
वाराणसी । संत रविदास जयंती की पूर्व संध्या पर मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में ‘संत रविदास और संत कबीर के चिंतन में मानवीय मूल्य’ विषयक विशिष्ट व्याख्यान तथा ताना-बाना ग्रुप के देवेन्द्र दास, डॉ. भागीरथी, गौरव मिश्र, बाबुल कृष्णा द्वारा संत रविदास एवं संत कबीर के भजनों के गायन का आयोजन किया गया I कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आचार्य विवेक दास महंत, कबीर चौरा मठ, विशिष्ट अतिथि- प्रो. दीपक मलिक, पूर्व आचार्य का.ही.वि.वि. थे तथा कार्यक्रम की अध्यक्ष्यता प्रो. अवधेश प्रधान ने कीI

अपने उद्बोधन में विशिष्ट अतिथि प्रो. दीपक मलिक ने कहा की भारत में जो सांस्कृतिक क्रांति हुई उसके मूल में भारत का भक्ति आन्दोलन था I इस भक्ति आन्दोलन के दो आधार स्तम्भ संत कबीर और संत रविदास थे I संत रविदास उस समाज के निर्माण की बात करते है जो ‘गम’ रहित हो अर्थात वे ‘बेगमपुरा’ कहते हैं I संत रविदास एक ऐसी दूरदृष्टि के साथ मध्ययुग में अवतरित हुए जो एक समतामूलक समाज की कल्पना करते हैं I उनकी यह दृष्टी आधुनिक भारत के निर्माण में अत्यंत उपयोगी हैं I
मुख्य अतिथि आचार्य विवेकदास ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि संत रविदास की वाणी और वचन संत कबीर की तरह अक्खड़ और मारक नहीं अपितु सरल और सौम्य है I वे कबीर साहब के साथ मिलकर भारत के भक्ति आन्दोलन को एक दिशा दिखाते हैं I भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगभग तीन सौ संतों की सूचना मिलती हैं I इन संतों के कार्यों का, उनकी जीवनी का प्रदर्शन, सारनाथ में प्रस्तावित कबीर विद्यापीठ में होगा, जो कबीर मठ स्थापित करने जा रहा हैं I
संत रविदास के महान संत के विशेष गुण होने के कारण ही मीराबाई जैसी रानी राजस्थान से काशी आकर उनकी शिष्या बनी I संत रविदास ने भ्रम की महत्ता की स्थापना की और देश के सामने श्रमशील समाज की गरिमा को स्थापित किया I संत कबीर ने सर्वसाधारण में स्थित परब्रह्म रूपी आत्मा को प्रेम के माध्यम से जानने और पकड़ने का सन्देश दिया I
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि संत कबीर और संत रविदास के स्वर में जो चेतना का स्वर है वो मानव के विवेक को जागृत करने वाला है I भारत की संस्कृति तमाम विचारधाराओं को समाहित करने वाली हैं आपने कहा कि रविदास और कबीर की वाणी आइना है जो हमें जगाती हैI हमें संतों की वाणी को निरंतर अध्ययन और-अनुशीलन करना चाहिएI हमें संकीर्णता से निकलकर विवेक दृष्टि अपनानी चाहिएI असहमति को हमें अपने समाज में स्थान देना चाहिएI हमारे अन्दर सत्य की खोज की दीवानगी होनी चाहिएI हमें परंपरा के विवेक सम्मत मूल्याङ्कन की जिम्मेदारी उठानी होगी I
इसके पूर्व स्वागत करते हुए प्रो. राज कुमार, समन्वयक अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र ने कहा कि आचार्य विवेक दास जी अपने क्रांतिकारी चरित्र के कारण संत कबीर से जुड़े और अपने अकादमिक रूचि के कारण कबीर और संत साहित्य पर कार्य भी किया और संत की विचारधारा का प्रसार कियाI उन्होंने कहा कि वरिष्ठ परामर्शदाता प्रो. कमलशील का मार्गदर्शन हम सबके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैI
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने कहा कि संत रविदास और संत कबीर दोनों धर्म को तर्क की कसौटी पर कसते हुए जनता को जगाने का कार्य करते हैं I दोनों संत श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित करते हैं I कार्यक्रम संचालन डॉ. प्रियंका सोनकर ने किया I कार्यक्रम में प्रो. कमलशील, डॉ. उषा त्रिपाठी, डॉ. राजीव वर्मा, प्रो. आर. के. मंडल, प्रो. श्री प्रकाश शुक्ला, डॉ. प्रभात मिश्र, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. महेन्द्र कुशवाहा, डॉ. विन्ध्याचल यादव, डॉ. राहुल मौर्य, डॉ. जगदीशन, डॉ. आनंद कर्ण , डॉ. ध्रुव कुमार सिंह, एवं शोधार्थीगण रंजीत, दिव्याअंशी, कुंतालिका, अभिषेक, विदिशा सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी एवं अध्यापकगण उपस्थित थे I



