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एक सूर्य,अनेक परंपराएँ: भारत में मकरसंक्रांति से लोहड़ी तक उत्सवों की जीवंत सांस्कृतिक विरासत

जनवरी का महीना भारत में केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि यह सूर्य उपासना और कृषि संस्कृति के महापर्वों का समय होता है। मकरसंक्रांति पर गंगा स्नान, दान और पतंगबाज़ी जहां उत्तर भारत की पहचान है, वहीं पूर्वांचल में खिचड़ी पर्व सामूहिकता और समरसता का संदेश देता है। दक्षिण भारत में पोंगल किसान, प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है, तो पंजाब-हरियाणा में लोहड़ी अग्नि, लोकनृत्य और नई शुरुआत का प्रतीक बनती है। ये सभी पर्व भारत की विविधता में एकता और सांस्कृतिक गौरव को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।

जनवरी का महीना भारत की सांस्कृतिक आत्मा में एक विशेष ऊर्जा भर देता है। यह वह समय है जब शीत ऋतु की कठोरता धीरे-धीरे ढलने लगती है, खेतों में फसलों की हरियाली आशा जगाती है और आकाश में सूर्य अपनी नई यात्रा-उत्तरायण-पर अग्रसर होता है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में यह खगोलीय परिवर्तन केवल वैज्ञानिक घटना नहीं, बल्कि जीवन, श्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महोत्सव बन जाता है।

यही कारण है कि देश के अलग-अलग भूभागों में, अलग-अलग नामों और रीति-रिवाज़ों के साथ, एक ही भावभूमि पर खड़े चार महान पर्व मनाए जाते हैं-मकरसंक्रांति, खिचड़ी, पोंगल और लोहड़ी। कहीं तिल-गुड़ की मिठास है, कहीं सामूहिक खिचड़ी का प्रसाद, कहीं उबलते पोंगल की हांडी और कहीं अग्नि के चारों ओर लोकगीतों की गूंज। भाषा, वेश-भूषा और परंपराएँ भले ही भिन्न हों, लेकिन इन उत्सवों का मूल संदेश एक है-सूर्य, कृषि और जीवन के प्रति आभार।

भारत की “विविधता में एकता” का इससे सुंदर उदाहरण शायद ही कोई हो। यह स्टोरी उसी साझा चेतना की यात्रा है-उत्तर भारत की पतंगों से लेकर दक्षिण भारत की हांडी तक, पूर्वांचल की खिचड़ी से लेकर पंजाब की लोहड़ी तक।

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश: वैज्ञानिक और धार्मिक अर्थ

मकरसंक्रांति भारतीय पंचांग के उन दुर्लभ पर्वों में से है, जो लगभग हर वर्ष 14 जनवरी को निश्चित तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह क्षण पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की किरणों के क्रमशः सीधी पड़ने की शुरुआत का संकेत है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। कृषि समाज के लिए यह परिवर्तन अत्यंत शुभ माना गया, क्योंकि इससे फसलों की वृद्धि और परिपक्वता को नई गति मिलती है।

धार्मिक परंपरा में उत्तरायण काल को देवताओं का दिन कहा गया है। मान्यता है कि इस अवधि में किया गया दान-पुण्य, स्नान और जप-तप विशेष फलदायी होता है। इसी कारण गंगा, यमुना, गोदावरी और नर्मदा जैसे पवित्र तीर्थों पर स्नान का विशेष महत्व है।

तिल-गुड़, स्नान और दान की परंपरा

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस दिन तिल और गुड़ से बने व्यंजन-तिलकुट, रेवड़ी, गजक-खाए और बांटे जाते हैं। तिल को शीत ऋतु में शरीर को ऊष्मा देने वाला माना गया है, जबकि गुड़ ऊर्जा का प्रतीक है। लोकमान्यता कहती है-“तिल-गुड़ खाइए और मीठा बोलिए”-जो सामाजिक सौहार्द और मधुर संबंधों का संदेश देती है।

दान-पुण्य की परंपरा इस पर्व का केंद्रीय तत्व है। अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ और गर्म कपड़ों का दान समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।

पतंगबाज़ी: आकाश में उत्सव

गुजरात और महाराष्ट्र में मकरसंक्रांति का दृश्य सबसे रंगीन रूप ले लेता है। अहमदाबाद से लेकर जयपुर तक, आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। यह केवल खेल नहीं, बल्कि सामूहिक आनंद, प्रतिस्पर्धा और उल्लास का प्रतीक है-जहां सीमाएँ मिटती हैं और उत्सव सबका हो जाता है।

पूर्वांचल में खिचड़ी का विशेष महत्व

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में मकरसंक्रांति खिचड़ी पर्व के रूप में विख्यात है। यह पर्व सादगी, समरसता और सामूहिकता का जीवंत उदाहरण है। खिचड़ी-चावल, दाल और सब्जियों से बना सरल भोजन-यहाँ केवल व्यंजन नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन है, जिसमें हर वर्ग और हर समुदाय समान रूप से सहभागी होता है।

गोरखनाथ मंदिर और खिचड़ी मेला

गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला देश के प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक मेलों में गिना जाता है। मकरसंक्रांति के दिन लाखों श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करते हैं। यह मेला साधु-संतों, किसानों और आमजन के बीच अद्भुत संवाद स्थापित करता है।

यहाँ खिचड़ी का सामूहिक प्रसाद जाति, वर्ग और आर्थिक भेद को समाप्त कर देता है। एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करना भारतीय समाज की मूल भावना-समानता-को साकार करता है।

कृषि और लोकआस्था का संगम

यह पर्व रबी फसल की शुरुआत से भी जुड़ा है। किसान अपनी नई फसल का पहला अंश देवताओं और संत परंपरा को अर्पित कर कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। लोकगीतों, मेलों और बाजारों से सजा यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा देता है।

तमिलनाडु में प्रकृति और श्रम का चार दिवसीय उत्सव

तमिलनाडु का पोंगल उत्सव चार दिनों तक चलता है-भोगी, सूर्य पोंगल, मट्टू पोंगल और कानुम पोंगल। हर दिन का अपना अलग अर्थ और महत्व है।

  • भोगी पोंगल: पुराने और अनुपयोगी वस्तुओं को त्यागकर नई शुरुआत का प्रतीक।
  • सूर्य पोंगल: सूर्य देव को अर्पित मुख्य दिन, जब नई फसल के चावल से पोंगल बनाया जाता है।
  • मट्टू पोंगल: पशुधन-विशेषकर बैलों-के प्रति आभार।
  • कानुम पोंगल: पारिवारिक मिलन और सामाजिक आनंद का दिन।

सूर्य, प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता

पोंगल की हांडी जब उबलकर छलकती है, तो लोग कहते हैं-“पोंगलो पोंगल!”-यह समृद्धि और खुशहाली का उद्घोष है। यह पर्व बताता है कि मानव जीवन केवल श्रम से नहीं, बल्कि सूर्य, धरती, जल और पशुधन के सहयोग से फलता-फूलता है।

ग्रामीण जीवन का उत्सव

पोंगल के दौरान गाँवों में कोलम (रंगोली), गन्ने के गुच्छे और पारंपरिक परिधान तमिल संस्कृति की गहराई को दर्शाते हैं। यह उत्सव कृषि अर्थव्यवस्था की आत्मा को सम्मान देता है।

पंजाब और हरियाणा की अग्नि परंपरा

पंजाब और हरियाणा में मकरसंक्रांति की पूर्व संध्या पर लोहड़ी मनाई जाती है। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा, तिल, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना, तथा भांगड़ा-गिद्धा-यह सब जीवन के उत्साह का प्रतीक है।

रबी फसल और नई शुरुआत

लोहड़ी रबी फसल की बुआई पूरी होने और अच्छी पैदावार की कामना का पर्व है। यह परिवार और समुदाय को एक सूत्र में बांधता है।

लोकसंस्कृति की जीवंतता

लोकगीतों में वीरता, प्रेम और प्रकृति का वर्णन मिलता है। लोहड़ी केवल पर्व नहीं, बल्कि पंजाब की सांस्कृतिक स्मृति है।

विविधता में एकता का सांस्कृतिक सूत्र

चारों पर्व-मकरसंक्रांति, खिचड़ी, पोंगल और लोहड़ी-अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान हैं, लेकिन इनकी आत्मा एक है। सूर्य की आराधना, कृषि श्रम का सम्मान और सामूहिक आनंद-यही भारतीय संस्कृति का मूल है। यह पर्व हमें याद दिलाते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में भी हमारी जड़ें धरती से जुड़ी हैं।

परंपरा की रोशनी में भविष्य की राह

आज के तकनीकी युग में इन पर्वों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। ये उत्सव युवा पीढ़ी को प्रकृति, श्रम और सामूहिकता का मूल्य सिखाते हैं। भारत की यह सांस्कृतिक विरासत न केवल देश की पहचान है, बल्कि वैश्विक मंच पर हमारी आत्मा का परिचय भी।

एक सूर्य, अनेक परंपराएँ-और एक साझा संदेश: कृतज्ञता, समरसता और जीवन का उत्सव।

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