वाराणसी। अग्रकुल जनक महाराज श्री अग्रसेन जी की जयंती के अवसर पर सामाजिक संस्था संकल्प ने सोमवार को मैदागिन स्थित श्री अग्रसेन वाटिका में उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर संस्था के संरक्षक अनिल कुमार जैन ने कहा कि महाराज अग्रसेन जी का जीवन दर्शन हमें यह सिखाता है कि समाज का कोई भी व्यक्ति अकेला या असहाय न रहे। उनका प्रसिद्ध सिद्धांत “एक रुपया और एक ईंट” केवल सहयोग का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता और साझा जीवनशैली का संदेश है।
अग्रसेन जी का आदर्श आज भी प्रासंगिक
अनिल कुमार जैन ने भावुक होते हुए कहा— “अगर हर परिवार अपनी आय में से एक रुपया और अपने घर से एक ईंट समाज को समर्पित करे, तो न भूख रहेगी, न बेघरपन। आज यह संकल्प लेना आवश्यक है कि हम समाज को इतना मजबूत बनाएं कि कोई भी जरूरतमंद बिना सहारे के न रहे। राष्ट्र तभी आगे बढ़ेगा जब समाज का हर व्यक्ति सुरक्षित, सशक्त और संपन्न होगा।”

संकल्प संस्था की सामाजिक पहलें
इसी प्रेरणा के तहत संकल्प संस्था ने ‘क्षय मुक्त काशी – निरोग काशी’ अभियान की शुरुआत की। अब तक इस अभियान से 16,000 से अधिक क्षय रोगियों को स्वस्थ जीवन मिल चुका है। इसके अतिरिक्त संस्था ने संकल्प अन्न क्षेत्र की स्थापना की है, जिसके अंतर्गत बीते 30 महीनों से प्रत्येक शनिवार और विशेष पर्व-त्योहारों पर खिचड़ी, प्रसाद और जल सेवा की जा रही है।
प्रत्येक प्रसाद वितरण शिविर से 500 से अधिक लोग प्रत्यक्ष लाभान्वित होते हैं।
सेवा और सहयोग का संकल्प
इस अवसर पर संस्था के संस्थापक सदस्य आलोक कुमार जैन, रमेशचंद्र अग्रवाल, हरेकृष्ण अग्रवाल, पंकज अग्रवाल (एलआईसी), मनोज जैन, हरीशजी अग्रवाल, संतोष अग्रवाल (आढ़त वाले), संजय अग्रवाल, लव जी अग्रवाल सहित अन्य सदस्यों ने समाज में सेवा, सहयोग और एकता की भावना को और मजबूत करने का संकल्प लिया।
महाराज अग्रसेन जी का मूल मंत्र : समाज सेवा और समरसता का प्रतीक
महाराज अग्रसेन जी को भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, समानता और सहयोग का आधार स्तंभ माना जाता है। उनका जीवन संदेश आज भी समाज को जोड़ने और परोपकार की भावना को बढ़ावा देने में प्रेरक है।
मूल मंत्र
महाराज अग्रसेन जी ने अपने अनुयायियों को यह मूल मंत्र दिया था कि— “जो भी व्यक्ति नगर में आए, उसकी मदद करो। हर घर से उसे एक ईंट और एक रुपया दो, ताकि वह अपने जीवन और व्यवसाय की शुरुआत कर सके।” इस संदेश का गहरा अर्थ यह था कि समाज में कोई भी व्यक्ति अकेला या असहाय न रहे। सहयोग और भाईचारे के माध्यम से हर परिवार को मजबूत बनाया जाए।

आज के दौर में जब समाज में प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ का बोलबाला है, महाराज अग्रसेन जी का यह मूल मंत्र पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनके बताए “एक रुपया, एक ईंट” के सिद्धांत ने आपसी सहयोग और आर्थिक आत्मनिर्भरता की परंपरा को जन्म दिया। यही कारण है कि उन्हें “वाणिज्य का जनक” और “सामाजिक न्याय के प्रवर्तक” के रूप में सम्मानित किया जाता है। यह मूल मंत्र केवल आर्थिक सहयोग का प्रतीक नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और सहयोग की अमिट परंपरा का निर्माण करने वाला संदेश था।
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