायालय को बताया गया कि 27 लाख अपीलों में से अब तक केवल 136 अपीलों का ही निपटारा हो पाया है।
मतदाताओं की सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए हैं, जिनकी अध्यक्षता कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश कर रहे हैं।ये अपीलें उन 60 लाख नामों के दावों और आपत्तियों के निपटारे से जुड़ी हैं, जिन्हें ‘तार्किक विसंगति’ और ‘अमैप्ड’ मतदाताओं की श्रेणी में रखा गया था। इन दावों और आपत्तियों का निपटारा 700 न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया गया था, जिनमें से 500 पश्चिम बंगाल से और 200 ओडिशा तथा झारखंड से थे।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए कहा कि अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज और उनके निपटारे से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क किया जा सकता है। इसमें फिर से दोहराया गया कि खासकर चल रही चुनाव प्रक्रिया को देखते हुए। मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी अपीलों पर तुरंत सुनवाई होनी चाहिए।गौरतलब है कि इस मामले पर अगली सुनवाई 11 मई, 2026 को होगी।
उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के मतदाता सूची से हटाए गए निर्वाचन अधिकारियों की याचिकाएं खारिज कीं
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उन व्यक्तियों की रिट याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिन्हें मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था, जबकि वे वर्तमान विधानसभा चुनाव में निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को उन अपीलीय न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) के पास जाने का निर्देश दिया, जिन्हें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की चुनौतियों की सुनवाई के लिए शीर्ष अदालत के आदेश पर गठित किया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने अदालत को बताया कि कई अधिकारियों के नाम बिना किसी कारण के मनमाने ढंग से मतदाता सूची से काट दिए गए हैं।न्यायमूर्ति बागची ने स्वीकार किया कि जिन लोगों की अपील अभी लंबित है, वे शायद पश्चिम बंगाल के मौजूदा विधानसभा चुनावों में मतदान नहीं कर पाएंगे, लेकिन वे अपनी अपील जारी रख सकते हैं ताकि भविष्य के लिए मतदाता सूची में उनका नाम बहाल किया जा सके। न्यायालय ने बताया कि वर्तमान में लगभग 19 अपीलीय न्यायाधिकरण कार्य कर रहे हैं और वे न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई कर रहे हैं।
इससे पहले 13 अप्रैल को शीर्ष अदालत ने कहा था कि पश्चिम बंगाल के जिन मतदाताओं के नाम चुनाव से कम से कम दो दिन पहले अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं, वे विधानसभा चुनाव में मतदान के हकदार होंगे। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले चरण का मतदान गुरुवार को संपन्न हो गया है, जबकि दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा।(वार्ता)
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