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सीतारमण ने खोले पुराने आर्थिक मॉडल के राज, जानिए क्या बोलीं

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई सोवियत शैली की केंद्रीकृत योजना व्यवस्था और लाइसेंस-कोटा-परमिट राज भारत की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं रहे। इससे निर्णय लेने की शक्ति सीमित हाथों में केंद्रित हुई तथा उद्यमिता प्रभावित हुई। उन्होंने कहा कि 1991 के आर्थिक सुधार विवशता में हुए, जबकि विकसित भारत-2047 का लक्ष्य समृद्ध, आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से अग्रणी और अवसरों से परिपूर्ण भारत का निर्माण करना है।

नयी दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरूवार को कहा कि देश की स्वाधीनता के बाद अपनायी गयी सोवियत संघ जैसी केंद्रीकृत योजना प्रणाली भारत की परिस्थितियों के अनुकूल सिद्ध नहीं हुई और धीरे-धीरे सत्ता तथा निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होती चली गई।श्रीमती सीतारमण ने कहा , ‘पुरानी लाइसेंस-कोटा-परमिट राज ने प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर विवेकाधीन शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण कर दिया। निवेश संबंधी निर्णय बाजार की बजाय नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में चले गए।

” वह राजधानी में आर्थिक अनुसंधान संस्थान -नेशनल कौंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) द्वारा आयोजित 23वें इंडिया पॉलिसी फोरम में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और पूर्व वित्त मंत्री स्वर्गीय सी. डी. देशमुख की स्मृति में आयोजित व्याखान माला में इस वर्ष का व्याख्यान दे रही थीं।एनसीएईआर अपनी स्थापना के 70 वर्ष पूरे कर रही है और इसकी स्थापना वर्ष 1956 में वित्त मंत्रालय के सहयोग से हुई थी और इसकी प्रथम संचालन परिषद में स्वयं सी. डी. देशमुख सदस्य थे।

श्रीमती सीतारमण ने इसी संदर्भ में कहा कि मोदी सरकार का ‘विकसित भारत-2047’ ” कोई अभूतपूर्व महत्त्वाकांक्षा नहीं है। एक प्रकार से यह हमारे गौरव और समृद्धि की पुनर्स्थापना का संकल्प है।” उन्होंने कहा, ‘ सोवियत संघ की केंद्रीकृत योजना प्रणाली भारत की परिस्थितियों के अनुकूल सिद्ध नहीं हुई और धीरे-धीरे सत्ता तथा निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होती चली गई। लाइसेंस-कोटा-परमिट राज ने प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर विवेकाधीन शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण कर दिया। निवेश संबंधी निर्णय बाजार की बजाय नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में चले गए।

” उन्होंने कहा कि उस व्यवस्था में केंद्र सरकार द्वारा संचालित विशाल सार्वजनिक परियोजनाओं में समय के साथ अक्षमता, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। इस व्यवस्था से कुछ चुनिंदा संस्थाओं को लाभ मिला, जबकि वास्तविक भारतीय उद्यमिता का दायरा सीमित होता गया।वित्त मंत्री ने कहा कि (देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल रहे) सी. राजगोपालाचारी ने ही सबसे पहले इस व्यवस्था को “लाइसेंस-परमिट-कोटा राज” कहा था।

उन्होंने 15 दिसंबर 1963 को इंडियन लिबर्टेरियन मैगज़ीन में प्रकाशित अपने लेख “वर्कमैन क्वारल्स विद हिज टूल्स” में लिखा था कि ” लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, जो राष्ट्रीय उत्पादन और व्यापार पर भारी बोझ बनकर बैठा है। उसे अव्यवस्थित विकास और अवैध शोषण को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था, किंतु वास्तविकता यह है कि इसने विकास को बाधित किया और स्वयं शोषण को बढ़ावा दिया। जो भी प्रगति हुई है, वह इस व्यवस्था के कारण नहीं, बल्कि इसके बावजूद हुई है।

“तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई ने भी योजना आयोग की बढ़ती शक्तियों का विरोध किया था, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। उन्होंने कहा था कि योजना आयोग की कार्यप्रणाली और संरचना भी त्रुटिपूर्ण है। यह एक समानांतर मंत्रिमंडल बनता जा रहा है। इससे वित्त मंत्रालय की भूमिका कमजोर होगी और अंततः मंत्रिमंडल केवल औपचारिक स्वीकृति देने वाली संस्था बनकर रह जाएगा। श्रीमती सीतारमण ने कहा, ‘ जो व्यवस्था अपने आलोचकों की बात सुनने से इनकार करती है, वह अपनी गलतियों को बहुत देर से और बहुत भारी कीमत चुकाने के बाद समझती है। आज इतिहास हमें यही सिखाता है।

“वित्त मंत्री ने कहा कि भारत के प्रारंभिक आर्थिक निर्णयों का मूल्यांकन आजादी के समय के अभाव और असुरक्षा की पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए।1947 में स्वतंत्र भारत को विरासत में विभाजन, विस्थान, व्यापक गरीबी, खाद्य असुरक्षा तथा अत्यंत सीमित और कमजोर औद्योगिक आधार मिला था।स्वतंत्र भारत ने संस्थाओं के निर्माण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पर गहरा विश्वास व्यक्त किया। इसी संबंध में उन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो , भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र , भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों जैसी विश्वस्तरीय संस्थाओं की स्थापना का उल्लेख किया। आईआईटी मद्रास के लिए जर्मनी, आईआईटी बॉम्बे के लिए सोवियत संघ तथा आईआईटी कानपुर के लिए अमेरिका का सहयोग प्राप्त किया गया।

उन्होंने कहा कि कृषि को सशक्त बनाने के लिए अनेक ऐतिहासिक सिंचाई और विद्युत परियोजनाएँ आरंभ की गईं। किंतु उनका क्रियान्वयन अत्यंत धीमी गति से हुआ और जल वितरण नेटवर्क अंतिम छोर तक नहीं पहुँच पाया। खाद्यान्न के लिए भारत अमेरिका पर और रक्षा उपकरणों के लिए मुख्यतः सोवियत संघ पर निर्भर थे।उन्होंने कहा कि उस दौर में उसी अवधि में निर्यात तथा वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया, जबकि उसी समय पूर्वी एशिया की अनेक अर्थव्यवस्थाएँ अपनी संपूर्ण विकास रणनीति निर्यात आधारित मॉडल पर निर्मित कर रही थीं। 1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सबक भी दिया।

उन्होंने नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष प्रोफेसर अरविंद पनगढ़िया की पुस्तक नेहरू डेवलपमेंट मॉडल का उद्धरण देते हुए कहा कि 1991 के आर्थिक सुधार निस्संदेह ऐतिहासिक थे, किंतु वे गंभीर भुगतान संतुलन संकट की पृष्ठभूमि में किए गए और विवशता से प्रेरित सुधार थे।श्रीमती सीतारमण ने अपनी सरकार के विकसित भारत के संकल्प के बारे में कहा कि इसमें ऐसे देश की परिकल्पना की गयी है जहां शून्य गरीबी हो और प्रत्येक नागरिक को 100 प्रतिशत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अन्य सामाजिक सेवाएं उपलब्ध हो। प्रत्येक युवा कौशल से युक्त हो और उसे सार्थक रोजगार प्राप्त हो, महिलाएँ आर्थिक गतिविधियों में पूर्ण एवं समान भागीदारी निभाएँ, हमारे किसान भारत को विश्व का अन्न भंडार बनाएँ तथा भारत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करे।

उन्होंने कहा, ‘ जब हम 2047 तक विकसित भारत की बात करते हैं, तब यह हमारी दीर्घकालिक सभ्यतागत यात्रा का केवल एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।’ धन और संसाधनों के साथ समाज तथा आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। हम अपनी विरासत का उपयोग कर सकते हैं, परंतु उसके संरक्षक होने के नाते उसे समाप्त करने का अधिकार हमें नहीं है।श्रीमती सीतारमण ने कहा, ‘ हमारा दायित्व केवल भावी पीढ़ियों के प्रति ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति है।हमारी नियति एक विकसित सभ्यता बनने की है।’

उन्होंने यह भी कहा कि वरिष्ठ पीढ़ी इस राष्ट्र की बुद्धिमत्ता, अनुभव और स्मृतियों की धरोहर है। यदि यह विरासत अगली पीढ़ी तक न पहुँचे तो समय के साथ विलुप्त हो जाती है। युवा पीढ़ी ऊर्जा, नवाचार और नेतृत्व लेकर आती है। वही भारत को अगले चरण तक पहुँचाएगी और वही 2047 तथा उसके बाद के भारत का निर्माण करेगी। के रूप में विकसित हुई। (वार्ता)

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