दीपावली पर उल्लू बलि की काली सच्चाई ,अंधविश्वास, तंत्र साधना और संकट में पक्षी
दीपावली के उजाले में छिपा अंधेरा - उल्लू बलि की कुप्रथा अब भी जारी। तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास के नाम पर हर साल सैकड़ों उल्लू मारे जाते हैं। जानिए कानून, धर्म और समाज का पक्ष इस विस्तृत रिपोर्ट में।
- आशुतोष गुप्ता
दीपावली को भारत का सबसे बड़ा और सबसे पवित्र पर्व माना जाता है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। इस दिन पूरा भारत रोशनी से नहा उठता है। घर-घर दीपक जलते हैं, लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है, और परिवार मिलकर खुशियाँ बाँटते हैं। लेकिन इस उजाले के पर्व की जगमगाहट के बीच एक ऐसा अंधेरा भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग बात करते हैं। वह अंधेरा है – दीपावली पर उल्लू की बलि की परंपरा।
हर साल दीपावली के आसपास देश के कई हिस्सों में उल्लू की अवैध पकड़, तस्करी और बलि की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। यह सब तंत्र-मंत्र, अंधविश्वास और धन प्राप्ति की झूठी मान्यताओं के नाम पर होता है। एक ओर लोग माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तो दूसरी ओर उनके वाहन की हत्या करते हैं। यह विरोधाभास न केवल धार्मिक दृष्टि से गलत है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और संस्कृति दोनों के लिए कलंक है।
उल्लू: माँ लक्ष्मी का वाहन, लेकिन बना अंधविश्वास का शिकार
भारतीय संस्कृति में उल्लू को माँ लक्ष्मी का वाहन माना गया है। पुराणों और लोककथाओं में उल्लू को बुद्धि, सतर्कता और समृद्धि का प्रतीक बताया गया है। पद्मपुराण में उल्लू को “धनरक्षक” के रूप में उल्लेख किया गया है। देवी लक्ष्मी के चित्रों में उन्हें प्रायः उल्लू के साथ दिखाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि अंधकार में भी विवेक और स्थिरता बनी रहनी चाहिए।
लेकिन धीरे-धीरे लोकमान्यताओं और तांत्रिक परंपराओं ने इस छवि को विकृत कर दिया। कहा जाने लगा कि उल्लू की बलि देने से धन की वर्षा होती है, व्यापार में लाभ होता है और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। दीपावली की रात, जिसे लक्ष्मी के स्वागत का पर्व माना जाता है, उसी रात गुप्त रूप से हजारों उल्लू मारे जाते हैं।
तंत्र साधना और अंधविश्वास की गहरी जड़ें
भारत में तंत्र साधना की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। प्राचीन काल में यह साधना आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों रूपों में की जाती थी। लेकिन समय के साथ यह परंपरा विकृत होती चली गई। कुछ लोगों ने इसे धन और शक्ति प्राप्त करने का माध्यम बना लिया। लोककथाओं में कहा गया कि उल्लू की बलि देने से साधक को “सिद्धि” मिलती है। उल्लू की आँखें और नाखून तांत्रिक प्रयोगों में उपयोग किए जाने लगे। यहाँ तक कि कुछ तांत्रिक मान्यताओं में कहा गया कि उल्लू का रक्त धन को आकर्षित करता है।

फाइल फोटो
यह सब अंधविश्वास और भय पर आधारित है। न तो किसी शास्त्र में उल्लू बलि का उल्लेख है, न ही कोई धार्मिक ग्रंथ इसे मान्यता देता है। फिर भी यह प्रथा साल-दर-साल दीपावली की रात दोहराई जाती है – गाँवों, कस्बों और यहाँ तक कि कुछ बड़े शहरों में भी।
कानून की नजर में अपराध
भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत उल्लू संरक्षित प्रजातियों में शामिल है। इसका मतलब है कि उल्लू का शिकार करना, पकड़ना, बेचना या बलि देना अपराध है। इस अधिनियम की अनुसूची IV में उल्लू को संरक्षण प्राप्त है। दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक की कैद और 25,000 रुपये या उससे अधिक का जुर्माना हो सकता है।
फिर भी, हर साल दीपावली से कुछ दिन पहले तक वन विभाग और पुलिस ऐसे मामलों में छापे मारती हैं। 2019 में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में एक तांत्रिक को गिरफ्तार किया गया था, जिसके पास से छह जीवित उल्लू मिले। 2021 में बिहार के सीवान जिले में भी इसी तरह की कार्रवाई हुई। पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और असम से भी हर साल ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं।
वन्यजीव संरक्षण संगठन TRAFFIC India की रिपोर्ट “Imperilled Custodians of the Night” बताती है कि भारत में उल्लू की लगभग 30 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से कई संकटग्रस्त हैं। दीपावली के दौरान इनकी तस्करी सबसे अधिक होती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: “उल्लू का नाश, पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ देगा”
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उल्लू न केवल धार्मिक प्रतीक है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा भी है। यह चूहे और अन्य छोटे जीवों को खाकर खेती की रक्षा करता है। किसान इसे “रात्रि का प्रहरी” कहते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञकहते हैं – “उल्लू को मारना केवल धार्मिक या कानूनी गलती नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी की भी हत्या है। अगर उल्लू खत्म हो जाएँगे, तो खेतों में चूहों की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे अनाज की बर्बादी होगी।” Wildlife SOS के अनुसार, दीपावली के दौरान सोशल मीडिया पर फर्जी तंत्र-मंत्र के प्रचार और ऑनलाइन उल्लू बेचने के प्रयास तक देखे गए हैं। कई तांत्रिक YouTube पर वीडियो बनाकर “धन प्राप्ति हेतु उल्लू साधना” जैसे झूठे दावे करते हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण: शास्त्र नहीं कहते बलि दो, कहते हैं करुणा रखो
वाराणसी, प्रयागराज और उज्जैन जैसे धार्मिक नगरों के विद्वान पंडित इस प्रथा को “धर्मविरुद्ध” बताते हैं। कहते हैं – “लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। जो अपने वाहन की हत्या करता है, वह देवी की कृपा का पात्र नहीं बन सकता। यह बलि नहीं, पाप है।” शास्त्रों में बलिदान का अर्थ त्याग और अर्पण से है – न कि हिंसा से। नारियल, कद्दू और फल-फूल की बलि इसी प्रतीकात्मकता का उदाहरण है। धार्मिक दृष्टि से देखें तो उल्लू बलि न केवल असंगत है, बल्कि देवी लक्ष्मी का अपमान है।
ज्योतिर्विद रमनजी बोले – उल्लू बलि एक छलावा, बलि का अर्थ है अहंकार का अर्पण
वाराणसी के सिद्धगिरि बाग और लखनऊ के गोमती नगर स्थित स्वयंभू ज्योतिष कार्यालय के संचालक ज्योतिर्विद रमनजी, जो पिछले तीस वर्षों से ज्योतिष एवं आध्यात्मिक परामर्श दे रहे हैं, ने दीपावली और नवरात्रि के अवसर पर दी जाने वाली पशु-पक्षी बलि पर स्पष्ट कहा है कि- “यह सब एक छलावा मात्र है। समाज में ऐसी प्रथाएं और इनके कथित चमत्कार गहराई तक जड़ें जमा चुके हैं, जबकि इससे कुछ भी हासिल नहीं होता। उल्टे, ऐसा करने और कराने वाले दोनों ही पाप के भागी होते हैं।” उन्होंने कहा कि महाअष्टमी पर दी जाने वाली बकरे की बलि भी वास्तविक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है। काला रंग ऋणात्मकता का प्रतीक है और बकरे की आवाज़ ‘मैं-मैं’ अहंकार को दर्शाती है।
“इसका अर्थ यह है कि हमें अपने ईष्ट के चरणों में अपना अहंकार और उससे उपजे विकार अर्पित करने चाहिए -यही सही अर्थ में बलि है,” उन्होंने कहा। रमनजी के अनुसार, हर धार्मिक क्रिया का एक सूक्ष्म और गूढ़ अर्थ होता है, जिसे समझे बिना लोग अंधविश्वास के जाल में फँस जाते हैं। “हमें पशु-पक्षियों की बलि न देकर नारियल, कोहड़ा, नींबू या जायफल अर्पित करना चाहिए -यही सच्ची पूजा है,” उन्होंने अपील की।
समाज की चुप्पी और अंधविश्वास की मजबूती
यह प्रश्न बार-बार उठता है कि जब कानून भी मना करता है और धर्म भी विरोध करता है, तब यह प्रथा क्यों जारी है।
इसका उत्तर समाज की गहराई में छिपा है।
- पहला कारण है — अंधविश्वास की परंपरा।
- दूसरा कारण है — अवैध व्यापार नेटवर्क।
- तीसरा कारण है — प्रवर्तन की सीमाएँ।
अंधविश्वास का जाल इतना गहरा है कि लोग मानते हैं कि उल्लू बलि देने से अचानक धन आ जाएगा या व्यापार में वृद्धि होगी। तस्कर इस अंधविश्वास को भुनाते हैं। दीपावली के पहले उल्लुओं की मांग बढ़ती है। वे जंगलों और खेतों से इन्हें पकड़कर तांत्रिकों को बेचते हैं। यह पूरा कारोबार रात के अंधेरे में चलता है। पुलिस या वन विभाग तक इसकी खबर पहुँचती भी है, तो तब तक देर हो चुकी होती है।
बलि की परंपरा – केवल उल्लू तक सीमित नहीं
भारत में बलि की परंपरा बहुत पुरानी है। वैदिक युग से लेकर मध्यकाल तक यज्ञों में बलिदान की प्रथा रही। समय के साथ यह पशु बलि के रूप में बदल गई। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और बिहार के कई मंदिरों में आज भी देवी पूजा के दौरान बकरियों या भैंसों की बलि दी जाती है। नेपाल का “गधिमाई महोत्सव” तो दुनिया का सबसे बड़ा पशु बलिदान माना जाता था, जिसमें लाखों जानवरों की बलि दी जाती थी।
हालाँकि पिछले एक दशक में समाज में जागरूकता बढ़ी है। कई मंदिरों ने पशु बलि बंद कर दी है। कद्दू, नारियल और नींबू जैसी वस्तुओं को प्रतीकात्मक बलि के रूप में चढ़ाया जाने लगा है। लेकिन उल्लू बलि अब भी तंत्र साधना की आड़ में जारी है।
समाज में विरोध और अभियान
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ने इस विषय को व्यापक बनाया है। “#SaveTheOwl” और “#StopUlluBali” जैसे हैशटैग पर हजारों लोग आवाज़ उठा चुके हैं। Wildlife SOS, TRAFFIC और WWF जैसी संस्थाएँ हर साल दीपावली के पहले जागरूकता अभियान चलाती हैं। कई धार्मिक विद्वान भी आगे आकर कहते हैं कि उल्लू बलि शास्त्रसम्मत नहीं है। अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज और कोलकाता के मंदिरों में अब “उल्लू संरक्षण अभियान” शुरू हुए हैं। पंडित श्रद्धालुओं से कहते हैं कि “लक्ष्मी की पूजा में उल्लू को दीप दिखाओ, न कि छुरी।”
अदालतों और सरकार की भूमिका
भारत के कई राज्यों में वन विभाग ने इस पर रोक लगाने के लिए विशेष टीम बनाई है। अदालतों ने भी कई बार टिप्पणी की है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि आप संरक्षित जीवों की हत्या करें। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था -“बलिदान का अर्थ त्याग है, न कि हत्या। उल्लू या किसी भी जीव की बलि धर्म नहीं, अपराध है।”केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी राज्यों को निर्देश जारी किए हैं कि दीपावली से पहले निगरानी बढ़ाई जाए।
शिक्षा और जागरूकता ही असली समाधान
कानून बनाए जा सकते हैं, पर मानसिकता बदलना ज़रूरी है। बच्चों और युवाओं को यह सिखाना होगा कि उल्लू कोई “अपशकुन” नहीं, बल्कि प्रकृति का रक्षक है। स्कूलों और कॉलेजों में वन्यजीव संरक्षण पर विशेष सत्र आयोजित किए जाने चाहिए। मीडिया को भी इस विषय को हर वर्ष दीपावली के दौरान प्रमुखता से उठाना चाहिए।
दीपावली केवल दीयों और रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के प्रकाश का भी प्रतीक है। अगर उसी दिन निर्दोष पक्षियों की हत्या की जाए, तो यह त्योहार अपनी आत्मा खो देता है। धन, समृद्धि और सफलता केवल पूजा से नहीं, बल्कि करुणा और सदाचार से आती है।
माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद तभी मिलेगा जब उनके वाहन की रक्षा की जाएगी, न कि उसकी बलि दी जाएगी। यह समय है जब समाज, धर्म, प्रशासन और मीडिया – सभी एकजुट होकर इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाएँ। दीपावली की असली ज्योति वही है, जो न केवल हमारे घरों को बल्कि हमारे दिलों को भी प्रकाशित करे।
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