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खास संयोग में अखंड सौभाग्य के लिए 30 मई को वट सावित्री पूजन, घरों में तैयारी

वाराणसी । इस बार खास संयोग में सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए 30 मई सोमवार को वट सावित्री व्रत रखेंगी। सनातन धर्म में हर साल ज्येष्ठ मास के अमावस्या तिथि को ये व्रत सुहागिन महिलाएं रखती है। पर्व पर सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की खास तौर पर पूजा करती है। वाराणसी में मीरघाट, धर्मकूप स्थित वट सावित्री माता के पूजन के लिए भी महिलाओं की भीड़ जुटती हैं। पर्व पर इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग, सोमवती अमावस्या और शनि जयंती का विशेष संयोग बन रहा है।

ज्योतिषविद मनोज पाठक ने बताया कि सनातन धर्म में बरगद को देव वृक्ष माना गया है। इसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को फिर से जीवित कराया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखा जाता है। वट सावित्री व्रत को ‘बरगदाही’ अमावस्या भी कहते हैं। वट सावित्री पूजन को लेकर पौराणिक मान्यता है कि भद्र देश के राजा की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख वटवृक्ष पूजन किया। और उसके बाद पति के प्राण लेकर यमराज जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल दी।

सावित्री के पतिव्रता धर्म के आगे बेबस यमराज ने उनसे वरदान मांगने को कहा। इस पर सावित्री ने यमराज से कहा पहला वरदान सास-ससुर को नेत्र ज्योति, दूसरा वरदान पुत्रवती होने का मांगा। यमराज तथास्तु कह सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल दी। यमराज ने मुड़कर देखा कि वरदान देने के बाद भी सावित्री पीछे आ रही है तो उन्होंने पुन: पूछा अब क्या तो सावित्री ने पति को आप ले जा रहे हैं तो मैं पुत्रवती कैसे होऊंगी। यह सुन यमराज को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने सत्यावान के प्राण वापस कर दिए। ऐसी मान्यता है कि सावित्री ने वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख पूजन कर उनके प्राणों को वापस पाया था। इसी मान्यता के तहत वटसावित्री पूजन किया जाता है।

वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान के बाद वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करने के बाद वृक्ष पर जल चढ़ाती है। कच्चे सूत से वट के वृक्ष में सात बार परिक्रमा करते हुए बांधती है। वैदिक ग्रंथों के अलावा उपनिषद् में मृत्यु को भी चुनौती देने वाले वट प्रजाति के वृक्षों में बरगद को अमूल्य बताया गया है। इसकी जड़, छाल, पत्ते, दूध, छाया और हवा को न सिर्फ मनुष्य बल्कि धरती, प्रकृति के लिए जीवन-रक्षक माना गया है। जब भगवान राम वनवास के लिए निकले और प्रयागराज में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में आए, तब ऋषि ने जिस पेड़ की पूजा करने को, वह बरगद ही था।(हि.स.)

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