Kartik Maas 2026: कब है दीपावली, छठ और देव दीपावली? जानिए कार्तिक मास के सभी व्रत-त्योहारों की तिथियां
कार्तिक मास 2026 की शुरुआत, समापन और प्रमुख व्रत-त्योहारों की तिथियों के बारे में जानिए। इस विशेष धार्मिक महीने में कार्तिक स्नान, दीपदान, भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी विवाह, दीपावली, गोवर्धन पूजा और छठ महापर्व का विशेष महत्व है। वाराणसी की प्रसिद्ध देव दीपावली पर गंगा घाटों की भव्यता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। पढ़ें कार्तिक मास की पूजा-विधि, धार्मिक मान्यताएं, आकाशदीप जलाने की परंपरा और कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी विस्तार से। कॉपी करें
वाराणसी। गंगा किनारे दीपों की कतारें, मंदिरों में संध्या आरती की गूंज, तुलसी चौरे के पास प्रज्वलित दीपक और हरि नाम का संकीर्तन-कार्तिक मास भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान रखता है। यह महीना स्नान, दान, व्रत, दीपदान, तुलसी पूजन और भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। काशी सहित देश के विभिन्न तीर्थस्थलों पर इस दौरान श्रद्धालुओं की विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है।
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास में किए गए धार्मिक अनुष्ठान आत्मशुद्धि, संयम, सेवा और भक्ति का संदेश देते हैं। इस महीने में दीपावली, गोवर्धन पूजा, छठ महापर्व, देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और कार्तिक पूर्णिमा जैसे प्रमुख पर्व आते हैं। वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष आकर्षण देव दीपावली है, जब गंगा घाटों पर दीपों की अनुपम छटा दिखाई देती है।
कार्तिक मास 2026 कब से कब तक रहेगा?
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में कार्तिक मास का आरंभ मंगलवार, 27 अक्टूबर से माना गया है। इसका समापन मंगलवार, 24 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के साथ होगा। हालांकि, कार्तिक स्नान की परंपरा कई स्थानों पर आश्विन पूर्णिमा से ही आरंभ हो जाती है। अमांत पंचांग का अनुसरण करने वाले क्षेत्रों में मास की गणना अलग हो सकती है।
कार्तिक मास का समय सामान्यतः अक्टूबर और नवंबर के बीच पड़ता है। चंद्रमा की गति और तिथियों की गणना के कारण इसकी अंग्रेजी तारीखें हर वर्ष बदलती रहती हैं। इसलिए व्रत, पूजा और स्नान के लिए संबंधित क्षेत्र के पंचांग का ध्यान रखना आवश्यक है।
धार्मिक परंपरा में कार्तिक मास को पुण्य अर्जित करने, मन को संयमित करने और ईश्वर की आराधना में समय देने का अवसर माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु सूर्योदय से पहले स्नान, संध्या दीपदान, तुलसी पूजन और दान-पुण्य जैसे संकल्प लेते हैं।
कार्तिक मास का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
हिंदू परंपरा में चातुर्मास को भगवान विष्णु की योगनिद्रा से जोड़ा जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी के आसपास देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इसी कारण देवउठनी एकादशी को मांगलिक कार्यों के पुनः आरंभ से भी जोड़ा जाता है।
कार्तिक मास में धार्मिक जीवन के कई रूप एक साथ दिखाई देते हैं। कहीं श्रद्धालु नदी या सरोवर में स्नान करते हैं, कहीं मंदिरों में दीपदान होता है, तो कहीं घरों में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और तुलसी माता की पूजा की जाती है।
इस महीने का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह संयमित जीवन, जरूरतमंदों की सहायता, परिवार के साथ समय बिताने और समाज में सद्भाव बढ़ाने का संदेश भी देता है।
कार्तिक मास में किन देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए?
भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना
कार्तिक मास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस दौरान उनके दामोदर स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। दामोदर नाम भगवान श्रीकृष्ण की उस बाललीला से जुड़ा है, जिसमें माता यशोदा ने उन्हें ऊखल से बांधा था।
श्रीमद्भागवत की कथा के अनुसार, इसी प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार किया था। भक्त इस महीने में श्रीकृष्ण का स्मरण, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, हरिनाम संकीर्तन और भगवान की आरती करते हैं।
माता लक्ष्मी की पूजा
कार्तिक मास में दीपावली के अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार लक्ष्मी पूजन से सुख-समृद्धि, शुभता और मंगल की कामना की जाती है।
घर की सफाई, दीप प्रज्वलन और पूजा स्थल को सजाने की परंपरा इसी भावना से जुड़ी है। दीपक को ज्ञान, सकारात्मकता और आशा का प्रतीक भी माना जाता है।
तुलसी माता का पूजन
कार्तिक मास में तुलसी पूजन की विशेष परंपरा है। घरों में तुलसी के पौधे के पास दीप जलाया जाता है और श्रद्धालु पौधे की परिक्रमा तथा आरती करते हैं।
तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है। कार्तिक शुक्ल पक्ष में तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जिसमें तुलसी माता और भगवान शालिग्राम के प्रतीकात्मक विवाह की परंपरा निभाई जाती है।
भगवान शालिग्राम की पूजा
शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। अनेक वैष्णव परिवारों में कार्तिक मास के दौरान शालिग्राम का पूजन, तुलसी दल अर्पण और विष्णु मंत्रों का जप किया जाता है।
पितरों के निमित्त दीपदान
कार्तिक मास में आकाशदीप और दीपदान की परंपरा का संबंध पितरों के प्रति श्रद्धा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दीपदान से पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उनके कल्याण की कामना की जाती है।
कार्तिक मास में आकाशदीप जलाने की परंपरा क्यों है?
आकाशदीप कार्तिक मास की एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा है। इसमें दीपक को किसी सुरक्षित ऊंचे स्थान पर रखा या लटकाया जाता है, ताकि उसकी रोशनी दूर से दिखाई दे। परंपरागत रूप से इसे घर के आंगन, छत या मंदिर परिसर में प्रज्वलित किया जाता है।
आकाशदीप को भगवान विष्णु, देवताओं और पितरों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। इसकी लौ जीवन में प्रकाश, सद्भाव और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देती है।
आकाशदीप का प्रतीकात्मक अर्थ
1. अंधकार से प्रकाश की ओर: दीपक अज्ञान, निराशा और नकारात्मकता से निकलकर ज्ञान, आशा और सकारात्मकता की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
2. पितरों के प्रति श्रद्धा: आकाशदीप के माध्यम से लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
3. भक्ति और अनुशासन: प्रतिदिन एक निश्चित समय पर दीप जलाना नियमित पूजा और आत्मचिंतन की परंपरा को मजबूत करता है।
4. समाज में प्रकाश का संदेश: दीपदान केवल व्यक्तिगत पूजा नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी आशा और सहयोग का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देता है।
आकाशदीप कैसे जलाएं?
आकाशदीप के लिए मिट्टी या धातु का दीपक, तिल का तेल अथवा परंपरा के अनुसार अन्य उपयुक्त तेल, रुई की बत्ती, पुष्प और पूजा सामग्री रखी जा सकती है।
संध्या के समय स्वच्छ स्थान पर दीपक रखें। भगवान विष्णु का स्मरण करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रार्थना करें। इसके बाद दीप प्रज्वलित कर उसे सुरक्षित ऊंचे स्थान पर रखें।
दीपक को ऐसी जगह रखें जहां हवा से उसके गिरने, आग फैलने या किसी व्यक्ति के जलने का खतरा न हो। उसे कपड़े, पर्दे, सूखी पत्तियों और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें। ऊंचाई पर दीप रखने के लिए अस्थिर स्टैंड या असुरक्षित लटकाने की व्यवस्था न करें।
कार्तिक मास में स्नान, व्रत और दान का महत्व
कार्तिक स्नान
कार्तिक मास में प्रातःकाल स्नान की विशेष परंपरा है। श्रद्धालु सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं और इसके बाद पूजा-पाठ करते हैं। वाराणसी में गंगा स्नान की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
जो लोग नदी या तीर्थ तक नहीं जा सकते, वे घर पर स्नान करके ईश्वर का स्मरण कर सकते हैं। धार्मिक आस्था के अनुसार स्नान के साथ मन, वाणी और आचरण की शुद्धता भी महत्वपूर्ण है।
दीपदान
कार्तिक मास में प्रतिदिन संध्या के समय दीप जलाना शुभ माना जाता है। घर के पूजा स्थल, तुलसी चौरे और मंदिर में दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। श्रद्धालु नदी किनारे भी दीपदान करते हैं, लेकिन ऐसा करते समय स्थानीय नियमों और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए।
दान-पुण्य
इस महीने में अन्न, वस्त्र, तिल, दीपक और जरूरत की वस्तुओं का दान करने की परंपरा है। गरीब परिवारों, बुजुर्गों और जरूरतमंदों की सहायता करना भी पुण्य कार्य माना जाता है।
दान का उद्देश्य केवल धार्मिक फल की कामना नहीं, बल्कि समाज में सहयोग, करुणा और समानुभूति को बढ़ावा देना भी है।
व्रत और नाम-जप
कार्तिक मास में एकादशी व्रत, सोमवार व्रत और अन्य पारिवारिक परंपराओं के अनुसार उपवास किए जाते हैं। श्रद्धालु भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या अपने आराध्य देव के मंत्रों का जप करते हैं।
व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक स्थिति और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। उपवास की परंपरा का पालन अपनी क्षमता के अनुसार किया जा सकता है।
तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी का महत्व
देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है और भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है।
इस अवसर पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और घरों तथा मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और भगवान शालिग्राम का विवाह पारंपरिक रीति-रिवाजों से कराया जाता है। कई परिवारों में विवाह के प्रतीकात्मक मंडप, पुष्प सज्जा, मंगलगीत और आरती का आयोजन होता है।
तुलसी विवाह की तिथि और आयोजन की परंपरा क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है। वर्ष 2026 में प्रचलित पंचांगों के अनुसार देवउठनी एकादशी 20 नवंबर और तुलसी विवाह 21 नवंबर के आसपास है। स्थानीय पंचांग से तिथि की पुष्टि करना उचित होगा।
कार्तिक मास के प्रमुख व्रत और त्योहार 2026
कार्तिक मास में कई प्रमुख पर्व आते हैं। नीचे उत्तर भारत में प्रचलित पंचांग के अनुसार प्रमुख तिथियों का संकलन दिया गया है।

इन तिथियों में क्षेत्रीय पंचांग और स्थानीय परंपरा के अनुसार अंतर संभव है। विशेष रूप से पूजा का मुहूर्त, व्रत-पारण और छठ अर्घ्य का समय स्थानीय पंचांग से अवश्य जांचें।
वाराणसी में देव दीपावली का विशेष आकर्षण
कार्तिक पूर्णिमा पर वाराणसी में देव दीपावली का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन देवता गंगा के घाटों पर दीपोत्सव मनाने आते हैं। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु गंगा घाटों पर दीप जलाते हैं और मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं।
काशी के घाटों पर दीपों की कतारें, गंगा आरती, मंदिरों की सजावट और धार्मिक अनुष्ठान इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह अवसर काशी की सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का माध्यम भी है।
देव दीपावली के दिन गंगा स्नान, दीपदान और भगवान शिव तथा विष्णु की आराधना की जाती है। हालांकि, घाटों पर दीप जलाते समय स्वच्छता बनाए रखना, नदी में प्लास्टिक या अन्य कचरा नहीं डालना और प्रशासन के निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
कार्तिक मास में अपनाए जा सकने वाले सात सरल उपाय
प्रतिदिन प्रातः उठकर स्नान करें और कुछ समय ध्यान या प्रार्थना में बिताएं।
घर के पूजा स्थल या तुलसी चौरे पर सुरक्षित तरीके से दीप जलाएं।
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या अपने आराध्य देव का नाम-जप करें।
जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री दान करें।
परिवार के बुजुर्गों और अपने पूर्वजों का सम्मान करें तथा उनका स्मरण करें।
व्रत और पूजा अपनी पारिवारिक परंपरा तथा स्वास्थ्य के अनुरूप करें।
कार्तिक पूर्णिमा पर संभव हो तो किसी धार्मिक स्थल पर जाकर पूजा करें अथवा घर पर ही श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।
कार्तिक मास का संदेश: श्रद्धा के साथ सेवा और सद्भाव
कार्तिक मास भारतीय जीवन परंपरा में प्रकाश, भक्ति, संयम और सेवा का प्रतीक है। इस महीने की धार्मिक परंपराएं मनुष्य को अपने आचरण में शुद्धता, दूसरों के प्रति करुणा और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करने की प्रेरणा देती हैं।
दीपक जलाने का आध्यात्मिक संदेश यही है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, प्रकाश की एक छोटी किरण भी आशा जगा सकती है। इसी प्रकार सेवा का एक छोटा कार्य, जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता या परिवार में प्रेमपूर्ण व्यवहार जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
कार्तिक मास में स्नान, दान, दीपदान, तुलसी पूजन और भगवान की आराधना के साथ यदि व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सदाचार, सहयोग और स्वच्छता को भी स्थान दे, तो इस पर्व की सार्थकता और बढ़ जाती है।
नोट: यह लेख धार्मिक परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। व्रत-त्योहारों की तिथि तथा पूजा-मुहूर्त के लिए वाराणसी के स्थानीय पंचांग या योग्य पुरोहित से पुष्टि करें।



