नर सेवा, नारायण सेवा: नर नारायण भोज में 300 लोगों को कराया भोजन
वाराणसी में परमानेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत नर नारायण भोज का आयोजन चित्तरंजन पार्क स्थित खिचड़ी बाबा मंदिर में किया गया। इस सेवा अभियान में करीब 300 लोगों को भोजन कराया गया। अध्यक्ष ऋषि देव अग्रवाल सहित सदस्यों ने सेवा कार्य में सहयोग दिया। संयोजक अभिषेक केशरी एवं प्रीतम माणिक रहे। यह पहल मानवता, करुणा, परोपकार और जरूरतमंदों की सेवा का प्रेरक संदेश देती है।
वाराणसी। मानवता की सच्ची पहचान दूसरों के दुख-दर्द को समझने और जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आने में है। इसी सेवा भावना को आत्मसात करते हुए ‘परमानेंट प्रोजेक्ट, नर नारायण भोज’ के अंतर्गत मंगलवार, 13 अक्टूबर को चित्तरंजन पार्क स्थित खिचड़ी बाबा मंदिर में भोजन सेवा का आयोजन किया गया। सुबह 7:30 बजे आयोजित इस पुनीत सेवा कार्य में करीब 300 लोगों को भोजन कराया गया। इस पहल के माध्यम से सेवा, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रेरणादायक संदेश दिया गया।
‘नर नारायण भोज’ की मूल भावना यह है कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराना केवल उनकी भूख मिटाने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके प्रति सम्मान, संवेदना और अपनत्व प्रकट करने का भी एक सार्थक प्रयास है। ऐसे सेवा कार्य समाज में मानवीय मूल्यों को मजबूत करते हैं और लोगों को परोपकार के लिए प्रेरित करते हैं।

कार्यक्रम में अध्यक्ष ऋषि देव अग्रवाल, अर्चित अग्रवाल, अनूप अग्रवाल सहित अन्य सदस्यों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। सभी ने सेवा कार्य में सहयोग देकर आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम के संयोजक अभिषेक केशरी एवं प्रीतम माणिक थे, जिन्होंने आयोजन की जिम्मेदारी संभाली।
उल्लेखनीय है कि ‘नर नारायण भोज’ का आयोजन प्रत्येक माह के द्वितीय एवं चतुर्थ मंगलवार को चित्तरंजन पार्क स्थित खिचड़ी बाबा मंदिर में नियमित रूप से किया जाता है। नियमित रूप से चल रही यह पहल समाज के प्रति सेवा भाव और जरूरतमंदों की सहायता के संकल्प को दर्शाती है।
आज के दौर में जब सामाजिक जीवन में संवेदनशीलता और आपसी सहयोग की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है, ऐसे आयोजन मानवता के मूल संदेश को जीवंत बनाए रखते हैं। किसी जरूरतमंद को सम्मानपूर्वक भोजन उपलब्ध कराना उसके जीवन में राहत और आत्मीयता का अनुभव जोड़ सकता है। ‘नर नारायण भोज’ जैसी पहल इस विश्वास को मजबूत करती है कि समाज की वास्तविक समृद्धि केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति करुणा, सहयोग और सेवा के भाव से आती है।
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