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गरबा और डांडिया : नवरात्रि की भक्ति, शक्ति और संस्कृति का अनूठा संगम

गुजरात-राजस्थान से निकली परंपरा आज पूरे भारत और विश्व में भारतीय संस्कृति का दर्पण बनी

भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में नवरात्रि का विशेष स्थान है। नौ रातें और दस दिन चलने वाला यह पर्व देवी शक्ति की साधना का काल है। घर-घर और मंदिरों में जहाँ कलश स्थापना, व्रत और पाठ किए जाते हैं, वहीं मैदानों और पंडालों में सामूहिक नृत्य की धूम मचती है। यही नृत्य है गरबा और डांडिया, जो भक्ति, शक्ति और संस्कृति का संगम हैं। गुजरात और राजस्थान से निकली यह परंपरा आज पूरे भारत और विश्व में भारतीय पहचान का प्रतीक बन चुकी है। नवरात्रि में खेले जाने वाले गरबा और डांडिया केवल लोकनृत्य नहीं, बल्कि देवी की साधना, भक्ति और संस्कृति का उत्सव हैं। यह हमें सिखाते हैं कि शक्ति ही जीवन का केंद्र है और बुराई पर विजय अनिवार्य है।

कथा और महात्म्य

पौराणिक मान्यता है कि नवरात्र के नौ दिनों तक माँ दुर्गा ने असुरराज महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन विजय प्राप्त की। इसीलिए डांडिया को युद्ध और विजय का प्रतीक माना जाता है। डांडिया की लकड़ियाँ देवी के शस्त्र का रूप हैं, जिनकी टकराहट महिषासुर वध की याद दिलाती है।

दूसरी ओर, गरबा ‘गरभदीप’ से उत्पन्न परंपरा है। मिट्टी के घड़े में दीप जलाकर उसे बीच में रखा जाता है और भक्त घेरे में घूमकर नृत्य करते हैं। घड़ा ब्रह्मांड का, दीप जीवन ऊर्जा का और घेरे में घूमना सृष्टि चक्र का प्रतीक है। गरबा जीवनदायिनी शक्ति की उपासना है, जबकि डांडिया युद्ध और विजय की।

गरबा और डांडिया में अंतर

नवरात्रि के अवसर पर खेले जाने वाले गरबा और डांडिया नृत्य केवल मनोरंजन भर नहीं, बल्कि माँ शक्ति की भक्ति और सांस्कृतिक परंपरा के गहरे प्रतीक हैं। देखने में दोनों नृत्य एक जैसे प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके पीछे अलग-अलग धार्मिक महत्त्व और प्रतीकात्मकता छिपी है।

गरबा शब्द ‘गरभदीप’ से उत्पन्न माना जाता है। परंपरा के अनुसार मिट्टी के घड़े में दीपक जलाकर उसे बीच में रखा जाता है और भक्त गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं। दीप जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि घेरे में घूमना जन्म और मृत्यु के शाश्वत चक्र को दर्शाता है। इस प्रकार गरबा माँ शक्ति के जीवनदायिनी स्वरूप की उपासना है।

दूसरी ओर डांडिया को ‘स्वॉर्ड डांस’ कहा जाता है। इसमें प्रयुक्त लकड़ी की डंडियाँ देवी दुर्गा के शस्त्र का प्रतीक मानी जाती हैं। जब इन्हें ताल पर आपस में टकराया जाता है, तो यह महिषासुर पर माँ दुर्गा की विजय की स्मृति को जीवंत कर देता है। डांडिया माँ शक्ति के युद्ध और विजय रूप का प्रतीक है और यह संदेश देता है कि बुराई कितनी भी प्रबल क्यों न हो, अंततः धर्म और सत्य की ही जीत होती है।

इस तरह गरबा और डांडिया नवरात्रि को केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं रहने देते, बल्कि उसे भक्ति, उत्साह और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अनूठा उत्सव बना देते हैं।

नवरात्रि के नौ दिन और नृत्य का अर्थ

हर दिन देवी के अलग रूप की पूजा होती है और गरबा/डांडिया में उसका प्रतीकात्मक अर्थ छिपा है –

  • शैलपुत्री – शुद्धता और नए आरंभ की शक्ति। नृत्य = नई ऊर्जा।
  • ब्रह्मचारिणी – तप व संयम। नृत्य = धैर्य और निरंतरता।
  • चंद्रघंटा – शक्ति व शांति का संतुलन। नृत्य की ध्वनि = माँ की घंटी।
  • कूष्मांडा – सृष्टि की जननी। घेरे में घूमना = ब्रह्मांडीय ऊर्जा का चक्र।
  • स्कंदमाता – ममता और सुरक्षा। समूह नृत्य = माँ की गोद का संरक्षण।
  • कात्यायनी – वीरता व न्याय। डांडिया की टकराहट = माँ की तलवार।
  • कालरात्रि – अंधकार नाशिनी। तेज नृत्य = बुराई का विनाश।
  • महागौरी – पवित्रता और करुणा। नृत्य = शांत भक्ति का भाव।
  • सिद्धिदात्री – सिद्धि व पूर्णता। अंतिम दिन का उत्साह = भक्ति की पूर्णता।

पूजा :गरबा या डांडिया प्रारंभ करने से पहले लोग संक्षिप्त पूजन-विधि* करते हैं :

आवश्यक सामग्री

  • माता दुर्गा की प्रतिमा या कलश
  • नारियल, लाल चुनरी, फूल, अगरबत्ती, दीपक
  • रोली, अक्षत, हल्दी, चावल
  • मिठाई या नैवेद्य

पूजन विधि

  • स्थान को शुद्ध कर माँ दुर्गा या कलश की स्थापना करें।
  • कलश पर नारियल और चुनरी रखें।
  • दीपक जलाएं (अक्सर मिट्टी के घड़े में दीप रखा जाता है – गरबा दीप)।
  • देवी को फूल, अक्षत, रोली अर्पित करें।
  • दुर्गा मंत्र या सप्तशती के श्लोक का पाठ करें।
  • आरती करें।
  • इसके बाद गरबा/डांडिया की शुरुआत होती है।

आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ जय अम्बे…

माँ गौरी दुर्गा, जय जय जगदम्बा ।
तुम बिन दुःख हरनी, कौन करे अम्बा ॥ जय अम्बे…

चन्द्रमुखि इंदु, कुसुमित नेत्र भाल ।
बाल स्वरूपा, त्रिभुवन करि लाल ॥ जय अम्बे…

कनक श्याम गात्र, दिव्य रत्न भूषा ।
सिंह वाहन राजत, खड़ग त्रिशूल धूषा ॥ जय अम्बे…

देवी जय जय माँ, वैष्णवी भवानी ।
रूप अनेक तुम्हारे, नित नवीन वखानी ॥ जय अम्बे…

दक्ष प्रजापति की, कन्या भवानी ।
शिव शंकर की प्रिया, सब सुखखानी ॥ जय अम्बे…

भुजा आठ सोलह, सत्रह अठारह ।
असुर निकंदिनी, जय जय भव तारह ॥ जय अम्बे…

सिंहासन बैठी, आद्य शक्ति भवानी ।
सकल मनोरथ पूर्ण कर दानी ॥ जय अम्बे…

भक्तजनो के संकट, क्षण में टारी ।
माता तुझ बिन कौन, संकट हारी ॥ जय अम्बे…

नन्दनवन में फूल, अमृत रस धारा ।
भजन करें जन, नाम तिहारो प्यारा ॥ जय अम्बे…

जो कोई ध्यान धरै, मन से मातु तुम्हारा ।
सुख सम्पत्ति पावै, और दुःख निवारा ॥ जय अम्बे…

माँ दुर्गा की आरती, जो कोई जन गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावे ॥ जय अम्बे…

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

गरबा और डांडिया केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला उत्सव है। घेरे में नृत्य करते समय सब बराबर होते हैं – न कोई बड़ा, न छोटा, न अमीर-गरीब। यह समानता और एकता का संदेश है। महिलाओं की प्रमुख भागीदारी इसे शक्ति और सम्मान का भी प्रतीक बनाती है।

उत्पत्ति और वैश्विक प्रसार

गरबा और डांडिया की जड़ें गुजरात और राजस्थान की लोक परंपराओं में हैं। गाँव-गाँव और चौपालों से निकला यह नृत्य आज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच चुका है। अहमदाबाद और वडोदरा के भव्य आयोजन विश्व प्रसिद्ध हैं, जबकि प्रवासी भारतीयों ने इसे अमेरिका, कनाडा, यूके, खाड़ी देशों और ऑस्ट्रेलिया तक पहुँचाया है। अब यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का वैश्विक उत्सव बन चुका है।

गरबा और डांडिया : रंग, संगीत और सामूहिक संस्कृति का उत्सव

नवरात्रि में खेले जाने वाले गरबा और डांडिया केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का माध्यम भी हैं। यह नृत्य एक ऐसा उत्सव है जिसमें भक्ति, कला, संगीत और सामूहिकता एक साथ दिखाई देती है।गरबा और डांडिया की सबसे बड़ी खूबी है उनकी सामूहिकता। घेरे में किया जाने वाला यह नृत्य समाज को समानता और एकता का संदेश देता है। स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब – सभी एक घेरे में शामिल होकर देवी की आराधना करते हैं। यह उत्सव सामाजिक बंधनों को तोड़कर सबको एक सूत्र में पिरोता है।

रंग-बिरंगे परिधान और लोकसंगीत

गरबा और डांडिया की पहचान उनके रंगीन परिधानों और पारंपरिक लोकसंगीत से भी है। महिलाएँ घाघरा-चोली और चुनरी में सजती हैं तो पुरुष कुर्ता-पायजामा और पगड़ी पहनते हैं। ढोल, नगाड़ा, मंजीरा और हारमोनियम की ताल पर उठते कदम भक्ति और आनंद दोनों का अनुभव कराते हैं।

लोककला और संगीत का संरक्षण

गरबा-डांडिया के आयोजन लोकनृत्य और लोकसंगीत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का अवसर भी हैं। यह परंपरा न केवल गाँव और कस्बों तक सीमित रही, बल्कि अब शहरों और विदेशों में भी लोककला को जीवित रखे हुए है। आज यह नृत्य भारतीय संस्कृति का अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन चुका है।

गरबा और डांडिया : आधुनिक दौर में बाजारवाद, परंपरा और पहचान का संगम

नवरात्रि में खेले जाने वाले गरबा और डांडिया आज केवल धार्मिक उत्सव नहीं रहे, बल्कि आधुनिक समय में यह एक सामाजिक और आर्थिक आयोजन का रूप ले चुके हैं। गुजरात और राजस्थान से निकली यह परंपरा अब बड़े-बड़े मैदानों, क्लबों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भव्य रूप से दिखाई देती है।

बाजार पर असर

नवरात्रि के दौरान देशभर के बाजारों में खास रौनक देखी जाती है। पारंपरिक परिधानों – घाघरा-चोली, कुर्ता-पायजामा, आभूषण, सजावट सामग्री और संगीत उपकरणों की बिक्री करोड़ों में पहुँच जाती है। फैशन डिजाइनर और इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ भी इस अवसर पर नए अवसर तलाशती हैं। यह आयोजन स्थानीय कारीगरों और कलाकारों के लिए रोज़गार का बड़ा साधन बन गया है।

बाजारवाद का फायदा और नुकसान

एक ओर तो बाजारवाद ने इस परंपरा को व्यापक पहुँच दी, जिससे गरबा-डांडिया को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली और ग्रामीण लोककला को रोज़गार भी मिला। वहीं दूसरी ओर अत्यधिक व्यावसायीकरण ने इसे कहीं-कहीं केवल मनोरंजन और फैशन शो में बदल दिया है। महंगे पास, डीजे की तेज धुन और पॉपुलर म्यूज़िक के चलते मूल लोकसंगीत और परंपरागत भाव कमज़ोर होते दिखते हैं।

मूल परंपरा कैसे बरकरार रहे

विशेषज्ञों का मानना है कि गरबा-डांडिया का असली अर्थ तभी जीवित रह सकता है जब इसमें लोकसंगीत, पारंपरिक परिधान और सामूहिक भक्ति का स्वरूप बना रहे। कई संस्थाएँ और आयोजन समितियाँ आज भी मिट्टी के दीप, ढोल-नगाड़े और पारंपरिक गीतों को बढ़ावा देकर मूल गरबा-डांडिया की आत्मा को संरक्षित कर रही हैं।आधुनिक समय में गरबा और डांडिया ने बाजार और समाज दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है। यह परंपरा भले ही ग्लैमर और बाजारवाद से प्रभावित हुई हो, लेकिन इसकी आत्मा अब भी माँ शक्ति की भक्ति, लोककला के संरक्षण और समाज की सामूहिकता में जीवित है।

गरबा और डांडिया : भक्ति से परे समाज में एकता, शक्ति और संस्कृति का उत्सव

गरबा और डांडिया केवल देवी उपासना का साधन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला एक जीवंत उत्सव हैं। इन नृत्यों के माध्यम से भारतीय संस्कृति में समानता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक एकता का संदेश पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है। गरबा और डांडिया केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज की एकता, स्त्री शक्ति का सम्मान, संस्कृति का संरक्षण और अर्थव्यवस्था का योगदान देने वाला उत्सव हैं। यही कारण है कि यह परंपरा नवरात्रि को एक साधारण पूजा-पर्व से आगे बढ़ाकर संपूर्ण सामाजिक उत्सव बना देती है।

समानता और एकता का संदेश

गरबा और डांडिया घेरे में खेले जाते हैं। इस घेरे में न कोई अमीर-गरीब होता है, न बड़ा-छोटा। सभी एक ही ताल पर देवी की आराधना करते हैं। यही नवरात्रि की असली खूबसूरती है – भक्ति के माध्यम से समाज में समानता और एकता का भाव।

महिला सशक्तिकरण का प्रतीक

गरबा और डांडिया का मूल केंद्र है शक्ति की पूजा। महिलाओं की बड़ी भागीदारी इस आयोजन को और खास बनाती है। परंपरागत रूप से महिलाएँ ही इन नृत्यों की प्रमुख धुरी रही हैं। आधुनिक समय में यह उत्सव स्त्रियों की सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व क्षमता को भी सामने लाता है।

सांस्कृतिक संरक्षण और युवाओं का मंच

लोकनृत्य और लोकसंगीत को जीवित रखने में गरबा-डांडिया की बड़ी भूमिका है। यह आयोजन युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ने और लोककला को नए रूप में प्रस्तुत करने का मंच भी देता है। आज के युवा फैशन और आधुनिक संगीत के साथ भी पारंपरिक लोकधुनों को संजोए हुए हैं।

आर्थिक योगदान

नवरात्रि का यह उत्सव स्थानीय बाजार और कलाकारों के लिए भी बड़ा अवसर है। पारंपरिक परिधान, आभूषण, सजावट सामग्री, ढोल-नगाड़े और आयोजन प्रबंधन से लाखों लोगों को रोज़गार मिलता है। पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से यह आर्थिक दृष्टि से भी अहम बन चुका है।

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