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छोटा प्रयाग में धधक रही हैं कल्पवासियों की धूनिया

गोंडा : उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में भगवान बाराह की अवतार स्थली पसका सूकरखेत के निकट घाघरा और सरयू नदी के संगम छोटा प्रयाग में पौष मास के प्रारंभ से ही देश विदेश से आये कल्पवासियों का जमघट लगा हुआ है।इस ऐतिहासिक स्थली के त्रिमुहानी घाट पर भीषण ठंड के बावजूद दूर दूर से आये साधू संत महात्मा और श्रद्धालू घासफूस की अस्थायी झोपड़ियों को बनाकर अपने भौतिक सुख से विरत रहकर एक मास का कल्पवास कर रहे है। इस अवधि में कल्प वासियों की धूनिया धधकती रहती है।

सरयू ,घाघरा और टेढ़ी नदियों के संगम स्थान को छोटा प्रयाग के नाम से जाने जाने वाले उत्तर भारत के इस पवित्र तीर्थस्थल पर मुख्य मेला आगामी छह जनवरी को पौष पूर्णिमा पर होगा। दूर दराज से आये श्रद्धालू संगम में आस्था की डुबकी लगाकर यहाँ स्थित मंदिरो में माँ बाराहीदेवी ,उत्तरी भवानी व अन्य देवी देवताओं के पूजन अर्चना के अपनी मनोकामना पूर्ण होने की अरदास लगाते है।कल्पवासी पौराणिक गुरु नरहरिदास आश्रम और तुलसीदास द्वारा हस्तलिखित रामचरित मानस व उनकी चरणपादुका का दर्शन कर रहे है। इस स्थान का उल्लेख राम चरित्र मानस के बालकाण्ड की एक चौपाई में किया गया है। पसका सूकर खेत सरयू और घाघरा नदी के पवित्र संगम स्थान को त्रिमुहानी के नाम से पुकारा जाता है।

पौराणिक मान्यताओ के अनुसार ,यह स्थान गोस्वामी तुलसीदास की है जन्मस्थली है। पसका सूकरखेत राजापुर में तुलसीदास जी के गुरु नरहरिदास जी का आश्रम भी है। रामचरित मानस के बालकांड में इस स्थान का उल्लेख तुलसीदास जी ने किया है।गोस्वामी तुलसीदास ने अपने गुरु नरसिंहदास से दीक्षा लेकर विभिन्न ग्रंथों व शास्त्रों का गहन अध्ययन एवं रामायण का अनुश्रवण किया। इस क्षेत्र को उनकी गूरूभूमि भी कहा जाता है। श्रीमद्धभगवत गीता महापुराण व बारह पुराण में हुये वर्णन में कहा गया है कि राक्षस हिरण्याक्ष के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिये भगवान विष्णु सूकर बाराह का रुप धारण कर अवतरित हुये। इसलिये इस तपोस्थली को सूकरखेत या वाराह क्षेत्र भी कहा जाता है।इस धार्मिक स्थली को लोग स्वर्ग की भी संज्ञा देते हैं।

इस का महात्म्य स्कन्द पुराण में भी इस तरह मिलता है। ‘दशकोटि सहस्त्राणि, दस कोटि शतानि च। तीर्थानि सरयू नद्या घर्घरोदक संगमें’ अर्थात सरयू व घाघरा तट पर हजारों तीर्थ विद्यमान हैं। रामचरित मानस के बालकांड में भी इस पुण्य क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।मानस में कहा गया है कि ‘त्रिविधि ताप नाशक त्रिमुहानी’ ऐसी मान्यता है। कि संगम के त्रिमुहानी में स्नान करने से लोगों को तीनों तापों से मोक्ष प्राप्त होता है। इस लिये पसका संगम को लघु प्रयाग भी कहा गया है। इस लिये पौष पूर्णिमा पर शुक्रवार को लाखों श्रद्धालु स्नान, दान कर भागवत भजन करेंगे। हिरण्याक्ष का मर्दन करने के बाद पृथ्वी पुन :स्थापित की गयी। इसके फलस्वरूप इस धरती को मेदिनी के नाम से भी जाना जाने लगा।इसी के साथ माँ बाराहीं का अवतरण हुआ जो यहाँ उत्तरी भवानी के नाम से विख्यात है।

कल्पवास के दौरान भगवान वाराह के अनुयायी यहां स्थापित भगवान बाराह के मंदिर परिसर में लोग वैदिक रीति रिवाज़ से मुंडन ,यज्ञोपववीत ,विवाह व अन्य रस्मों को अदा कर भव्य भंडारे का आयोजन करते है। आगामी छह जनवरी को पौष पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाले विशाल मेले को लेकर क्षेत्र में मेला स्थल के इर्द गिर्द व्याप्त गंदगी व त्रिमुहानीं घाट पर शवों के अंतिम संस्कार के अवशेष व गंदगी से कल्पवास करने आये ऋषि मुनियों मे आक्रोश हैं।प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार ,मेला क्षेत्र में सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं के पुख्ता प्रबंध किये गये है।(वार्ता)

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