बिहार चुनाव 2025: अराजकता की राजनीति से विकासवाद की जीत
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ संदेश दे दिया कि जनता अब अराजकतावादी, जातिवादी और विभाजनकारी राजनीति से तंग आ चुकी है। NDA को प्रचंड बहुमत देकर मतदाताओं ने विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी है। RJD, कांग्रेस, SP, TMC जैसे दलों की उग्र बयानबाजी, जातिगत ध्रुवीकरण और EVM पर संदेह फैलाने की कोशिशों को बिहार की जनता ने खारिज कर दिया। यह परिणाम ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और एमके स्टालिन जैसे नेताओं के लिए भी चेतावनी है कि जनता अब केवल वादों से नहीं, कार्यों और स्थिरता से प्रभावित होती है। मुस्लिम और यादव समाज को भी पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक भागीदारी पर ध्यान देना होगा। यह चुनाव परिणाम भारतीय लोकतंत्र में समावेशी विकास की दिशा में मील का पत्थर है।
- जातिवाद और विभाजनकारी राजनीति को नकारता बिहार का जनादेश: मतदाताओं ने चुना सुशासन और स्थिरता का रास्ता
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में गठबंधन (NDA) ने ऐतिहासिक जनादेश पाया है। मतगणना के आरंभिक रुझान में NDA को 243 में करीब 200 से अधिक सीटों पर बढ़त मिली (BJP–89, JDU–79, अन्य NDA घटक मिलाकर 197 तक)। अंततः NDA ने 122 की बहुमत रेखा को भी सहजता से पार किया। विपक्षी महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-कुछ वामदल) सिर्फ़ 40 से भी कम सीटों पर सिमट गया (RJD–31, कांग्रेस–4)। रिकॉर्ड 47.6% वोट शेयर के साथ NDA की जीत की विशालता इस मायने में भी अकल्पनीय है कि यह जीत बिहार में किसी भी गठबंधन के लिए अब तक की सबसे बड़ी रहेगी। कुल मिलाकर, बिहार के मतदाताओं ने “विकास और सुशासन” को प्राथमिकता दी और “जातिगत-सम्प्रदायिक विभाजनकारी राजनीति” को बहिष्कृत किया। यह परिणाम सीधे-सीधे दिखाता है कि अब ज़्यादातर बिहारियों के लिए विकास, सुव्यवस्था, राष्ट्रीय एकता अधिक महत्वपूर्ण है, न कि फूट डालने वाली राजनीति।
- मतदाताओं की पैठ – इस चुनाव में बिहार के विभिन्न इलाकों (सहामची, लखीसराय, गया आदि) में 70% के करीब मतदान हुआ, जो इतिहास में सर्वाधिक रहा। यह बोध कराता है कि मतदाताओं ने इस चुनाव को बेहद संवेदनशील समझा।
- महत्वपूर्ण सामाजिक समूह – RJD की पारंपरिक यादव-मुस्लिम राजनीति बिहार की मतदाताओं में पिछली बार के मुकाबले असर खोती दिखी। NDA के घटक JD(U) और LJP(RV) को खासतौर पर मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में सफलता मिली। तटीय जनजाति, महिलाएं और युवा वर्ग भी भारी संख्या में भाजपा-जदयू के पक्ष में मतदान करने लगे हैं।
- वोट शेयर और सीट विभाजन – Trends के अनुसार NDA ने 200 पार सीटें पा ली हैं, जबकि RJD जैसे बड़े दल को सिर्फ़ लगभग 30-32 सीटें ही मिलीं। कांग्रेस तो पहले के 19 की अपेक्षा अब महज आधा प्रदर्शन करने में सफल रही। ऐसे परिणाम यह पुष्ट करते हैं कि जनता ने आगामी “जंगलराज” की भयावहता से बचने के लिए NDA को चुना है।
इस तरह के नतीजों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मतदाता अब अराजकतामूलक, ध्रुवीकरणकारी राजनीति से ऊब चुके हैं, और उन्हें विकास, सुव्यवस्था, पारदर्शिता तथा सबका साथ-सबका विकास अधिक आकर्षक लगा।
विपक्षी गठबंधन की आक्रामक बयानबाज़ी
चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस, RJD, SP, TMC समेत कई विपक्षी नेताओं ने अक्सर उग्र और ध्रुवीकरणकारी बयानों की कड़ी मार चलाने की कोशिश की। इनमें दलित-यादव-मुस्लिम वोट बैंक जोड़ने वाले नारे, सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप, केंद्र पर कटाक्ष, और चुनाव आयोग पर दबाव की चर्चाएँ शामिल रहीं। कुछ बिंदु इस प्रकार हैं:
- “DNA में अराजकतावाद” का आरोप – भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने खुलकर कहा कि “आरजेडी का DNA अराजक है” और उसके समय को ‘जंगलराज’ बताया। उनका तर्क था कि आरजेडी पार्टी के जमाने में बिहार में कानून व्यावहारिक रूप से धराशायी हो जाता था। ऐसी अज्ञात राजनीति का डर मतदाताओं की मानसिकता में घर कर गया।
- “कट्टा-दहशत” की भाषा – रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने जनसभाओं में वर्णन किया कि RJD चुनाव प्रचार में भी लोगों को कट्टा (जंगली बंदूक) लेकर डराने की बात करता रहा। उन्होंने कहा, “हम विकास की बात करते हैं, पर RJD कट्टा की बात करता है”। इस प्रकार की हथियारबाजी जैसी उग्र भाषा ने कई लोगों को चिंतित किया।
- SIR और वोट ध्रुवीकरण की साजिश – बिहार में चुनाव से पूर्व हुई विशेष तीव्र संशोधन (SIR) में बिंदुओं के काटछांट को विपक्ष ने भारी नाराजगी के साथ देखा। समाजवादी पार्टी (अखिलेश यादव) ने इसे ‘चुनावी साजिश’ करार देते हुए बीजेपी को ‘कपटकारी’ कहा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु के सीएम एम. के. स्टालिन ने भी बिहार में SIR का विरोध करते हुए इसे संवेदनशील मतदाताओं को बाहर रखने की कोशिश बताया। इन ताकतों ने अल्पसंख्यक मतदाताओं में डर भरने की कोशिश की, लेकिन बिहार के नतीजे दिखाते हैं कि मतदाता इन षड्यंत्रों पर ध्यान नहीं दे रहे थे।
- अन्य उलाहना-भरी टिप्पणियाँ – प्रचार के अंतिम चरण में राहुल गांधी ने भी बीजेपी पर निशाना साधा और शिक्षा/रोजगार को मुद्दा बनाया, लेकिन उनके “25 लाख वोट चोरी” जैसी बयानों को चुनाव आयोग ने आधारहीन कहा। विरोधी पार्टियों द्वारा बार-बार EVM, मतदाता सूची आदि पर सवाल उठाने से चुनावी माहौल प्रतिकूल हुआ।
इन राजनीतिक पार्टी-प्रवक्ताओं की भाषा और रणनीति में वास्तविक मुद्दों की जगह आरोप-प्रत्यारोप और झूठे प्रचार को महत्व देना साफ दिखाई दिया। तेजस्वी यादव ने भी मतदान के बाद अधिकारियों पर दबाव बनाने की चेतावनी दी, जो चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह जताने जैसा था। कुल मिलाकर, इन बयानों ने मतदाताओं को अस्थिरता का भय दिया और गठबंधन की वैचारिक तस्वीर को संकुचित किया।
- रणनीतिक भूलें – विपक्षी महागठबंधन ने मुख्य रूप से जातिगत समीकरणों पर निर्भर रैली की। उन्हें अब लगने लगा कि यादव नेतृत्व पर केन्द्रित हो गई, जिससे गैर-यादव और मध्यम वर्ग से दूरी बढ़ी।
- विरोध का स्वरूप – जैसे-जैसे वोटगणना निकट आई, मेधावी विश्लेषकों ने कहा कि विपक्ष की आक्रामकता ने अधिकांश मध्यम वर्ग और अल्पसंख्यक मतदाताओं को भयभीत कर दिया। NDA ने इसके विपरीत “विकास और एकता” का संदेश जोर-शोर से दिया।
इन सभी संदर्भों में तेजस्वी यादव के हालिया बयान विशेष उदाहरण बनते हैं। उन्होंने मतगणना के आरंभ में अधिकारियों को चेतावनी दी कि यदि मतगणना में गड़बड़ी हुई तो ‘उचित प्रत्युत्तर’ दिया जाएगा। इस तरह की धमकियाँ लोकतंत्र के लिए निंदनीय हैं और मतदाताओं में गुस्सा पैदा करती हैं।
मतदाताओं की प्रतिक्रिया: विकास, सुव्यवस्था और विकासवाद
बिहार के मतदाताओं ने इस चुनाव में ध्रुवीकरण और अराजकता की राजनीति को तवज्जो नहीं दी, बल्कि विकास और सुशासन पर विश्वास जताया। चुनाव के बाद कई विश्लेषकों ने पाया कि जनता ने “विकास और सुशासन” को चुनौतीपूर्ण जातिगत-सम्प्रदायिक बयानबाज़ी से बेहतर माना। कुछ मुख्य अवलोकन इस प्रकार हैं:
- विकास-बोलबाला – चुनाव प्रचार में NDA की रणनीति में विकास की योजनाएँ प्रमुख रहीं। नितीश-सरकार ने शिक्षक भर्ती, बिजली-पानी की सुविधा, महिला सशक्तिकरण, किसानों के लिए आर्थिक सहायता, वृद्धावस्था पेंशन, माताओं के लिए सामाजिक योजनाएँ जैसे कई जनकल्याण कार्यक्रम जोड़े। उदाहरण के लिए, पंचायत प्रतिनिधियों को बढ़ी हुई भत्ता, गरीब महिलाओं को आर्थिक सहायता, बिजली सब्सिडी आदि ने खासा आकर्षण बनाया।
- सुशासन और कानूनी कार्रवाई – चुनावी माहौल को बिगाड़ने वाले मोकामा कांड जैसे कुछ घटनाक्रम में प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की, जिससे मतदाताओं को यह भरोसा हुआ कि कानून का राज कायम है। NDA ने अपने कार्यकाल में “प्रण जाए पर वचन न जाए” का नारा दिया, और मुख्यधारा में सुशासन का संदेश दिया।
- साम्प्रदायिक दूरी – विपक्षी महागठबंधन की झूठी आश्वासन और आत्मकेंद्रित वादों ने काम नहीं किया। उन्हें लोगों ने पढ़ लिया। इसके विपरीत, NDA की पक्षधरता ने न केवल बहुचर्चित जातीय और धार्मिक समूहों तक पहुँचा, बल्कि अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियाँ भी विकास को प्राथमिकता देकर सहमति दी। उदाहरण के लिए, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में NDA ने आश्चर्यजनक बढ़त बनाई। हाल के वर्षों में मुस्लिम मतदाताओं का लगभग 80% भाग MGB को जाता रहा, लेकिन इस बार उनकी कुछ हिस्सों ने विकास और स्थिरता की उम्मीद में NDA को झुकाव दिखाया। यह स्पष्ट संकेत है कि अब सेवा-निष्पादन, स्थानीय विकास और रोजमर्रा की सुरक्षा को वोटरों ने पहचान-आधारित वफादारी से ऊपर रखा है।
- वोट और वोटर बदलाव – NDA का बढ़ता जनाधार सिर्फ पुरानी जातिगत गठबंधनों तक सीमित नहीं रहा। युवा, महिलाएं, मध्यम वर्ग और सीमांत समुदायों ने भी विकास-वर्ग की नीतियों पर भरोसा दिखाया। भाजपा और जदयू ने पिछली बार से मिलाकर कहीं ज़्यादा सीटें जीतीं, जबकि RJD-कांग्रेस गठबंधन का वोट शेयर घट गया। बहुमत मिलना यह इंगित करता है कि विपक्षी ‘अनैतिक राजनीति’ से लोग ऊब चुके हैं।
इस तरह मतदाता-जनादेश ने साफ संदेश दिया कि विकासवादी एवं समावेशी राजनीति को ही अब सतर्क मतदाता स्वीकारते हैं। बिहार के लोगों ने स्पष्ट तौर पर ‘जाट-धर्म’ जैसे भटकने वाले एजेंडे को खारिज कर दिया और “अखंड बिहार एवं मजबूत भारत” की दिशा में कदम बढ़ाना चुना।
विपक्षी नेताओं के लिए चेतावनी
बिहार के इस जनादेश को राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इसका एक स्पष्ट संदेश उन नेताओं के लिए है जो जाति-धर्म आधारित विभाजनकारी राजनीति पर निर्भर हैं।
- आखिलेश यादव (सपा) – वे बिहार के SIR को मुद्दा बनाते हुए बीजेपी पर प्रहार करते रहे। अब बिहार के परिणाम ने दिखाया कि प्रदेश में जो राजनीति सफल रही, वह भ्रष्टाचारमुक्त विकास और सुव्यवस्था की राजनीति थी। इसलिए उत्तर प्रदेश, बंगाल या अन्य जगहों में भी कुटिल रणनीतियाँ काम न आएंगी।
- ममता बनर्जी (TMC) – बंगाल की मुख्यमंत्री होने के नाते ममता भी बिहार में SIR विवाद में सक्रिय रहीं। बिहार ने संदेश दे दिया कि वोटरों को शांति और समावेशी विकास चाहिए, और विभाजनकारी विचारों की सीमा है। पश्चिम बंगाल में भी मानदंड यही है—जनता अब घृणा की जगह विकास चाहती है।
- एम.के. स्टालिन (DMK) – तमिलनाडु में सत्ताधारी स्टालिन जी ने बिहार में SIR का विरोध करते हुए ‘मतदाता विलोपन’ जैसे शब्द प्रयोग किए। अब बिहार के नतीजे साबित करते हैं कि ऐसी हार्ड-हिट भाषा महज़ प्रचार तक सीमित रह जाती है। लोकतंत्र में गाली-गलौज की बजाए समाधान की राजनीति को ही लोग तरजीह देंगे।
अतः ये सभी नेता सतर्क रहें: किसी भी जगह पर विकास और राष्ट्रीय एकता पर जोर देना अधिक फलदायी होगा, न कि पहचान-आधारित तर्क-वितर्क की राजनीति। बिहार ने साफ़ संकेत दिया है कि मतदाता के मन में अब विकास की उम्मीदें और राष्ट्रहित सर्वोपरि हैं। विभाजनकारी खेल लगाने वाले दलों को सीख मिली है कि ऐसी राजनीति की कोई अनंत आड़ नहीं है।
यादव-मुस्लिम समुदायों के लिए सबक
बिहार में यादव और मुस्लिम समुदाय परंपरागत रूप से महागठबंधन का आधार माने जाते रहे हैं। लेकिन इस चुनाव ने दिखाया कि केवल जातिगत-धार्मिक पहचान पर राजनीति की सीमा है।
- यादव वोट बैंक – आरजेडी गठबंधन ने यादव वर्ग को एकीकृत करने का प्रभारी समझा। लेकिन वोटर ने देखा कि NDA ने उन जातियों में से भी समर्थन जुटाया जो पहले RJD के प्रति सतर्क थीं। जैसा कि Indian Express ने लिखा, महागठबंधन की गतिविधियाँ यादव नेतृत्व पर केंद्रित रही, जिससे उनका आधार संकुचित हुआ और गैर-प्रमुख जातियाँ NDA के साथ बँध गईं। इसका मतलब यह है कि यादव नेतृत्व वाली राजनीति ने अपनी पहुंच सीमित की और बिहार के गैर-प्रमुख वर्गों को छोड़ा। भविष्य में यादव नेताओं को चाहिए कि वे जातिगत बंदिशें छोड़कर विकास के मुद्दों पर समग्र अपील करें, तभी उनका असर बढ़ेगा।
- मुस्लिम मतदाता – मुस्लिम समुदाय ने परंपरागत रूप से ‘धर्मनिरपेक्ष’ गठबंधनों के पक्ष में मतदान किया है। 2015 और 2020 में करीब 80% मुसलमान महागठबंधन को वोट देते थे। लेकिन इस बार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में NDA के जीतने से स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम मतदाता भी सेवा-परफॉर्मेंस और रोजमर्रा की सुरक्षा को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। इसका मतलब यह कि मुस्लिम नेताओं को केवल वोट बैंक की राजनीति करने के बजाय अपनी जनता के वास्तविक मुद्दों (जैसे आर्थिक सुधार, स्थानीय सुरक्षा आदि) पर फोकस करना चाहिए।
- समावेशी लोकतंत्र में भागीदारी – दोनों समुदायों को यह ख्याल रखना होगा कि पहचान-पर आधारित अलगाववादी राजनीति उन्हें हाशिये पर डाल सकती है। बल्कि इन्हें लोकतंत्र के मुख्यधारा में आकर अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए। वोटरों ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में रचनात्मक भागीदारी और मुद्दों की राजनीति अधिक असर करती है।
यादव-मुस्लिम दोनों समुदायों को इस संदेश की कसौटी पर विचार करना चाहिए कि आइसोलेशन (पिंजरे) वाली राजनीति काम नहीं करती। उन्हें व्यापक सामाजिक गठजोड़ों में रहकर जनता के सामूहिक हितों पर बल देना चाहिए। इसी रास्ते पर चलकर ही ये समूह अपनी राजनीतिक ताकत को बनाए रख सकते हैं।
बिहार चुनाव: भाजपा की बड़ी जीत, कानू हलवाई समाज की सभी 6 सीटें एनडीए के खाते में
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत पर भाजपा जिला मंत्री पूनम गुप्ता ने खुशी व्यक्त करते हुए पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को अपनी हार्दिक बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, एनडीए की विकासवादी नीतियों और कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत का परिणाम है।

पूनम गुप्ता ने बताया कि इस चुनाव में कानू हलवाई समाज को एनडीए गठबंधन की ओर से कुल 6 सीटें दी गई थीं, और गर्व की बात है कि इन सभी छह सीटों पर उम्मीदवार शानदार प्रदर्शन करते हुए विजयी रहे। उन्होंने कहा कि यह परिणाम समाज की एकजुटता, पार्टी के प्रति विश्वास और भाजपा के प्रति जनता के स्नेह को दर्शाता है।उन्होंने आगे बताया कि आज बिहार में भाजपा की जोरदार जीत पर उन्होंने भी सभी विजयी उम्मीदवारों को बधाई दी, और बदले में नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने उन्हें भी शुभकामनाएँ प्रेषित कीं।
पूनम गुप्ता ने कहा कि आने वाले समय में भाजपा और एनडीए गठबंधन बिहार के विकास, सुशासन, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय को नई दिशा देगा। उन्होंने वादा किया कि वह अपने संगठन और समाज के लोगों के साथ मिलकर पार्टी को मजबूत बनाने तथा जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए लगातार कार्य करती रहेंगी।
समावेशी राजनीति की आवश्यकता
बिहार के हालिया नतीजे ने इस तथ्य को उजागर किया है कि विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकता की पक्षधरता वालों को ही जनता ने सशक्त जनादेश दिया। इस चुनाव ने “आत्मघाती, अराजक राजनीति” (जैसे जातिगत दवाब, जात-पोस्टर, हिंसक बयानबाजी, आदि) के विकल्प के रूप में “विकासपरक-वैचारिक राजनीति” को अप्रमाणित कर दिया। मतदाताओं की यह पसंद अन्य राज्यों के लिए भी संदेश है कि असंतोष को हवा देने वाली राजनीति की अब गति धीमी है।
विपक्षी नेता-जनतांत्रिक दलों को चाहिए कि वे बिहार के चुनावी सबक से सीखें: व्यापक जनहित, योजनाओं की प्रभावशीलता और सुव्यवस्था को लेकर काम करें, न कि विभाजनकारी भाषणों पर ध्यान दें। यादव-मुस्लिम सहित सभी समुदायों के नेताओं को भी पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर समावेशी लोकतांत्रिक भागीदारी पर जोर देना चाहिए। जनता स्पष्ट कर चुकी है कि पुराने बंटवारे के फार्मूले अब नहीं चलेंगे। राजनीति में सकारात्मक बदलाव तभी आएगा जब देशहित, विकास और सभी वर्गों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर संवाद होगा। बंटवारे की राजनीति नहीं, सबका साथ-सबका विकास की राजनीति बिहार के मतदाताओं ने चुनी है। यह अनुभव हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में वास्तविक विकास की राजनीति ही सत्ता की कुंजी है, न कि अफवाहों और धमकियों का खेल।
जाति जनगणना से बिहार चुनाव 2025 तक: अंग्रेजों की साज़िश, नेताओं का खेल और जनता की चुनौती
रसेल की किताब ने गढ़ी जाति की बेड़ियाँ, बिहार चुनाव में गूंज रहा औपनिवेशिक खेल
डिस्क्लेमर : “यह लेख लेखक के निजी विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त की गई राय आवश्यक नहीं कि प्रकाशक, मंच या उससे जुड़े संस्थानों की आधिकारिक सोच या नीति का प्रतिनिधित्व करती हो। लेख में प्रस्तुत विश्लेषण और टिप्पणियाँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, चुनावी परिणामों और सामाजिक प्रवृत्तियों के आधार पर लेखक के स्वतंत्र दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस लेख को एक वैचारिक विमर्श के रूप में ग्रहण करें।”



