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अगहनी मास में भगवान विष्णु का स्नान, तुलसी पूजन और गीता पाठ से मिलता है अद्भुत पुण्य

हिन्दू पंचांग का नौवां महीना मार्गशीर्ष या अगहनी मास भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मास में हरिनाम जप, गीता पाठ, तुलसी पूजन और पंचामृत से विष्णु अभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है। स्कन्दपुराण और भागवत के अनुसार इस काल में स्नान, दान और भक्ति से जन्म-जन्मांतर के पाप मिटते हैं। अन्नकूट और मोक्षदा एकादशी इस महीने के प्रमुख पर्व हैं। सूर्य की मृदु किरणों और फसल की सुगंध के बीच यह मास शांति, समृद्धि और आत्मशुद्धि का संदेश देता है।

  • मार्गशीर्ष मास का महात्म्य: जब विष्णु पूजन से खुलते हैं मोक्ष के द्वार

हिन्दू पंचांग का प्रत्येक मास अपने भीतर कुछ न कुछ विशेषता समेटे होता है, परंतु मार्गशीर्ष मास का स्थान अद्वितीय है। यह वह समय है जब आकाश में शीतलता उतरने लगती है, खेतों में धान की बालियाँ झूमती हैं और मनुष्य का मन भी भीतर से एक नयी निर्मलता को अनुभव करता है। कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन से आरंभ होकर पौष पूर्णिमा तक चलने वाला यह मास न केवल कृषि-समृद्धि का सूचक है बल्कि भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना का सर्वोत्तम काल माना गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं-“मासानां मार्गशीर्षोऽहम्।” अर्थात, “मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ।” यह एक स्पष्ट घोषणा है कि यह महीना श्रीकृष्ण को सर्वाधिक प्रिय है। इसी कारण धर्मशास्त्र, पुराण और लोकजीवन-तीनों में इस मास की विशिष्ट प्रतिष्ठा है।

मार्गशीर्ष को अघन या अगहनी भी कहा जाता है। कृषि समाज में इस मास को नई फसल के स्वागत का समय माना जाता है। खेतों में धान की कटाई पूरी होती है, गोदाम भरते हैं, और लोग “अन्नकूट” उत्सव मनाते हैं। यह अन्न के प्रति आभार प्रकट करने और भगवान के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।

प्राचीन ग्रंथों में मार्गशीर्ष मास को देवमास कहा गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार-“यः कुरुते मार्गशीर्षे स्नानं तदाखिलं पापं दहति।” अर्थात जो व्यक्ति इस मास में स्नान, जप और दान करता है, उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण में यह भी कहा गया है कि इस मास में जो भक्त भगवान विष्णु का अभिषेक कर तुलसीदल अर्पित करता है, उसे न केवल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फल प्राप्त होते हैं बल्कि उसके कुल के सात पीढ़ियाँ तक तृप्त होती हैं।

मार्गशीर्ष मास की कथा

पुराणों में इस मास से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है। एक ब्राह्मण था जो जीवनभर विष्णु नाम का जप करता था, किंतु किसी विशेष नियम का पालन नहीं करता था। एक बार उसे एक ऋषि ने उपदेश दिया कि मार्गशीर्ष मास में प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक करे। ब्राह्मण ने नियमपूर्वक यह साधना आरंभ की। उसने शुद्ध मन से भगवान को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराया और तुलसीदल अर्पित किया। एक दिन पूजन के दौरान वह अत्यंत भावविभोर होकर रोने लगा।

कहते हैं कि भगवान विष्णु स्वयं उसके सम्मुख प्रकट हुए और बोले-“हे द्विज, तूने मेरे प्रिय मास में सच्चे भाव से स्नान-सेवा की, इसलिए मैं प्रसन्न हूँ। तू विष्णुलोक को प्राप्त होगा।” इस कथा से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस मास में थोड़े से भी श्रद्धाभाव से की गई पूजा का फल असीम होता है।

मार्गशीर्ष मास की कथा (दूसरा प्रसंग)

स्कन्दपुराण में एक और प्रसंग आता है। एक समय पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा। लोग भूख से व्याकुल हो गए। तब भगवान विष्णु ने ब्रह्मा से कहा-“हे ब्रह्मदेव, अब मैं स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होकर अन्न का पुनर्जागरण करूँगा।” भगवान विष्णु धान के रूप में धरती पर अवतरित हुए और उन्होंने कहा-“मैं मार्गशीर्ष मास में उत्पन्न होता हूँ, इसलिए इस मास को अग्रहायण कहा जाएगा। जो इस महीने में अन्नकूट करेगा, उसे मैं अन्न-समृद्धि और संतति दूँगा।” तभी से इस मास में अन्नकूट का उत्सव प्रारंभ हुआ।

पूजा-विधि 

मार्गशीर्ष मास की पूजा में सबसे पहला नियम है- शुद्धता। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, स्नान करना और स्वच्छ वस्त्र पहनना अनिवार्य है। यदि कोई मंदिर में पूजा कर रहा है तो पहले स्थल की धूल मिट्टी साफ की जाती है, जल छिड़का जाता है और भगवान की मूर्ति के सम्मुख घी या तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है। घर में पूजा के लिए उत्तर या पूर्व दिशा में पीले वस्त्र का आसन बिछाकर श्रीविष्णु का चित्र या मूर्ति रखी जाती है।

पूजा-सामग्री में सामान्यतः ये वस्तुएँ होती हैं- गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), तुलसीदल, पीले फूल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, पीले वस्त्र, फल, और घी का दीपक।

पूजा का क्रम इस प्रकार है: पहले आचमन और शुद्धिकरण मंत्र बोलकर आत्मशुद्धि की जाती है-  “ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः।”

फिर भगवान विष्णु को पंचामृत स्नान कराया जाता है। स्नान के समय यह मंत्र उच्चारित किया जाता है-  “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। दूधेन स्नापयाम्यहम्, दध्ना स्नापयाम्यहम्, घृतेन स्नापयाम्यहम्, मधुना स्नापयाम्यहम्।” इसके बाद गंगाजल से शुद्ध जल स्नान कराना आवश्यक है ताकि पंचामृत का अवशेष हट जाए।

अब भगवान को पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं, चंदन और अक्षत चढ़ाए जाते हैं। तुलसीदल अर्पित करते समय कहा जाता है- “तुलसीदलमत्रं यस्य नारायणस्य सुप्रीतम्।” अर्थात भगवान नारायण तुलसीदल से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। फिर नैवेद्य चढ़ाया जाता है। इस मास में भोग में विशेष रूप से खीर, पीले चावल, गुड़, घी और तुलसी मिश्रित लड्डू अर्पित करने का विधान है। भोग लगाते समय यह मंत्र कहा जाता है-  “नैवेद्यं गृह्यतां देव त्रैलोक्यनाथ जनार्दन।”

इसके बाद आरती की जाती है- “जय देव जय देव जय श्रीहरि, जय लक्ष्मी रमणा जय जनार्दन।” पूजन के अंत में दीपदान, प्रदक्षिणा और क्षमा-याचना की जाती है।

मंदिरों में यह पूजा अधिक विधिवत होती है। वहाँ पंचामृत स्नान के बाद दूध-अभिषेक, फिर जल-अभिषेक, उसके बाद वस्त्र-श्रृंगार, गंध, फूल और अंत में महाभोग और आरती की जाती है। कई प्रमुख विष्णु मंदिरों में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन सहस्त्र-धारा अभिषेक का आयोजन किया जाता है जिसमें भक्त मिलकर भगवान को हजार कलशों के जल से स्नान कराते हैं।

विशेष भोग-प्रसाद

इस मास में भगवान विष्णु को जिन व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, उनमें सबसे प्रमुख हैं-खीर, पंचामृत, घी-लड्डू, अन्नकूट (विभिन्न सब्जियों का मिश्रण), और तुलसी-दल युक्त मिठाइयाँ। कहीं-कहीं मूँग दाल के हलवे और गुड़ से बनी खिचड़ी का भी भोग लगाया जाता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर अन्नकूट उत्सव में सौ से अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से भगवान को अर्पित किया जाता है और बाद में भक्तों में बाँटा जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि इस मास में किया गया अन्नदान सौगुना फल देता है। स्कन्दपुराण के अनुसार-“अन्नं ब्रह्मेति प्रोक्तं तस्मात् अन्नं प्रदीयताम्।” अर्थात अन्न स्वयं ब्रह्म है, इसलिए अन्नदान सर्वोच्च दान है।

मंत्र और जप

पूजा के समय मुख्य रूप से निम्न मंत्रों का प्रयोग किया जाता है –

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”
“ॐ नारायणाय नमः।”
“ॐ विष्णवे नमः।”
“ॐ श्रीकृष्णाय गोविन्दाय हरये नमः।”

इसके अलावा मार्गशीर्ष मास में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। मोक्षदा एकादशी के दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस तिथि को गीता-जयंती के रूप में मनाया जाता है।

वैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण

अगर इस मास के नियमों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पाएँगे कि इनमें गहरा व्यावहारिक आधार छिपा है। इस समय ठंड का मौसम आरंभ होता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को सशक्त करने के लिए सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से स्नान करना रक्त परिसंचरण को सक्रिय करता है।

पंचामृत में प्रयुक्त पदार्थ-दूध, दही, घी, शहद और शक्कर – सभी में पोषक तत्व और एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं। तुलसी में ऑक्सीजन उत्सर्जन की क्षमता अधिक है और उसके पत्तों में यूजेनॉल नामक तत्व रोगाणुनाशक है। पूजा में तुलसी का प्रयोग न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी वातावरण को शुद्ध करता है। दीपक में प्रयुक्त घी या तिल का तेल जलने से वायुमंडल में शुद्धता बढ़ती है। यह सुगंधित धुआँ कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायक होता है। इस प्रकार मार्गशीर्ष मास की धार्मिक परंपराएँ मनुष्य के स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानसिक संतुलन के लिए भी लाभकारी सिद्ध होती हैं।

 सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप

भारत के अनेक राज्यों में यह मास लोकजीवन से गहराई से जुड़ा है। उत्तर भारत में इसे अगहनी कहा जाता है। गाँवों में धान कटने के बाद लोग नई फसल का अन्नकूट बनाकर भगवान को अर्पित करते हैं। महिलाएँ तुलसी-विवाह करती हैं। मंदिरों में गीता-जयंती, अन्नकूट-महोत्सव और सामूहिक भंडारे आयोजित किए जाते हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई भागों में इस समय सूर्य-उपासना और गंगा-स्नान की भी परंपरा है।

भागवत और स्कन्दपुराण का संदर्भ

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण का व्रजवास वर्णित है। उसमें कहा गया है कि मार्गशीर्ष मास में गोपियों ने श्रीकृष्ण की आराधना हेतु व्रत किया था, जिससे उन्हें भगवान के सान्निध्य का सौभाग्य मिला। स्कन्दपुराण में मार्गशीर्ष मास को “पापहर” कहा गया है। उसमें लिखा है- “मार्गशीर्षे तु यः स्नानं कुर्याद् भक्त्या जनार्दने, स सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते।”

मार्गशीर्ष मास न केवल एक धार्मिक पर्व है बल्कि यह जीवन का अनुशासन सिखाने वाला काल है। यह मनुष्य को शुद्धता, नियमितता और श्रद्धा का संदेश देता है। खेतों में अन्न की बहार के साथ यह मास आत्मा की उर्वरता को भी जगाता है। जो व्यक्ति इस मास में स्नान, दान, तुलसी-पूजन, गीता-पाठ और हरिनाम-स्मरण करता है, उसे भौतिक समृद्धि के साथ मानसिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मास की परंपरा हमें सिखाती है कि जब प्रकृति अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होती है, तब मनुष्य को भी अपने भीतर की अशुद्धियों को धोकर ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए।

वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, उज्जैन, पुरी और द्वारका जैसे तीर्थों में यह महीना धार्मिक उत्सवों से भरा रहता है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, कथा-प्रवचन और अन्नदान के आयोजन होते हैं। गंगा तटों पर हजारों भक्त प्रातःकाल स्नान कर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करते हैं। इस प्रकार मार्गशीर्ष मास धर्म, संस्कृति और विज्ञान-तीनों के अद्भुत संगम का प्रतीक है। यह बताता है कि सनातन परंपरा में हर नियम के पीछे कोई न कोई जीवनोपयोगी सत्य निहित है। इस मास की आराधना करने वाला व्यक्ति न केवल ईश्वर के समीप आता है बल्कि अपने जीवन को भी शुद्ध, संतुलित और सार्थक बना लेता है।

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डिस्क्लेमर:इस लेख में प्रस्तुत धार्मिक, पौराणिक और ज्योतिषीय जानकारियाँ पारंपरिक ग्रंथों, लोक-मान्यताओं और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी और सांस्कृतिक जागरूकता प्रदान करना है। पाठकों से निवेदन है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या पूजा-विधि को अपनाने से पूर्व अपने गुरु, आचार्य या पारिवारिक परंपरा के अनुसार परामर्श अवश्य लें। लेखक या प्रकाशन संस्था इसकी सत्यता या परिणाम की कोई गारंटी नहीं देती। यह लेख किसी विशेष मत, संप्रदाय या विचारधारा के प्रचार हेतु नहीं है।

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