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कालीन और दरी के निर्यात में 50 फीसदी गिरावट की आशंका

कोरोना लेगा 30 हजार से अधिक लोगों की नौकरी ,असंगठित के साथ संगठित छेत्रो में भी वेतन घटाने पर हो रहा विचार

(युगल किशोर जालान)
वाराणसी। कोरोना से उत्पन्न आर्थिक परेशानी से उद्योग-व्यापार जगत में कर्मचारियों की छटनी और वेतन घटाने पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। सर्वाधिक खराब स्थिति वाराणसी, भदोई व मिर्जापुर कालीन बेल्ट की है। माना जा रहा है कि देश से इस वित्तीय वर्ष में कालीन और दरी सहित फ्लोर कवरिंग का निर्यात बीते वर्ष का आधा भी नहीं रहेगा। अब बात खुदरा और थोक व्यापार की करें तो किसी भी दृष्टि से स्थिति ठीक महसूस नहीं होती। असंगठित के साथ संगठित छेत्रो में भी कर्मचारियों की छटनी और वेतन घटाने पर विचार-विमर्श शुरू हो चुका है। अकेले वाराणसी शहर में कोरोना 30 हजार से अधिक लोगों की नौकरी लेने वाला है।
वाराणसी शहर में हथकरघा और पावरलूम वस्त्र उद्योग के बाद खुदरा और थोक व्यापार ही सबसे बडा रोजगारपरक छेत्र है। शायद सुनने में बहुत ज्यादा लगे किन्तु इस शहर में रिटेल और होलसेल की छोटी-बडी मिलाकर दुकानों, शोरूमो, रेस्तरां इत्यादि की संख्या तीस हजार से भी अधिक आंकी जाती है। ठेलो और पटरियों पर लगने वाली दुकानों को भी शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या और अधिक हो जाएगी। कोरोना के लाकडाउन ने अच्छो-अच्छो को भविष्य के लिए चिंतित कर दिया है। स्वाभाविक है, खर्चों में कटौती के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाएँगे ही। अब औसतन हर दुकान से एक कर्मचारी भी हटाया गया तो संख्या तीस हजार के पार हो जाएगी। यदि अनेक दुकानों पर कर्मचारी नहीं है तो ऐसे प्रतिष्ठानो की भी कमी नहीं, जहां सैकडों कर्मचारी कार्यरत है। अब फुटपाथ पर चाय बेचने वालों के यहाँ भी कर्मचारी रहते हैं।
कोरोना संकट में सरकार ने संकेत दे दिया है कि आम से खास तक, सभी को अपने खर्चों में कटौती करना जरूरी हो गया है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद इत्यादि के वेतन में कटौती के बाद अब सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाले डीए यानी महंगाई भत्ते की बढ़ी हुई इंस्टॉलमेंट पर रोक लगा दी है। इसका असर प्राइवेट नौकरी की सेलरी पर भी दिखना ही है। व्यापार जगत मार्च महीने से ही हताश है। असंगठित ही नहीं, संगठित छेत्र में भी नौकरी करने वाले इस टेंशन में है कि अप्रैल की सेलरी मिलेगी या नहीं। इतना तो मानकर चलिए कि सेलरी में कटौती होनी ही है। इसलिए कबूतरों की तरह आखों को बंद कर ना बैठें, खर्चों में जितनी अधिक कटौती कर सकेंगे, उतने ही सुखी रहेंगे। अच्छी तरह समझ लीजिए कि अब वर्ष 2020 में कोई नया जाब मिलने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखेगी। इस आशंका को नहीं झुटलाया जा सकता कि लाकडाउन हटने पर आर्थिक और सामाजिक सहित अनेक बडी चुनौतियां हमारे सामने होगी। इन चुनौतियों के लिए हमें अभी से मानसिक रूप से तैयार होना होगा।
अब एक एक रुपया सौ-सौ बार सोच कर खर्च करने में ही समझदारी है। फिलहाल तो यही लगता है कि पूरा विश्व आर्थिक संकट में है। यदि कोई उम्मीद करता है कि लाकडाउन खुलने पर सबकुछ सामान्य हो जाएगा तो बहुत बडी भूल है। इस शहर में ही हजारों की संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनको मार्च महीने की सेलरी नहीं मिली या आधी ही मिली। ऐसे में लाखों लोग आशंकित हैं कि अप्रैल महीने की सेलरी मिलेगी या नहीं। आमतौर पर लोग यही मानकर चल रहे हैं कि यदि सेलरी मिली भी तो भारी कटौती के साथ मिलेगी क्यों कि कर्मचारियों का बडा वर्ग आर्थिक मंदी की मार महसूस कर रहा है। कर्मचारी वर्ग को अब यह स्वीकार करलेना चाहिए कि उनकी आमदनी घट चुकी है और अपनी खर्च की आदतों को बदलने में ही भलाई है।

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