
- खूबियों से भरपूर हैं प्राचीनतम सभ्यता से जुड़े मोटे अनाज
- प्रतिकूल मौसम में भी उपजाऊ, लंबे समय तक भंडारण योग्य
मोटे अनाजों का शुमार प्राचीनतम अनाजों में होता है। यही वजह है कि दुनिया की सबसे प्राचीनतम सभ्यता होने की वजह से ये हमारी थाली का भी हिस्सा रहे हैं। ईसा पूर्व 3000 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता में भी इनके प्रमाण मिले हैं। खेतीबाडी और मौसम की सटीक जानकारी देने वाले घाघ ने इनकी बोआई के तरीकों के साथ कहीं-कहीं इनकी खूबियों, यहां तक कि इनके रेसिपी की भी चर्चा की है। मसलन बाजरे की खूबी के बाबत घाघ कहते हैं, “उठ के बाजरा यू हंसि बोलै, खाये बूढ़ा जुवा हो जाय।” इसी तरह अपने एक दोहे में वह बताते हैं कि मडुआ के भात के साथ मछली और कोदो के भात को दूध या दही के साथ खाने में कोई जवाब नहीं है (मडुआ मीन, पीन संग दही, कोदो का भात दूध संग दही)।
बहुत ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं, करीब एक दशक पहले हुए एक सर्वे के मुताबिक 1962 में देश में प्रति व्यक्ति मोटे अनाजों की सालाना खपत करीब 33 किलोग्राम थी। हालांकि 2010 में यह घटकर करीब 4 किलोग्राम पर आ गई। दरअसल हरित क्रांति के पहले कम खाद, पानी, प्रतिकूल मौसम में भी उपजने वाला और लंबे समय तक भंडारण योग्य यही अनाज हमारी थाली का मुख्य हिस्सा थे। पर, हरित क्रांति में गेहूं-धान पर सर्वाधिक फोकस, सिंचाई के बढ़ते संसाधन एवं रासायनिक खादों एवं रसायनों की उपलब्धता की चकाचौंध में कहने को मोटे, पर भरपूर मात्रा में डायटरी फाइबर, प्रोटीन, बसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम एवं आयरन के नाते खुद में पोषण के पावरहाउस इन अनाजों को हमने भुला दिया।
मोटे अनाजों में वैश्विक स्तर पर भारत कहां है, इस पर नजर दौड़ाएं तो इनके उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 20 फीसद के करीब है। एशिया के लिहाज से देखें तो भारत की हिस्सेदारी करीब 80 फीसद है। इसमें बाजरा एवं ज्वार हमारी मुख्य फसल है। खासकर बाजरा के उत्पादन में भारत विश्व में नंबर एक है और भारत में बाजरा उत्पादन में उत्तर प्रदेश नंबर एक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष को सफल बनाने में भारत, खासकर उत्तर प्रदेश की जवाबदेही बढ़ जाती है। प्रदेश सरकार इसके लिए तैयार भी है। मोटे अनाजों को लोकप्रिय बनाने की मुकम्मल योजना पहले ही तैयार हो चुकी है। अब इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता पर फोकस है।
मिलेट वर्ष मनाने के बाद से ही देश में शुरू हो गई थीं तैयारियां
उल्लेखनीय है कि भारत 2018 में ही मिलेट वर्ष मना चुका है। भारत की पहल पर ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया है। ऐसे में इसको सफल बनाने में भारत और कृषि बहुल उत्तर प्रदेश की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में ‘मिलेट रिवॉल्यूशन’ का जिक्र कर इस बाबत संकेत भी दे दिया था कि भारत इसके लिए तैयार है। यह तैयारी 2018 से ही जारी है। चार साल पहले भारत सरकार ने मोटे अनाजों को पोषक अनाजों की श्रेणी में रखते हुए इनको प्रोत्साहन देने का काम शुरू किया। इस दौरान प्रति हेक्टेयर उपज एवं उत्पादन के लिहाज से अब तक के नतीजे भी अच्छे रहे हैं।
मसलन इन चार वर्षों में इनकी उपज 164 लाख टन से बढ़कर 176 लाख टन हो गई। इसी क्रम में प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1163 किलोग्राम से बढ़कर 1239 किलोग्राम हो गया। सरकार से मिले प्रोत्साहन के कारण इनसे जुड़ी संस्थाओं ने भी मोटे अनाजों के लिए बेहतरीन काम किया है। मसलन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च (आईआईएमआर-हैदराबाद) केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की मदद से टेक्नोलॉजी इनक्यूबेटर न्यूट्री हब की स्थापना कर नए स्टार्टअप को बढ़ावा दे रही है। स्टार्टअप शुरू करने वाले को हर तरह की मदद दी जा रही है।
लक्ष्य यह है कि करीब एक महीने बाद जब इंटरनेशनल मिलेट वर्ष की शुरुआत हो तब तक स्टार्टअप्स की संख्या 1000 तक हो जाय। यही नहीं इस दौरान मिलेट को बेस करके 500 से अधिक रेसिपी (रेडी टू ईट, रेडी टू कूक) भी तैयार की जा चुकी है। इसी समयावधि में मोटे अनाजों की अधिक उपज देने वाली एवं रोग प्रतिरोधक 150 से अधिक बेहतर प्रजातियां भी लांच की जा चुकी हैं। इनमें 10 अतिरिक्त पोषण वाली और 9 बायोफर्टिफाइड ब्रीडिंग के जरिए पोषक तत्त्वों को बढ़ाने वाली हैं।
मोटे अनाजों को लोकप्रिय बनाने के लिए योगी सरकार भी तैयार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर कृषि विभाग ने अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष में मोटे अनाजों के प्रति किसानों एवं लोगों को जागरूक करने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की है। इस दौरान राज्य स्तर पर दो दिन की एक कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसमें विषय विशेषज्ञ द्वारा 250 किसानों को मोटे अनाज की खेती के उन्नत तरीकों, भंडारण एवं प्रसंस्करण के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा। जिलों में भी इसी तरह के प्रशिक्षण कर्यक्रम चलेंगे।
प्रोत्साहन के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत जिन जिलों में परंपरागत रूप से इनकी खेती होती है, उनमें दो दिवसीय किसान मेले आयोजित होंगे। हर मेले में 500 किसान शामिल होंगे। इसमें वैज्ञानिकों के साथ किसानों का सीधा संवाद होगा। मिलेट की खूबियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए रैलियां निकाली जाएंगी। राज्य स्तर पर इनकी खूबियों के प्रचार-प्रसार के लिए दूरदर्शन, आकाशवाणी, एफएम रेडियो, दैनिक समाचार पत्रों, सार्वजिक स्थानों पर बैनर, पोस्टर के जरिए आक्रामक अभियान भी चलाया जाएगा।
ताकि भरपूर मात्रा में किसानों को मिले गुणवत्तापूर्ण बीज
खरीफ के अगले सीजन में जब किसान मोटे अनाजों की बोआई करें तब भरपूर मात्रा में गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध रहें, इस बाबत पिछले दिनों प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने केंद्रीय कृषि सचिव मनोज आहूजा से मिलकर ज्वार, बाजरा, सांवा, कोदो एवं मडुआ, रागी के बीजों के मिनी किट समय से उपलब्ध कराने की मांग की। बकौल कृषि मंत्री, उन्होंने सावां एवं कोदो के 350-350 कुंतल और मडुआ के 50 कुंतल बीज की मांग की है।
बीज कृषि निवेश में सर्वाधिक महत्वपूर्ण
सेवानिवृत्त उपनिदेशक कृषि डॉ अखिलानंद पांडेय के मुताबिक फसल उत्पादन के लिहाज से गुणवत्तापूर्ण बीज सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं। उपज और इसकी गुणवत्ता इसी पर निर्भर करती है। बाकी खेत की तैयारी, खाद, पानी एवं समय-समय पर कीटों एवं रोगों से बचाने के लिए फसल सुरक्षा के उपायों पर निर्भर करती है।
न्यूट्री सीरीयल्स घटक अन्तर्गत वर्षवार एवं फसलवार, क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता का विवरण
तीन वर्ष में बाजरे की खेती की प्रगति
वर्ष क्षेत्रफल उत्पादन उत्पादकता
2021 9.04 19.50 21.56
2022 9.80 24.06 24.55
2023 10.19 25.02 25.53
तीन वर्ष में ज्वार की खेती की प्रगति
वर्ष क्षेत्रफल उत्पादन उत्पादकता
2021 1.71 2.70 15.78
2022 2.15 3.40 15.80
2023 2.24 3.54 16.43
तीन वर्ष में कोदो की खेती की प्रगति
वर्ष क्षेत्रफल उत्पादन उत्पादकता
2021 0.02 0.02 6.92
2022 0.04 0.04 10.00
2023 0.04 0.04 10.40
तीन वर्ष में सांवा की खेती की प्रगति
वर्ष क्षेत्रफल उत्पादन उत्पादकता
2021 0.05 0.03 6.47
2022 0.11 0.11 10.00
2023 0.11 0.11 10.40



