
कई वैश्विक मीडिया संस्थानों को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्वास्थ्य की चिंता इतनी अधिक हो गई है कि वे अपने देश में कोरोना समेत कई अहम मुद्दों को छोड़ कर भारत की राजनीतिक गतिविधियों में ज्यादा रुचि ले रहे हैं, वो भी मामले की गहराई को समझे बिना। हम बात कर रहे हैं अमेरिकी मीडिया की जो स्वयं देशद्रोह के मुद्दे पर उचित विचार नहीं रखता है उसने भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों ने भी इस पर ग्लोबल मीडिया की जमकर निंदा की और कहा कि किसी भी मामले पर झूठी बातें करना अमेरिकी मीडिया की बड़ी भूल है, और वे पहले भी ऐसी भूल कर चुके हैं।
अपने हालिया संपादकीय में, वॉशिंगटन पोस्ट सवाल करता है कि क्या भारत को लोकतंत्र कहा जाना चाहिए, क्योंकि भारत सरकार ने एक एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया है। इस मामले पर पी.बी.एन.एस ने विशेषज्ञों से पूछा कि क्या लोकतंत्र को मापने का मानदंड इतना नीचे आ गया है कि राष्ट्रीय हितों से संबंधित किसी मामले पर अगर किसी एक्टिविस्ट को गिरफ्तार करते हैं तो उसे “लोकतंत्र की हत्या” मान लिया जाता है। गलत तरह से किसी बात के चित्रण पर नेहरू केंद्र, लंदन के निदेशक अमिश त्रिपाठी ने हाल ही में कहा था कि विदेशी मीडिया हमेशा से भारत के वृहद सामाजिक-सांस्कृतिक मिश्रण और भाषाओं की विविधता को समझने में विफल रहा है। विशेषज्ञों ने पी.बी.एन.एस को यह भी बताया कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक संस्थागत जांच के कुछ नियम हैं, उन्हीं के आधार पर उस एक्टिविस्ट को भारत की अदालत ने 10 दिनों के बाद जमानत भी दे दी है।
न्यू यॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और टाइम मैगज़ीन जैसे वैश्विक मीडिया आउटलेट जिस तरह की तत्परता के साथ और बार-बार जिस तरह से भारतीय लोकतंत्र के क्रियाकलापों का वर्णन करते हैं, विशेषज्ञों के अनुसार, वो तथ्यों का प्रस्तुतिकरण कम बल्कि क्लिक-बेट जर्नलिज्म ज्यादा होता है, जिससे अंग्रेजी बोलने वाली आबादी की बदौलत इन मीडिया संस्थानों को सबसे बड़े और सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे डिजिटल न्यूज मार्केट में अपनी पहुंच बनाने में मदद मिलती है। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कंवल सिब्बल वैश्विक मीडिया संस्थानों के खिलाफ इन विचारों पर सहमती व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यह पत्रकारिता के मूल्यों का पतन है। वे कहते हैं, “ये संस्थान भारत के खिलाफ बहुत बड़े दुष्प्रचार का जरिया बन रहे हैं।” सिब्बल इन वैश्विक मीडिया आउटलेट्स द्वारा भारत के खिलाफ इस तरह के “झूठे आक्रोश” के लिए एक और कारण जोड़ते हैं, “ये संस्थान उन लोगों से प्रभावित हैं जो भारत के माहौल को खराब करना चाहते हैं, क्योंकि वे ऐसे किसी भी विचार को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं जिससे भारत स्वयं आगे बढ़ सके, भारत को आगे बढ़ना चाहिए , भारत को मजबूत बनना चाहिए, भारत को एकजुट होना चाहिए, भारत में आत्म-सम्मान होना चाहिए और दुनिया में एक शक्तिशाली देश बनना चाहिए।”
विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग “भारतीय लोकतंत्र की हत्या” के दावे करते हैं उन्हें हाल के वर्षों में अमेरिका में कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई कानूनी कार्रवाई पर नजर डालनी चाहिए। एडवर्ड स्नोडेन का मामला, जिसने अमेरिकी खुफिया सूचना के उस निगरानी कार्यक्रम को सार्वजनिक किया जिसमें वृहद स्तर पर सर्विलांस चल रहा था। तब ग्लोबल मीडिया ने क्या दिखाया? 2 सितंबर, 2020 को, एक अमेरिकी संघीय अदालत ने फैसला सुनाया कि एडवर्ड स्नोडेन द्वारा उजागर किया गया अमेरिकी खुफिया जन निगरानी कार्यक्रम अवैध और संभवतः असंवैधानिक था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अमेरिकी खुफिया विभाग के शीर्ष अधिकारी, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका बचाव किया था, वे सच नहीं बता रहे थे। नवंबर 2016 में, तत्कालीन निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जर्मन प्रसारक एआरडी और जर्मन पेपर डेर स्पीगेल को बताया कि वह “एडवर्ड स्नोडेन” को तब तक क्षमा नहीं कर सकते, जब तक कि वह अमेरिका की जमीन पर अमेरिकी अधिकारियों के समक्ष स्वयं उपस्थित नहीं होते। तब बराक ओबामा के कथन में अंग्रेजी शब्द can’t को मीडिया ने won’t समझ लिया और कह दिया कि अमेरिका के संविधान में ऐसा कोई प्रतिबंध निर्दिष्ट नहीं है।
इससे पहले जुलाई 2013 में, यूरोपीय नेताओं द्वारा नाराजगी का जवाब देते हुए, पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने कहा था कि सभी राष्ट्र खुफिया जानकारी एकत्र करते हैं, उनमें वो राष्ट्र भी शामिल हैं, जो इस पर नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। यह जर्मन पत्रिका डेर स्पीगेल के लेख पर उनका जवाब था। एक महीने बाद अगस्त 2013 में, राष्ट्रपति ओबामा ने स्नोडेन के देशभक्त होने के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उसी उस वर्ष नवंबर में स्नोडेन पर, ओबामा ने कहा, “इस मुद्दे पर चर्चा का जो लाभ स्नोडेन उठा रहे हैं, वो उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता जो हुआ है, क्योंकि इसे करने के और भी तरीके थे।”2014 में, तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, “जो लोग राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े रहस्य सरकार को सौंपते हैं, उनकी निष्ठा पर ही हमारे राष्ट्र की सुरक्षा निर्भर करती है। यदि कोई व्यक्ति जो सरकार की नीतियों का विरोध करता है और महत्वपूर्ण जानकारी को सार्वजनिक करता है तो हम अपने लोगों को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे और ना ही विदेश नीति का संचाल कर पायेंगे।” उन्होंने लीक से हटकर और “सनसनीखेज” तरीके पर आपत्ति जताते हुए कहा कि रिपोर्टिंग अक्सर “प्रकाश से अधिक गर्मी पैदा करती है।” उन्होंने कहा कि एक खुलासे से पता चला था, “हमारे विरोधी जो तरीके अपना रहे हैं वो हमारे कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं।”
एक अलग मामले में, सितंबर 2005 में, न्यू मैक्सिको में एक अमेरिकी अस्पताल ने अपनी नर्स पर राजद्रोह का आरोप लगाया, वो भी इसलिए क्योंकि उसने एक स्थानीय समाचार पत्र को चिठ्ठी लिखी थी, जिसमें उसने चक्रवात कैटरीना और इराक युद्ध के बाद पहुंचाये गए राहत कार्यों में हुई हीलाहवाली के लिए अमेरिकी सरकार को बुरा-भला कहा था। इस पत्र के लिए, न्यू मैक्सिको में यूएस डिपार्टमेंट ऑफ वेटरेंस अफेयर्स ने एफबीआई को सूचित किया और कार्यालय में रखे उसके कंप्यूटर को जब्त कर लिया। नर्स, लौरा बर्ग, से कहा गया कि भविष्य में उसकी पहचान वेटरेन अफेयर्स नर्स के रूप में नहीं करनी चाहिए। ये कुछ उदरहरण हैं जिन पर विशेषज्ञ बताते हैं कि कैसे जब एक्टिविज्म यानी सक्रियतावाद एक सीमा पार कर जाता है तब, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाता है तब सभी संप्रभु राष्ट्र खुद की रक्षा के लिए कैसे कदम उठाते हैं। यह किसी भी तरह से उनके लोकतंत्र के दर्जे को कम नहीं करता है, क्योंकि मजबूत संस्थागत और निष्पक्ष जांच ही न्याय को सुनिश्चित करती है।



