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महामारी खत्म करने का उपहार भी साबित हो सकता है ओमिक्रॉन ?

  • प्रमोद भार्गव

जब भारत समेत पूरी दुनिया में ओमिक्रोन का खतरा सिर पर मंडरा रहा हो, तब ओमिक्रोन को नए साल का उपहार मानने के दावे चौंकाते हैं।क्योंकि बंदिशें शुरू हो गईं हैं। देश के कई राज्यों ने भीड़ पर नियंत्रण के लिए धारा 144 और रात्रिकालीन कर्फ्यू लगा दिए हैं। केंद सरकार ने भी प्रतिबंध संबंधी दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि मात्र एक व्यक्ति की मौत बचाने के लिए भी मौज़ मस्ती पर रोक आवश्यक है।हालांकि भारत में ओमिक्रोन का खतरा इसलिए कम है क्योंकि 60 प्रतिशत से अधिक लोगों को टीका की दोनों खुराकें लग चुकी हैं।एकल खुराक भी सवा अरब लोगों को दी जा चुकी है।तिस पर भी वैज्ञानिकों के एक वर्ग का यह भी मानना है कि कोविड का नया रूप इस महामारी को खत्म कर साधारण बीमारी सर्दी-जुकाम तक सीमित कर हमेशा के लिए समाप्त भी कर सकती है।क्योंकि नए रूप का फैलाव तो ज्यादा है, लेकिन अभी तक इसकी घातकता देखने में नहीं आई है।

यह दावा महामारी विशेषज्ञ प्राध्यापक कर्ल लूटरबैच ने किया है।अतएव ओमिक्रोन का डेल्टा की मिलावट से निर्मित यह बहुरूप इस नाते सकारात्मक भी साबित हो सकता है।इसीलिए इसे क्रिसमस और नए साल का उपहार भी माना जा रहा है। लेकिन इसकी सत्यता जानने के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी होगी।गोया इस दौरान सावधानियां भी बरतनी जरूरी हैं।यही नहीं यह भी अभी संदिग्ध है कि विषाणु के इस नए रूप का उदगम किस देश से हुआ है।असल में इसरायल के डॉ एलाड माओर का दावा है कि दक्षिण अफ्रीका में इसका पहला मामला आने के दस दिन पहले ही ब्रिटेन के दो डॉक्टर ओमिक्रोन से संक्रमित हो गए थे।यहां गौरतलब यह भी है कि पश्चिमी देश अक्सर अपनी बुराईयां दक्षिणी देशों पर डाल देते हैं।एड्स के विषाणु के संदर्भ में भी यही हुआ था।

वैसे तो 24 नवंबर को सबसे पहले कोरोना के नए रूप की पहचान की थी।इसी के अगले दिन, यानी 25 नवंबर को डब्ल्यूएचओ ने इसका नाम `ओमिक्रोन`देते हुए `वैरिएंट ऑफ कन्सर्न`रख दिया।मसलन चिंता का बहुरूप!तब से अब तक यह रूप करीब 100 से भी ज्यादा देशों में फैल चुका है और ब्रिटेन में 12 व अमेरिका में एक व्यक्ति की मृत्यु भी हो चुकी है।डब्ल्यूएचओ भी इस तथ्य की पुष्टि करता है।दक्षिण अफ्रीका के सबसे बड़े हेल्थ केयर सेंटर के सीईओ रिचर्ड फ्रेडलैंड ने भी कहा है कि `इससे लोग जरूर अधिक संक्रमित हो रहे हैं, लेकिन लक्षण गंभीर नहीं हैं।स्पेनिश फ्लू की भी यही प्रकृति है।`हालांकि यह प्रतिरूप टीका लगवा चुके लोगों में भी खूब फैल रहा है।किंतु लक्षण कमजोर हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों की जिनोम सीक्वेसिंग की निगरानी करने वाली वैज्ञानिकों की संस्था इन्साकॉग का मानना है कि यह नया ओमिक्रॉन का रूप अगर डेल्टा वायरस से मिश्रित होता है तो गंभीर संकट के हालत पैदा हो सकते हैं। हालांकि इस मिश्रण के कोई साक्ष्य अब तक सामने नहीं आए हैं।कोरोना की पहली और दूसरी लहर में शुरुआती लक्षण स्वाद और सूंघने की क्षमता का गायब हो जाना था।जबकि ओमिक्रोन में ऐसा नहीं है।इसलिए इसकी वास्तविकता तभी सामने आएगी,जब रोगी की जीनोम सिक्वेंसिंग जांच होगी।यह जांच महंगी होने के साथ मंद गति से होती है।तीन सप्ताह तक का समय इसमें लग सकता है।हालांकि भारतीय अनुवांशिक वैज्ञानिकों का एक समूह का मानना है कि यदि आरटी-पीसीआर जांच को आंशिक तौर से न करके संपूर्ण तौर से किया जाए तो शरीर में इसके लक्षणों का पता चल सकता है।पूरी जांच में इसकी चार जींस एन, एस, ई और ओआरएस की जींस में उपस्थिति का परीक्षण किया जाता है।

यदि जांच के परिणाम में यह निष्कर्ष निकलता है कि इन जींन्सों में से `एस` जींस विलोपित है और अन्य तीनों उपलब्ध हैं तो नमूने में ओमिक्रोन के लक्षण हैं।लेकिन इस रूप की एक अन्य विलक्षणता के बारे में सीएसआईआर इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी के निदेशक अनुराग अग्रवाल ने कहा है कि `इस रूप में शरीर की रोग प्रतिरोधक संरचना को भेदने की क्षमता है,जो अब तक मिले कोरोना के अन्य प्रारूपों में नहीं थी।इस कारण यह खतरनाक हो सकता है।` डॉ अग्रवाल ने ही जब कोरोना का नया रूप डेल्टा प्लस डर का माहौल बना रहा था, तब सटीक भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि यह डेल्टा तीसरी लहर की वजह नहीं बनेगा।यह बात डॉ अग्रवाल ने महाराष्ट्र से लिए गए 3500 से ज्यादा नमूनों की जीनोम सिक्वेंसिंग जांच के बाद कही थी।बावजूद ओमिक्रोन के भारत में ज्यादा घातक होने की आशंका इसलिए भी कम है,क्योंकि 80 फीसदी आबादी में प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है।

कोरोना के इस रूप का वैज्ञानिक नाम बी.1.1.529 रखा गया है। इसकी सबसे पहले पहचान दक्षिण अफ्रीका में जरूर हुई है,लेकिन नीदरलैंड, स्कोटलैंड और अब इजरायल के चिकित्सक एलाड माओर ने कहा है कि इस ओमिक्रोन रूप का दक्षिण अफ्रीका में पता चलने से 10 दिन पहले ही वे ब्रिटेन में संक्रमित हो गए थे।कार्डियोलॉजिस्ट माओर 19 नवंबर को लंदन पहुंचे थे, वहां चार दिन रुकने के बाद जब इजरायल वापस आ गए, तब उन्हें कोरोना के लक्षण महसूस हुए और ओमिक्रोन पॉजिटिव पाए गए।लेकिन यूरोप के इन देशों ने ओमिक्रोन की मौजूदगी को छिपाए रखा।दरअसल पश्चिमी देशों की हमेशा ही मंशा किसी भी बुराई को विकसित देशों पर लाद देना रही है।चीन ने भी यही खुराफात की थी,जिसका दुष्परिणाम आज भी दुनिया भोगने को अभिशप्त है।इस लिहाज से हमें दक्षिणी अफ्रीका का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने इस नए रूप की पहचान होते ही दुनिया को सचेत कर दिया।

सुविधाभोगी यूरोप में इसका विस्तार सबसे ज्यादा देखने में आया है। इस कारण भारतीय वैज्ञानिक चिंतित हैं। नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ विनोद स्कारिया का कहना है कि पहली बार कोविड-19 ऐसा विचित्र विषाणु देखने में आया है, जो 32 बार अपना स्वरूप परिवर्तन कर चुका है। इस वायरस की स्पाइक सरंचना में सबसे अधिक बदलाव हुए हैं। इसी वजह से `ब्रेक थ्रू इन्फेक्शन` (वैक्सीन लेने के बावजूद दोबारा संक्रमित होना) के मामले दर्ज किए जाते हैं। इसलिए भारत में यह रूप प्रवेश करने के बाद यदि बाईदवे इसका संयोग डेल्टा वायरस के रूपों से बन जाता है, तो यह खतरनाक हो सकता है। क्योंकि इस मिश्रण के बाद यह कैसा होगा, वैज्ञानिकों को फिलहाल यह जानकारी नहीं है। क्योंकि अकेले डेल्टा रूप में ही 25 बार परिवर्तन हो चुका है। इन्साकॉग के अनुसार भारत में अब तक 1.15 लाख नमूनों की जिनोम सिक्वेसिंग की गई है, इनमें से 45,394 नमूने गंभीर पाए गए हैं।

लेकिन ओमिक्रॉन, यदि सावधानी नहीं बरती गई तो एक बार फिर बढ़ते कदमों में बेढ़िया डाल सकता है। वैज्ञानिकों की ऐसी धारणा है कि वायरस जब परिवर्तित रूप में सामने आता है तो इसके पहले रूप आप से आप समाप्त हो जाते हैं। लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि अपवादस्वरूप नया रूप खतरनाक अवतार में भी पेश आया है। इसी कारण अब तक एड्स के वायरस का टीका नहीं बन पाया है। दरअसल स्वरूप परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक एक रूप की संरचना को ठीक से समझ भी नहीं पाते और इसका नया रूप सामने आ जाता है। भारत में कोरोना के वर्तमान में छह प्रकार के रूप प्रसार में हैं और डेल्टा प्लस सातवां रूप है। लेकिन अकेला डेल्टा ही 25 रूप धारण कर चुका है।ओमिक्रोन तो 32 स्पाइक म्यूटेशन वाला वायरस बताया गया है।हालांकि प्रकृति में किसी भी विषाणु का रूप परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

ओमिक्रोन के शुरुआती संक्रमण के आधार पर जब रूप के स्वांग या व्यवहार (सिमुलेशन)का कंप्यूटर पर परिणाम के लिए गणितीय आकलन किया जाता है, उसमें उसके फैलाव और घातकता का पता चलता है।इसका फैलना तो तय है,लेकिन घातकता निश्चित नहीं है।भारत में इसके ज्यादा घातक होने की आशंका इसलिए कम है,क्योंकि तीन सुरक्षा कवचों के जरिए इसे रोकने के प्रबंध जारी हैं।एक सीरो सर्वे,दूसरे 60 प्रतिशत आबादी का दोनों टीकों का लगना और तीसरे, डेल्टा वैरिएंट का संक्रमण व्यापक स्तर पर फैलने से लोगों में प्रतिरोधक क्षमता का प्राकृतिक रूप से विकसित हो जाना।गोया,ओमिक्रोन का संक्रमण बढ़ता भी है तो ये सुरक्षा कवच उसकी गंभीरता को नियंत्रित रखेंगे।साथ ही बूस्टर डोज के लिए भी देश की प्रयोगशालाओं में क्लीनिकल ट्रायल पर भी तेजी से कम चल रहा है।हालांकि भारत ने अभी बूस्टर खुराक लगाए जाने का कोई फैसला नहीं लिया है।बालकों के टीकाकरण का भी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है,जबकि पूरे देश में स्कूल खुल गए हैं।

कोरोना सबसे पहले चीन के वुहान में मिला था। यहीं से दुनिया में सबसे अधिक फैला है। इसे ही चीन के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित कृत्रिम वायरस भी कहा गया है। लेकिन अभी तक यह सच्चाई सामने नहीं आई है कि वाकई कृत्रिम है या प्राकृतिक। इसके बाद 614 जी और ए-222 वायरस हैं, जो यूरोप में कहर ढा रहे हैं। डेल्टा, डेल्टा प्लस के अवतार में कैसे आया, यह अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इसकी संरचना पूर्व के वायरसों से बहुत ज्यादा भिन्न है, इसीलिए इसके फैलने की क्षमता भी ज्यादा रही है। दरअसल वायरस अपनी मूल प्रकृति से परजीवी होता है। इसलिए यह जब मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो कोशिका (सेल) पर अनाधिकृत अधिकार जमाकर विकसित होने लगता है। इसकी संख्या में तब और ज्यादा गुणात्मक वृद्धि होती है, जब इसे न्यूनतम प्रतिरोधी क्षमता वाला शरीर मिल जाता है। ऐसे रोगियों के शरीर से शक्ति ग्रहण कर यह अधिक ताकतवर होकर बाहर निकलता है। इसीलिए वैज्ञानिक यह कह रहे हैं कि अधिक शक्तिशाली वायरस के आ जाने से इसी किस्म के पूर्व वायरसों की किस्में आप से आप खत्म होती चलती हैं। गोया, ओमिक्रॉन डेल्टा से ज्यादा ताकतवर हुआ तो डेल्टा की किस्में समाप्त हो जाएंगी।

ओमिक्रॉन वायरस तेजी से फैल तो रहा है, लेकिन उसी अनुपात में घातक भी है, ऐसे कोई वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ सौम्या स्वामीनाथन ने टीकाकरण को लेकर आशा जताई है कि, `फिलहाल ज्यादा डर इस बात को लेकर है कि टीका कारगार है अथवा नहीं। जबकि किसी भी वायरस का ऐसा कोई रूप नहीं होता, जो शत-प्रतिशत वैक्सीन के प्रभाव को निष्क्रिय कर दे। यदि शरीर में टीका की वजह से प्रतिरक्षातंत्र मजबूत हुआ है तो वह नए रूप से रक्षा जरूर करेगा।` साफ है, जिन लोगों ने टीके नहीं लगवाए हैं, वह जल्द से जल्द टीका लगवा लें। दरअसल ओमिक्रॉन से ज्यादा दहशत इसलिए फैल रही है, क्योंकि यह डेल्टा से सात गुना ज्यादा गति से फैल रहा है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका के जिन क्षेत्रों में यह ढाई माह पहले से फैल रहा है, वहां इन्हीं ढाई माह में नई मरीजों के आने और मौतों में गिरावट दर्ज की जा रही है। यह दावा अफ्रीक्रन मेडिकल ऐसोसिएशन ने किया है। इस संस्था का यह भी दावा है कि यह रूप 45 नए रूप ले वुका है, बावजूद मौतों में गिरावट तो जारी है ही, इससे सक्रंमित होने वाले मरीज गंभीर नहीं है। उनमें जो लक्षण है, वे भी मामूली है, जो उपलब्ध दवाओं और टीके के प्रभाव से नियंत्रित हो रहे हैं। जाहिर है, इन साक्ष्यों के मद्देनजर ओमिक्रॉन ज्यादा खतरनाक नहीं है।

भारत समेत पूरी दुनिया में जो वैक्सीन लगाई जा रही हैं, वे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सक्षम हैं। लिहाजा वायरस नए रूपों में परिवर्तित होता भले ही चला जाए, वह टीके को निष्प्रभावी नहीं कर पाएगा। हालांकि इस धारणा के विपरीत ग्लास्गो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर डेविड का कहना है, `हो सकता है वायरस ऐसा परिवर्तन कर ले, जो टीके के असर से बच जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर हालात फ्लू जैसे हो सकते हैं। नतीजतन वैक्सीन को अपडेट करना जरूरी हो जाएगा।’ कोरोना की जो वैक्सीन बन रही हैं, वे इतनी लचीली हैं कि उनमें कोरोना के बदलते स्वरूप के आधार पर बदलाव आसानी से किए जा सकते हैं। लेकिन अपडेट करने से पहले वायरस के नए अवतार की संपूर्ण संरचना को समझना जरूरी होगा, इसमें पर्याप्त समय तो लगता ही है, धीरज रखने की भी जरूरत पड़ती है।

ओमिक्रॉन की सरंचना के परीक्षण के बाद जो आरंभिक साक्ष्य मिले है, उनसे पता चला है कि यह रूप उन लोगों को ज्यादा प्रभावित कर सकता है, जो कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। यानी री-इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा है। अर्थात जो लोग कोविड-19 की चपेट में आकर ठीक हो चुके हैं, वे इसकी चपेट में फिर से आ सकते है। कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में ओमिक्रौन के करीब 27 रूप ऐसे बताए जा रहे हैं, जो आसानी से फैल सकते हैं। दिल्ली स्थित सीएसआइआर-जिनोमिकी और समवेतजीवविज्ञान संस्थान (आइजीआइबी) में के वैज्ञानिक विनोद स्कारिया के मुताबिक डेल्टा प्लस सॉर्स सीओवी-2 के स्पाइक प्रोटीन में हुए परिवर्तन से बना था। वैज्ञानिको का कहना है कि ओमिक्रॉन बीटा और डेल्टा रूपों से अनुवंशिक रूप से भिन्न है। लेकिन फिलहाल ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि अनुवांशिक परिवर्तन इसे ज्यादा खतरनाक बना पाते हैं अथवा नहीं ? इसलिए यह उम्मीद भी बंधी है कि ओमिक्रॅन बीमारी को गंभीर बीमारी में बदलने में सक्षम नहीं है। इस लिहाज से कोरोना के इस नए अवतार से भयभीत होने की बजाय सावधानी बरतने की जरूरत है। संभव है वैज्ञानिकों के एक वर्ग का इसे नए साल का उपहार मानने की जो उम्मीद है, वही सही निकले।

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