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राम-भरत के प्रेम से समाज को आईना: भलुअनी की श्रीराम कथा में गूंजे संस्कारों के स्वर

भलुअनी, देवरिया के दुर्गा मंदिर परिसर में चल रही संगीतमय श्रीराम कथा में संतदास जी महाराज ने राम वनवास और राम-भरत मिलाप का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने आज के समाज में बढ़ते नशे, दहेज, पारिवारिक विघटन और संस्कारहीनता पर करारा प्रहार करते हुए राम-भरत जैसे आदर्श संबंधों को अपनाने का आह्वान किया।

  • संतदास जी महाराज ने वनवास, भाईचारे, नशा और दहेज पर दिए तीखे संदेश

भलुअनी, देवरिया। दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित नौ दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ने पूरे क्षेत्र को भक्ति, संस्कार और आत्ममंथन के भाव से सराबोर कर दिया है। कथा के सातवें और आठवें दिन कथावाचक संतदास जी महाराज के वचनों ने न केवल श्रोताओं की आंखें नम कीं, बल्कि समाज को आईना दिखाते हुए अंतरात्मा को झकझोर दिया।

राम वनवास: त्याग, मर्यादा और आज की पीढ़ी

कथा के सातवें दिन संतदास जी महाराज ने भगवान श्रीराम के वनवास प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि देवासुर संग्राम के समय महारानी कैकेई द्वारा राजा दशरथ के प्राण बचाने के कारण दिए गए दो वरदान कैसे राम के चौदह वर्ष के वनवास और भरत के राज्याभिषेक का कारण बने। माता-पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर भगवान राम ने राजपाट, वैभव और सुख को त्याग कर वनवास स्वीकार किया-यह मर्यादा, त्याग और आज्ञाकारिता का सर्वोच्च उदाहरण है।

इसी प्रसंग को आज के समाज से जोड़ते हुए उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की कि जहां भगवान राम ने चौदह वर्ष एक संन्यासी की तरह जंगल में बिताए, वहीं आज की पीढ़ी अश्लील और फूहड़ रील बनाने में उलझी है। उन्होंने कहा,  “अगर रील ही बनानी है, तो अपने चरित्र की ऐसी रील बनाओ कि समाज खुद उसे देखे और अपनाए।”उनके ये शब्द युवाओं के मन में गहरी छाप छोड़ गए। उन्होंने प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक दिन सुंदरकांड पाठ, कीर्तन या भजन को अनिवार्य बताते हुए कहा कि बिना संस्कार के बच्चे संस्कारी कैसे बनेंगे।

दहेज और कर्मकांड पर करारा प्रहार

संतदास जी महाराज ने दहेज प्रथा को समाज का कोढ़ बताते हुए कहा कि दहेज मांगने वाला भिखारी से भी नीचे होता है। आज दहेज लोभी लोग कंपनियों के नाम गिनाकर सामान की सूची थमा देते हैं-यह सामाजिक पतन का प्रतीक है। मृत्यु उपरांत तीन दिन के दिखावटी कर्मकांड पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जो बेटा माता-पिता के लिए विधि-विधान से कर्म नहीं कर सकता, उसे आत्मचिंतन करना चाहिए।

राम-भरत मिलाप: भाईचारे की मिसाल

आठवें दिन राम-भरत मिलाप की कथा ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। संतदास जी महाराज ने बताया कि कैसे भरत ने प्रभु राम से अयोध्या का राज स्वीकार करने का आग्रह किया और स्वयं जीवनभर वनवास काटने को तैयार हो गए। जब प्रभु राम ने राज स्वीकार नहीं किया, तो भरत ने उनकी खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य संभाला-यह त्याग, प्रेम और कर्तव्य की अद्वितीय मिसाल है।

आज के समाज पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, “जहां राम और भरत जैसे भाइयों में ऐसा प्रेम था, वहीं आज एक इंच जमीन के लिए भाई-भाई की जान ले रहा है।”

सामाजिक पतन पर तीखी टिप्पणी

मांसाहार और नशे पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि आज गिद्धों की संख्या इसलिए घट रही है क्योंकि इंसान स्वयं गिद्ध बनता जा रहा है। नशे में डूबा व्यक्ति अक्सर कीचड़ और नालों में पाया जाता है-यह उसकी मानसिक और नैतिक स्थिति का प्रतीक है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ युवा उम्र के शुरुआती दौर में ही माता-पिता के प्रेम और संस्कार को भूलकर गलत फैसले ले लेते हैं, जिससे उनका जीवन स्वयं के लिए नर्क बन जाता है।

श्रद्धा और संकल्प का संगम

कथा के दौरान संतोष मद्धेशिया वैश्य एवं उनकी धर्मपत्नी ने संतदास जी महाराज को प्रभु श्रीराम का चित्र भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा पंडाल में उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने संतदास जी महाराज के विचारों को गंभीरता से सुनते हुए उन्हें अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया। यह श्रीराम कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने वाला संस्कारों का महायज्ञ बन गई है-जहां हर श्रोता अपने भीतर झांकने को विवश हुआ।

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