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बगैर बैटरी बिजली चालित वाहन

सोमेश केलकर
बिजली चालित वाहन यानी ऐसे दो या अधिक पहियों वाले वाहन जो उनमें लगी बैटरी में संग्रहित विद्युत की शक्ति से चलते हैं। इन वाहनों को चलाने के लिए पेट्रोल या डीज़ल की ज़रूरत नहीं होती। इस मायने में पर्यावरण पर इनका प्रभाव और इनके पर्यावरणीय पदचिंह न्यूनतम होते हैं।

आज तक बैटरी ऐसे वाहनों में अंतर्निहित होती थी और इनकी उम्र पूरी हो जाने (यानी जब इनमें पर्याप्त मात्रा में विद्युत संग्रहित नहीं रह पाती) पर इनकी जगह उसी किस्म की बैटरी की व्यवस्था करनी होती थी। इसका मतलब था कि वाहन निर्माता (मूल उपकरण निर्माता) को बैटरी बदलने में भी कमाई की उम्मीद रहती थी। चूंकि बैटरी उसी निर्माता से खरीदनी होती थी, इसलिए कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा ज़्यादा नहीं होती थी। उपभोक्ता की दृष्टि से यह बहुत लोकप्रिय नहीं था।

भारत में विद्युत वाहनों के लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी रहा है कि इनके भरोसे लंबी दूरी की यात्रा मुश्किल है। पेट्रोल/डीज़ल वाहन में तो फिर से र्इंधन भरवाना आसान होता है क्योंकि देश भर में पेट्रोल पंपों का जाल बिछा हुआ है और कदम-कदम पर पेट्रोल पंप मिल जाते हैं। बिजली वाहनों के साथ यह संभव हो सकता था बशर्ते कि रिचार्ज-योग्य बैटरी को उपभोक्ता स्वयं बदल सकते। ऐसा होता तो व्यक्ति अपने साथ एक से अधिक बैटरियां लेकर चलता और ज़रूरत पड़ने पर बदल लेता। फिर मंज़िल तक पहुंचने के बाद उन सबको एक साथ चार्ज कर लेता। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बैटरी बदली नहीं जा सकती, रीचार्ज ही करना होता है।
इस आलेख में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की है जो उपरोक्त मसले को संबोधित करती है। हालांकि इस अधिसूचना से कुछ कंपनियां खुश हैं लेकिन अन्य बहुत गदगद नहीं हैं।

अधिसूचना
13 अगस्त के दिन सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके बगैर बैटरी विद्युत वाहनों की बिक्री व पंजीयन की अनुमति दे दी है। अधिसूचना के मुताबिक, बैटरियां अब स्वतंत्र रूप से बेची व पंजीकृत की जा सकेंगी। दिलचस्प बात इस अधिसूचना का वक्त है क्योंकि कोविड-19 की वजह से ऑटो विक्रेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया था और यह अधिसूचना विद्युत वाहनों तथा यातायात के निजी उपायों में नई रुचि पैदा करेगी।

सवाल यह है कि विद्युत वाहनों के संदर्भ में बैटरी कितनी महत्वपूर्ण है। कहा जा सकता है कि बैटरी के बिना कोई विद्युत वाहन पहियों पर खड़ा एक ढांचा मात्र है। एक अच्छी बैटरी आपको अपने गंतव्य तक पहुंचाने के अलावा लगातार कुशलतापूर्वक वाहन को शक्ति देती है और फीडबैक भी उपलब्ध कराती है। उपभोक्ता की दृष्टि से देखें तो बगैर बैटरी के विद्युत वाहन खरीदना बेवकूफी होगी। तो फिर सरकार ने ऐसी अधिसूचना क्यों जारी की?

भारत सरकार को उम्मीद है कि इस अधिसूचना से बैटरियों की अदला-बदली को लेकर हिचक कम होगी। लेकिन इसने बैटरी के मानकों और सुरक्षा को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया है। अधिसूचना के पीछे मुख्य रूप से दो बातें हैं:
1. आशा है कि इससे बैटरियों की अदला-बदली को प्रोत्साहन मिलेगा और इसके चलते चार्जिंग का टाइम घंटों से घटकर मिनटों में रह जाएगा।
2. उम्मीद है कि इससे विद्युत वाहनों की शुरुआती कीमतों में कमी आएगी और इनकी मांग बढ़ेगी। ज़ाहिर है ऐसे वाहनों का उपयोग बढ़ने से प्रदूषण की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।
विद्युत वाहन व सम्बंधित क्षेत्रों के कुछ लोगों ने अधिसूचना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि विद्युत वाहनों में से बैटरी को हटा देने से ऐसे वाहनों की शुरुआती कीमतों में जो कमी आएगी उससे व्यापार के नए मॉडल्स के लिए रास्ते खुलेंगे। उद्योग के विशेषज्ञों का मत है कि रीचार्ज करने की बजाय बैटरी की अदला-बदली से चार्जिंग का समय बहुत कम हो जाएगा और यह एक बड़ा लाभ होगा।

विरोध
देखा जाए, तो यह समझना मुश्किल है कि क्यों विद्युत वाहन निर्माता इस विचार से खुश नहीं हैं क्योंकि बैटरी को अलग करके वाहनों की कीमत में कमी से मांग में जो वृद्धि पैदा होगी, वह उद्योग के लिए लाभदायक ही होगा। लेकिन लगता है कि मामला इतना सीधा-सादा भी नहीं है। कम कीमत के साथ सुरक्षा और गारंटी के मुद्दे जुड़े हैं। विद्युत वाहनों से जुड़ी बैटरियों पर 2-5 साल की गारंटी होती है। मूल उपकरण निर्माताओं का कहना है कि अदला-बदली योग्य बैटरियां होंगी तो वे बैटरी के कामकाज और सुरक्षा के अलावा स्वयं वाहन के लिए भी ऐसी गारंटी नहीं दे पाएंगे।

निर्माता अपने वाहन की सुरक्षा की जांच अपनी पसंद की बैटरी के साथ करते हैं। इससे उन्हें बैटरी के पॉवर और एक बार चार्ज करने पर तय किए गए फासले को लेकर वायदे करने में मदद मिलती है। लेकिन जब उपभोक्ता को वाहन के लिए कोई भी बैटरी चुनने की छूट मिल जाएगी तो निर्माता वाहन के प्रदर्शन को लेकर कोई वादा नहीं कर पाएंगे। स्वयं वाहन भी ठीक तरह से काम नहीं कर पाएगा क्योंकि हो सकता है कुछ बैटरियां रीचार्जिंग किए बगैर वाहन को ज़्यादा दूरी तक ले जाएं। कई बार ऐसा भी होता है कि निर्माता पूरे वाहन को किसी बैटरी-विशेष के हिसाब से डिज़ाइन करते हैं ताकि वह उस बैटरी से अधिकतम शक्ति का दोहन कर सके। जब बैटरी को वाहन से स्वतंत्र कर दिया जाएगा, तो किसी भी वाहन को इस तरह बनाना होगा कि वह नाना प्रकार की बैटरियों पर चल सके। इसका मतलब होगा कि शायद वाहन बैटरी से यथेष्ट शक्ति का दोहन न कर सके।

वर्तमान में, बैटरी-संलग्न वाहनों में निर्माता वाहन के साथ-साथ बैटरी की भी गारंटी देते हैं। यह उपभोक्ता के लिए एक आश्वासन होता है कि जब पहली बैटरी अपना जीवन काल पूरा कर लेगी तो नई बैटरी लगाने पर वाहन नए जैसा प्रदर्शन देगा। यह कारोबारी के लिए भी एक किस्म का आश्वासन होता है कि बैटरी बदलने में भी उनकी कमाई होगी। यदि बैटरी वाहन में एकीकृत न हुई तो वाहन निर्माता उसके लिए गारंटी नहीं दे सकेगा। और उपभोक्ता को किसी खामी के लिए वाहन निर्माता तथा बैटरी निर्माता को अलग-अलग जवाबदेह ठहराना होगा। बैटरी और वाहन के इस पृथक्करण के बाद शायद वाहन निर्माता वाहन के लिए भी पहले जैसी गारंटी न दे पाएं।
वाहन निर्माताओं को बैटरी के व्यापार चक्र से बाहर किया जाना भी रास नहीं आएगा क्योंकि ऐसा होने पर बैटरी बदलने में उनकी कोई भूमिका नहीं रहेगी जबकि बैटरी ही सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज़्यादा बदला जाने वाले घटक होगा।

कुछ लोग इस अधिसूचना का विरोध टैक्स नीति के नज़रिए से भी कर रहे हैं। जहां विद्युत वाहनों पर जीएसटी 5 प्रतिशत है, वहीं बैटरी पर 18 प्रतिशत जीएसटी आरोपित किया जाता है। इस तरह से उपभोक्ताओं और काफिला-मालिकों के लिए बगैर बैटरी का वाहन खरीदने को लेकर कोई स्पष्ट प्रलोभन नहीं है। यदि भारत सरकार चाहती है कि एक सेवा के रूप में बैटरी के कारोबार को बढ़ावा मिले तो टैक्स पर फिर से विचार करना होगा। लेकिन इस अधिसूचना के बाद विद्युत वाहनों और बैटरियों पर टैक्स के लिहाज़ से कोई संशोधन नहीं किया गया है। यानी नई नीति में निजी उपभोक्ताओं और काफिला-मालिकों के लिए प्रोत्साहन का अभाव बना हुआ है।
इसी सिलसिले में विद्युत वाहनों पर सबसिडी का सवाल भी है। भारत सरकार विद्युत वाहनों की कीमतें कम रखने के लिए सबसिडी देती है ताकि पर्यावरण-स्नेही यातायात को बढ़ावा मिले। लेकिन इस अधिसूचना ने वाहन और बैटरी के बीच दरार उत्पन्न कर दी है। फिलहाल स्थिति यह है कि सबसिडी अंतिम उत्पाद पर दी जाती है, उसके पुर्ज़ों पर नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र वाहन पर सबसिडी दी जाएगी, लेकिन बैटरी पर नहीं क्योंकि वह एक घटक है। इस संदर्भ में सबसिडी के ढांचे पर भी पुनर्विचार की ज़रूरत होगी।

उपभोक्ता
हालांकि इन कारोबार के इन दो मॉडल्स पर तनातनी चल रही है लेकिन अंतिम उपभोक्ता के लिहाज़ से कई फायदे नज़र आते हैं:
1. किसी परिवार के लिए विद्युत वाहन की शुरुआती कीमत में उल्लेखनीय कमी आएगी।
2. उपभोक्ता अब एकाधिक विद्युत वाहन खरीद सकेंगे और उन्हें उतनी ही संख्या में अलग-अलग बैटरियां नहीं खरीदनी होंगी।
3. बैटरी चार्ज करने की बजाय बैटरी बदलना अधिक सुविधाजनक होगा। यात्रा पर निकलते समय आपको सिर्फ एक स्पेयर बैटरी रखना होगी।
4. उपभोक्ताओं को अब विभिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई गई बैटरियों में से चुनने की छूट होगी। वे अपनी ज़रूरत और क्रय क्षमता के हिसाब से बैटरी चुन सकेंगे।

व्यापारिक दृष्टि से भी कई संभावित फायदे हैं। काफिला-मालिक अब बैटरी निर्माताओं के साथ गठबंधन कर सकते हैं ताकि वे उन्हें वाहन निर्माताओं की अपेक्षा बेहतर बैटरियां मुहैया करवाएं। इससे व्यापारिक वाहन मालिक जहां बैटरी निर्माताओं को व्यापार के अवसर उपलब्ध कराएंगे, वहीं उन्हें बैटरी की गुणवत्ता के लिए जवाबदेह भी बनाएंगे।

यहां एक सवाल यह भी उठता है कि बैटरी-मुक्त होने से वाहन की शुरुआती कीमत में कमी कैसे आएगी। कहा जा रहा है कि उपभोक्ता अब बाज़ार से अपनी ज़रूरत और क्रय क्षमता के हिसाब से कोई भी बैटरी खरीद सकेगा। इसका मतलब है कि वह वाहन और बैटरी का ऐसा संयोजन चुन सकेगा जो उससे सस्ता होगा जब वाहन निर्माता ही बैटरी चुनते थे। यह भी सही है कि बैटरी-रहित वाहन उस वाहन से तो सस्ता ही होगा जो बैटरी के साथ आता है। इस स्थिति में यदि किसी परिवार के पास पहले से ही कई सारे विद्युत वाहन हैं तो उसे एक नई बैटरी में निवेश करने की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि वह पुराने वाहनों की बैटरी का उपयोग कर सकेगा। इस तरह से वाहन की कीमत और भी कम हो जाएगी।

बैटरी बतौर सेवा
यह सही है कि यह अधिसूचना बैटरी को एक सेवा के बाज़ार के रूप में उछाल दे सकती है लेकिन उद्योग के विशेषज्ञ कई खामियों और इसके दुरुपयोग की संभावनाओं की ओर इशारा कर रहे हैं। जैसे, हो सकता है कि कुछ लोग ई-रिक्शा या ई-स्कूटर को सस्ता बनाने की जुगाड़ में सस्ती किंतु अस्थिर लेड-एसिड बैटरी लगा दें। यह भी संभव है कि कंपनी या व्यक्ति को बैटरी की अदला-बदली के दौरान घटिया बैटरी दे दी जाए। कुल मिलाकर चिंता मानकीकरण को लेकर है।

बहरहाल, बैटरी-बतौर-सेवा के मॉडल के लिए दो ही विकल्प हैं। या तो शहरों और कस्बों में बड़ी संख्या में बैटरी-बदल स्टेशन हों या हर स्तर पर ज़बर्दस्त एकीकरण हो। इन दोनों ही विकल्पों के लिए भारी मात्रा में पूंजीगत निवेश की ज़रूरत होगी। इस संदर्भ में यह बताया जा सकता है कि चीन में कई प्रांतीय सरकारें एनआईओ जैसे विशाल विद्युत वाहन निर्माताओं के साथ गठजोड़ कर रही हैं ताकि वे अधिक से अधिक स्टेशन स्थापित करें। एनआईओ ने एक योजना शुरू की है कि कार खरीदते समय उपभोक्ता एक स्वतंत्र बैटरी-योजना के ग्राहक बन जाएं।

भारतीय विद्युत वाहन बाज़ार के लिए एक समाधान यह हो सकता है कि वाहन निर्माताओं, बैटरी-सेवा प्रदाताओं, काफिला-मालिकों और बैटरी निर्माताओं का एक सहयोगी संघ बने। लेकिन ऐसा कोई संघ निकट भविष्य में तो बनता नहीं दिखता क्योंकि वाहन निर्माता बैटरी की अदला-बदली के स्थान पर त्वरित चार्जिंग टेक्नॉलॉजी पर काफी निवेश कर रहे हैं। भारत का विद्युत वाहन बाज़ार नाज़ुक स्थिति में है, जहां न तो वाहन निर्माताओं ने मुख्य भूमिका अपनाई है और न ही सरकार की कार्रवाई बात को आगे ले जा पा रही है। देश की विद्युत वाहन नीति अधकचरे उपायों और कदम पीछे खींचने के सिलसिले में अटक गई है।
-स्रोत फीचर्स

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