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“स्टालिन की चौंकाने वाली हार: कोलाथुर में क्या हुआ ऐसा कि पलट गई पूरी बाज़ी?”

तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर सामने आया है, जहां M. K. Stalin अपनी पारंपरिक कोलाथुर सीट से करीब 9 हजार वोटों से हार गए। उन्हें V. S. Babu ने शिकस्त दी, जो Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam से उम्मीदवार थे। इस जीत के साथ टीवीके ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव लाते हुए द्रमुक और अन्नाद्रमुक को पीछे छोड़ दिया।

चेन्नई : तमिलनाडु के निवर्तमान मुख्यमंत्री और द्रविड मुनेत्र कषगम (द्रमुक) अध्यक्ष एमके स्टालिन के नाम एक अनचाहा रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। वह 1967 में कांग्रेस के दिग्गज नेता एम भक्तवत्सलम और 1996 में अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता के बाद विधानसभा चुनाव हारने वाले श्री स्टालिन तीसरे पदस्थ मुख्यमंत्री बन गये हैं।श्री स्टालिन अपनी पारंपरिक कोलाथुर सीट से 9,000 से कुछ अधिक मतों के अंतर से हार गये। उन्हें राजनीति में श्री विजय की नयी-नवेली पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कषगम’ (टीवीके) के उम्मीदवार, जाने-पहचाने द्रमुक चेहरे और पूर्व द्रमुक विधायक वीएस बाबू ने शिकस्त दी।

टीवीके ने अपनी शानदार चुनावी एंट्री के साथ क्लीन स्वीप किया है और राज्य की दो बड़ी द्रविड़ दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर धकेल दिया है।वर्ष 1967 के चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता एम भक्तवत्सलम को श्रीपेरंबदूर चुनाव क्षेत्र में द्रमुक उम्मीदवार डी राजरथिनम ने हराया था। इसके साथ ही वह चुनाव हारने वाले पहले पदस्थ मुख्यमंत्री बने थे। भक्तवत्सलम के अलावा उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर सहयोगी भी इस चुनाव में पराजित हुए थे। उस समय संस्थापक सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रमुक ने पहली बार अपनी सरकार बनायी थी और तब से पिछले छह दशकों से द्रमुक और उसकी कट्टर प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक बारी-बारी से राज्य की सत्ता संभाल रही थीं।द्रविड पार्टियों के जीत के इस सिलसिले को अब विजय की अगली पीढ़ी की युवा शक्ति ने लगाम लगा दी है।

वर्ष 1967 के ऐतिहासिक मद्रास राज्य विधानसभा चुनाव में भक्तवत्सलम की हार द्रमुक की उस बड़ी लहर का हिस्सा थी, जिसने तमिलनाडु में कांग्रेस शासन के अंत पर मुहर लगा दी थी।इसके बाद 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता को उनके बरगुर चुनाव क्षेत्र में बड़ी चुनावी हार का सामना करना पड़ा, जहां वे द्रमुक के ईजी सुगावनम से 8,366 मतों से हार गयीं। उनकी इस अप्रत्याशित हार का कारण भारी सत्ता-विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोपों को माना गया, साथ ही अभिनेता रजनीकांत की उस आलोचना को, जिसमें उन्होंने कहा था, “अगर जयललिता फिर से सत्ता में लौटीं तो भगवान भी तमिलनाडु को नहीं बचा सकते।

” इस आलोचना ने अन्नाद्रमुक शासन की चुनावी संभावनाओं को खत्म कर दिया और 1967 के बाद तमिलनाडु में चुनाव हारने वाली दूसरी पदस्थ मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता बनीं।अब श्री स्टालिन भी चुनावी मैदान में शिकस्त झेलने वाले पदस्थ मुख्यमंत्रियों की इस अनचाही सूची में शामिल हो गये हैं। वर्ष 1967 और 1996 की ही तरह इस बार मुख्यमंत्री के साथ-साथ उनके मंत्रिमंडल के कई सहयोगी भी हारने वालों में शामिल हैं। कोलाथुर में कुल 1.82 लाख मतों में से श्री बाबू को लगभग 83,000 वोट मिले, जबकि श्री स्टालिन को 74,000 वोट प्राप्त हुए। इस तरह श्री बाबू उस सीट से एक योग्य विजेता बनकर उभरे, जहां से श्री स्टालिन जीत की हैट्रिक पूरी कर चुके थे।

श्री स्टालिन ने 2011 में जीत दर्ज की थी, जब परिसीमन के बाद यह चुनाव क्षेत्र पहली बार अस्तित्व में आया था और फिर 2016 और 2021 में भी उन्होंने यहां से जीत हासिल की थी।श्री बाबू ने 45 प्रतिशत से अधिक मत हासिल कर अपनी जीत सुनिश्चित की है।यह तब हुआ जब श्री स्टालिन ने पिछले तीन चुनाव हर बार जीत का अंतर बढ़ा कर एकतरफा अंदाज में जीते थे। वर्ष 2011 में 48.35 प्रतिशत, 2016 में 54.25 प्रतिशत और फिर 2021 के पिछले चुनावों में 60.86 प्रतिशत मत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गये थे। इस बार तेज गिरावट दर्ज कर यह आंकड़ा 38.15 प्रतिशत पर आ गया। वर्ष 2011 में इस सीट के अस्तित्व में आने के बाद से श्री स्टालिन इस विधानसभा सीट से चुने गये एकमात्र विधायक थे।चुनावी राजनीति के अपने चौथे दशक में

श्री स्टालिन ने लगातार 10वीं बार विधानसभा चुनाव लड़ा और वे अपनी आठवीं जीत का स्वाद चखने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने अपने पहले छह चुनाव शहर की थाउजेंड लाइट्स सीट से 1984, 1989, 1991, 1996, 2001 और 2006 में लड़े थे।1984 और 1991 को छोड़कर, उन्होंने शेष चार चुनावों में जीत हासिल की थी। इसके बाद वह कोलाथुर सीट से चुनाव लड़े, जहां हर चुनाव के साथ उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया।टीवीके के वी.एस. बाबू, अन्नाद्रमुक के पी. संथानकृष्णन और एनटीके के सुंदरपांडियन के खिलाफ मैदान में उतरे द्रमुक अध्यक्ष ने अपने पारंपरिक गढ़ में हारने के बारे में सपने में भी नहीं सोचा होगा।श्री विजय के इस ‘राजनैतिक हिमस्खलन’ में द्रमुक का चेन्नई का गढ़ भी दफन हो गया, जहां टीवीके ने कुल 16 विधानसभा सीटों में से 14 पर जीत दर्ज की है।

चेपॉक-तिरुवल्लिकेनी से स्टालिन के बेटे और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन और हार्बर सीट से हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती मंत्री पी.के. सेकर बाबू को छोड़कर द्रमुक बाकी सभी 14 क्षेत्रों में हार गयी। टीवीके ने चुनावी राजनीति में अपने पहले ही कदम के साथ द्रमुक के अभेद्य किले को ढहा दिया। (वार्ता)

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