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पराली के धुएं से होने वाले ‘सियासी प्रदूषण’ से अब दिल्ली और पंजाब को मिलेगी निजात !

नई दिल्ली/चंडीगढ़ । धान और गेहूं की कटाई के बाद पराली को जलाए जाने से पैदा होने वाले प्रदूषण का मुद्दा हर साल दिल्ली, पंजाब और हरियाणा राज्यों के बीच सियासी वार-पलटवार का बड़ा मुद्दा बनता है। केंद्र और राज्य सरकारें इससे होने वाले प्रदूषण का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़कर अपना-अपना पल्ला झाड़ने में लगी रहती हैं। यहां तक हर बार केंद्र और राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सहनी पड़ती है लेकिन इस बार पराली की कीमतों में इजाफा होने से काफी हद तक निजात मिलने की उम्मीद जगी है।

पंजाब पशु पालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. राजीव छाबड़ा कहते हैं कि उत्तर पश्चिम भारत में पराली से जुगाली करने वाले जानवरों के लिए साल भर का चारा तैयार किया जाता है। पिछले कुछ समय से, खास कर उत्तर प्रदेश और राजस्थान में इसकी भारी मांग पैदा हुई है। इसके बाद देखा जा रहा है कि इस बार गेहूं की कटाई के बाद किसान पराली को जलाने के बजाय इसे जमा करने पर जोर देने की तैयारी में हैं।

छाबड़ा के मुताबिक, इस बार पराली की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। पहले जहां यह 3-4 रुपये प्रति किलो में बिकती थी, वहीं इस बार पराली 14-16 रुपये प्रति किलो बिकने के लिए तैयार है। पराली की कीमतों में अचानक हुई इस बढ़ोत्तरी को लेकर किसानों में भारी उत्साह है और उन्होंने पराली को सही दामों पर बेचने की पूरी तैयारी भी कर ली है।

पराली पर हर बार बढ़ता है सियासी प्रदूषण

गेहूं की पराली के दाम बढ़ने के बाद किसान धान की पराली को भी संचित करने की योजना बना रहे हैं। पिछले कई सालों से सियासत के गलियारों में बड़ा मुद्दा बन रही पराली को लेकर दिल्ली सरकार हर बार दावा करती है कि उसने दिल्लीवासियों को प्रदूषण से बचाने के लिए पर्याप्त इंतजाम किए हैं। इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा में जलने वाली पराली का धुआं हर बार दिल्ली के आसमान को अपनी आगोश में ले लेता है, जिससे गंभीर बीमारियां पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की सहनी पड़ती है फटकार

पराली से होने वाले प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार के अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों को सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होना पड़ता है। सुप्रीम की फटकार के सामने बेबस इन सभी राज्यों में पराली एक बड़ा सियासी मुद्दा बन जाती है और फिर शुरू हो जाता है एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला। बहरहाल, इस समय जिस तरह से किसान इसे स्टोर करने को लेकर उत्साहित हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि इस बार पराली के धुएं और सियासी प्रदूषण से काफी हद निजात मिलने की उम्मीद जरूर जगी है।(हि.स)

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