क्या खामेनेई की मौत से भड़केगा तीसरा विश्व युद्ध? अमेरिका-ईरान टकराव ने दुनिया को चौंकाया
अमेरिका-इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया में हालात विस्फोटक हो गए हैं। 1953 के तख्तापलट से लेकर 1979 की इस्लामी क्रांति और 2015 के परमाणु समझौते तक चली तनातनी अब खुले सैन्य टकराव में बदलती दिख रही है। परमाणु ठिकानों पर हमले, प्रतिबंध और कूटनीतिक वार्ता की विफलता ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है।
– दशकों पुरानी दुश्मनी बनी खुली जंग – परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद वैश्विक हलचल तेज
नयी दिल्ली : अमेरिका-इजरायल हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की शनिवार तड़के मौत के साथ दोनों देशों के बीच का दशकों पुराना तनाव अपने चरम पहुंच गया है।श्री खामेनेई के गुरू अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ही अमेरिका ईरान का सबसे बड़ा विरोधी बना हुआ है। तब से ही, दोनों देश परमाणु, राजनीतिक हस्तक्षेप और गुटबाजी के आरोप-प्रत्यारोप के साथ एक दूसरे से टकराते रहे हैं।लेकिन इस तनाव की कहानी लगभग ढ़ाई दशक और पीछे जाती है, जब 1951 में ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गये प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ ने एंग्लो-इरानियन ऑयल कंपनी के राष्ट्रीयकरण के प्रयास शुरू किये।
श्री मोसादेघ के इस कदम से अंग्रेज नाराज हो गए और अमेरिका अपने इस सहयोगी की मदद के लिए कूद पड़ा। अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने 1953 में तख्तापलट करने और शाह रजा पहलवी को वापस सत्ता में लाने में ब्रिटेन की मदद की। अमेरिका समर्थित श्री शाह के सत्ता पर बैठने से दोनों देशों के बीच अस्थायी तौर पर संबंध बेहतर होते नज़र आये।तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर के ‘एटम्स फॉर पीस’ कार्यक्रम के हिस्से के रूप में दोनों देशों ने 1957 में नागरिक परमाणु ऊर्जा के उपयोग के लिए एक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किया। एक दशक बाद, अमेरिका ने ईरान को एक परमाणु रिएक्टर और ईंधन के रूप में यूरेनियम प्रदान किया।
ईरान और अमेरिका के संबंध फल-फूल रहे थे, लेकिन ईरानी नागरिक शाह के तानाशाही शासन में कराह रहे थे। नागरिक व्यापार पर पश्चिमी प्रभाव का लगातार विरोध कर रहे थे, लेकिन 1978 के अंत में यह विरोध क्रांतिकारी प्रदर्शनों में बदल गया और जनवरी 1979 में शाह को भागने पर मजबूर होना पड़ा। वर्ष 1979 इस्लामी क्रांति के परिणामस्वरूप निर्वासित इस्लामी विद्वान अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी नए इस्लामी गणराज्य पर शासन करने के लिए लौटे।कैंसर के इलाज के लिए निर्वासित शाह को अमेरिका में प्रवेश देने के बाद ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में अमेरिका ने ईरान से राजनयिक संबंध तोड़ दिए और देश पर प्रतिबंध लगा दिए।
दोनों देशों के बीच तनाव तब और गहरा हो गया, जब सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में 1980 में इराक ने ईरान पर आक्रमण कर दिया और अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का समर्थन किया। यह युद्ध 1988 तक चला और इसमें दोनों पक्षों के हजारों लोग मारे गए। इराक ने ईरान पर रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया।संबंधों में एक नया मोड़ तब आया, जब वर्ष 1984 लेबनान के बेरुत में सैन्य अड्डे पर हुए एक हमले में 241 अमेरिकी नागरिक मारे गए थे। अमेरिका ने इसका दोष ईरान समर्थित लेबनानी शिया आंदोलन हिजबुल्लाह पर मढ़ा और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने आधिकारिक तौर पर ईरान को ‘आतंकवाद प्रायोजक राज्य’ घोषित कर दिया।
खाड़ी युद्ध के दौरान ही 1988 में अमेरिकी नौसैनिक जहाज ने ईरानी जलसीमा का उल्लंघन किया और आठ जुलाई को दुबई जा रहे नागरिक विमान ईरान एयर (आईआर655) पर गोलीबारी की, जिसमें सवार सभी 290 लोग मारे गए।अमेरिका ने 1995 और 1996 के बीच और अधिक प्रतिबंध लगाए। तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकारी आदेशों ने अमेरिकी कंपनियों के ईरान के साथ व्यापार करने पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि कांग्रेस ने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने या उसे उन्नत हथियार बेचने वाली विदेशी संस्थाओं को दंडित करने वाला कानून पारित किया।
अमेरिका पर 9/11 के हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपने संबोधन में कहा कि ईरान, इराक और उत्तर कोरिया के साथ ‘एक्सिस ऑफ एविल’ का हिस्सा था। हालांकि उस समय ईरान अपने साझा दुश्मनों – अफगानिस्तान में तालिबान और अल-कायदा को निशाना बनाने के लिए पर्दे के पीछे अमेरिका के साथ बातचीत भी कर रहा था।अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में 2013 और 2015 के बीच ईरान के साथ उच्च स्तरीय परमाणु वार्ता शुरू हुई। ईरान 2015 में परमाणु समझौते पर सहमत हुआ, जिसे औपचारिक रूप से जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपिएओ) के रूप में जाना जाता है। इसके अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में ढील देने के बदले ईरान ने परमाणु गतिविधियों को सीमित करने का वादा किया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका 2018 में एकतरफा रूप से समझौते से पीछे हट गया और ईरान के खिलाफ फिर से प्रतिबंध लगा दिए। उल्लेखनीय है कि श्री ट्रंप और इजरायल दोनों जेसीपिएओ समझौते के आलोचक रहे थे।श्री ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान ही अमेरिका ने 2020 में बगदाद में एक ड्रोन हमले में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराया, जिसके जवाब में ईरान ने इराक में अमेरिकी संपत्तियों पर हमले किये।टश्री ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान 2025 में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को 60 दिनों की समय सीमा के साथ एक नए परमाणु समझौते पर बातचीत का प्रस्ताव देते हुए पत्र भेजा। लेकिन श्री खामेनेई ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत नहीं करना चाहता बल्कि उस पर शर्तें थोप रहा है।
ओमान की मध्यस्थता में अनौपचारिक बातचीत शुरू हुई, लेकिन बातचीत के छठे दौर से एक दिन पहले इजरायल ने ईरान पर हमले कर दिए।साथ ही अमेरिका ने भी अमेरिका ने सुरक्षा चिंताओं और इजरायल की रक्षा का हवाला देते हुए ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों पर बमबारी की। यह संघर्ष 13 जून से शुरू हुआ और 24 जून को युद्ध विराम के समझौते के साथ रुका।दोनों देशों के बीच छह महीने से अधिक समय बाद ओमान की मध्यस्थता में छह फरवरी और 26 फरवरी को दौ दौर की अप्रत्यक्ष वार्ता भी हुई, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिकी हमले से दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया।(वार्ता)
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