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इस बार राजस्थान का चुनाव वसुंधरा नहीं, बल्कि मोदी के नाम पर लड़ेगी भाजपा !

  • रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान विधानसभा के चुनाव होने में चार महीने से भी कम का समय रह गया है। सभी राजनीतिक दल अपनी चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। प्रदेश में सत्तारुढ़ कांग्रेस व भाजपा ने भी अपना सांगठनिक ढांचा मजबूत बना लिया है। मंडल, ब्लॉक, जिला से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हो चुका है। कांग्रेस पार्टी चुनाव में जाने को पूरी तरह तैयार नजर आ रही है। ऐसे में भाजपा भी जोरों से चुनावी तैयारियां कर रही है। भाजपा के बड़े नेता चाहते हैं कि राजस्थान में हर बार राज बदलने की परंपरा को इस बार भी कायम रखा जाए। उसी परंपरा के तहत प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार बनाई जाए।

इस बार के चुनाव में भाजपा पहले से हटकर कुछ नया करने जा रही है। भाजपा द्वारा राजस्थान विधानसभा के अब तक लड़े गये सभी चुनावों में पार्टी एक नेता का नाम घोषित कर उनके चेहरे पर चुनाव लड़ती रही थी। पहले भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान में भाजपा के चेहरे हुआ करते थे। उनके बाद 2003 से लेकर 2018 तक के चुनाव में वसुंधरा राजे को नेता घोषित कर पार्टी चुनाव लड़ती रही थी। मगर इस बार के चुनाव में ऐसा नहीं होगा। इस बार भाजपा आलाकमान ने पूरा चुनाव एक नए अंदाज में लड़ने का फैसला किया है। भाजपा इस बार राजस्थान के किसी भी नेता को पार्टी का चेहरा घोषित कर चुनाव नहीं लड़ेगी। पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। इसका खुलासा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजस्थान दौरे के दौरान सीकर मीटिंग में पूरी तरह हो चुका है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा हाल ही में घोषित की गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वसुंधरा राजे को फिर से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। यह इस बात का संकेत है कि उनको राजस्थान की राजनीति से हटाकर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय किया जाएगा। हालांकि वसुंधरा राजे पिछले लंबे समय से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनी हुई हैं। मगर उनके पास दिल्ली में पार्टी की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है। पिछले दिनों जरूर उनको झारखंड की चार लोकसभा सीटों कोडरमा, दुमका, गिरिडीह और गोड्डा भेजकर पार्टी के पक्ष में प्रचार करवाया गया था। उसके अलावा उन्होंने आज तक राष्ट्रीय पदाधिकारी के रूप में किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं निभाई है।

वसुंधरा राजे स्वयं राजस्थान नहीं छोड़ना चाहती हैं। उनके समर्थक भी चाहते हैं कि राजे प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय रहें। ताकि अगले विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल सके। मगर भाजपा आलाकमान किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं होने देना चाहता है। इसीलिए पार्टी ने फैसला किया है कि अगला विधानसभा चुनाव बिना नेता के ही लड़ेंगे।

भाजपा राजस्थान में कांग्रेस सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार के मुद्दे को हवा देना चाहती है। राजस्थान में पेपर लीक प्रकरण, राजस्थान लोक सेवा आयोग प्रकरण, शिक्षक भर्ती घोटाला व भ्रष्टाचार के अन्य मुद्दों को हवा देकर भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाना चाहती है। ऐसे में यदि भाजपा वसुंधरा राजे को चेहरा बनाकर चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा कमजोर हो जाएगा। वसुंधरा राजे के आगे आते ही कांग्रेस भाजपा का हथियार उन्हीं के खिलाफ प्रयोग में ला सकती है। इसी डर से भाजपा आलाकमान वसुंधरा राजे को आगे नहीं कर रहा है। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के बहुत से मामले उजागर हुए थे। कांग्रेस नेता सचिन पायलट तो अभी भी वसुंधरा राजे सरकार के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच की मांग करते आ रहे हैं।

वसुंधरा राजे पर मुख्यमंत्री रहते एक चौकड़ी से घिरे रहने के आरोप भाजपा के ही नेता लगाते रहे थे। वही पुरानी चौकड़ी आज भी वसुंधरा राजे के चारों तरफ नजर आ रही है। वसुंधरा समर्थक कालीचरण सर्राफ, यूनुस खान, भवानी सिंह राजावत, रोहिताश शर्मा, देवी सिंह भाटी, अशोक परनामी, प्रताप सिंह सिंघवी, प्रह्लाद गुंजल, अशोक लाहोटी, सिद्धि कुमारी, रामचरण बोहरा जैसे नेता आज भी उनको घेरे रहते हैं। इससे वसुंधरा राजे की आम जनता में नकारात्मक छवि बन चुकी है। वसुंधरा राजे समर्थकों ने तो दो साल पहले वसुंधरा राजे विचार मंच नामक एक संगठन बनाकर प्रदेश में भाजपा के समानांतर संगठन चलाने का भी प्रयास किया था। मगर उसे ज्यादा समर्थन नहीं मिलने के कारण वह संगठन निष्क्रिय-सा हो चुका है।

पिछले विधानसभा चुनाव में तो वसुंधरा राजे के खिलाफ जनता का आक्रोश इतना अधिक हो गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में आयोजित चुनावी जनसभाओं में जनसमूह ‘मोदी तुझसे बैर नहीं वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ के नारे लगाता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार के बावजूद भी 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को राजस्थान में करारी हार का सामना करना पड़ा। भाजपा 163 से घटकर 73 विधानसभा सीटों पर सिमट गई थी। यानी भाजपा को उन 90 विधानसभा क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा था जहां उनके प्रत्याशी 2013 के विधानसभा चुनाव में जीते थे। 2018 की चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं देखा था कि वसुंधरा राजे के खिलाफ आमजन में कितना आक्रोश व्याप्त है।

उसी के चलते 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वसुंधरा राजे को चुनाव प्रचार से दूर ही रखा था। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में भी वसुंधरा राजे शामिल नहीं होती थीं। 2019 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार प्रदेश की सभी 25 लोकसभा सीटें जीती थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के सभी बड़े नेताओं का मानना है कि प्रदेश में आज भी वसुंधरा राजे की नकारात्मक छवि से भाजपा को नुकसान हो सकता है। इसीलिए उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में लाकर दूसरे प्रदेशों में प्रचार करवाया जाए। राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे का पिछली बार सबसे अधिक विरोध उनके राजपूत समाज ने ही किया था। आनंदपाल एनकाउंटर के चलते राजपूत समाज खुलकर वसुंधरा राजे के खिलाफ हो गया था। जिसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रदेश में हो रही जनसभाओं में भी वसुंधरा राजे को बोलने का अवसर नहीं मिल रहा है। इसका भी सीधा-सीधा संदेश है कि पार्टी उन्हें प्रदेश की राजनीति में ज्यादा तवज्जो नहीं देना चाहती है। विधानसभा में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा वसुंधरा राजे का खुलकर आभार जताने के बाद प्रदेश की जनता को गहलोत-वसुंधरा के मिलीभगत की राजनीति का भी पता चल गया। वैसे भी वसुंधरा राजे विपक्ष की राजनीति में अधिक सक्रिय नहीं रहती हैं। पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते उनको लगातार प्रदेश में घूम-घूम कर पार्टी को मजबूत करना चाहिए था। उस समय वसुंधरा राजे अपने को धौलपुर महल तक ही सीमित कर लेती हैं। ऐसी कई बातें हैं जिनके चलते वसुंधरा राजे को प्रदेश की राजनीति से दूर किया जा रहा है। वह पार्टी से विद्रोह नहीं कर सकें इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी बनाए रखा गया है।

वसुंधरा राजे अब कितना भी जोर लगा लें उनको नेता घोषित नहीं किया जाएगा। वह चाहती हैं कि उन्हें चुनाव समिति या प्रचार समिति का ही अध्यक्ष बना दिया जाए। मगर मौजूदा परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि भाजपा आलाकमान उन्हें शायद ही प्रदेश में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे। उनको बैलेंस रखने के लिए उनके समर्थक किसी नेता को चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। मगर मौजूदा परिस्थिति में वसुंधरा राजे का प्रदेश में नेता बनना मुश्किल ही नहीं असंभव-सा नजर आ रहा है।

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

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