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“जहां हर चोट के बाद तय होती है वापसी-खिलाड़ियों के विश्वास और चिकित्सा के संकल्प की कहानी”

गंगा के तट पर बसे वाराणसी में अब चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई पहचान बन रही है। शहर के प्रसिद्ध आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. आशुतोष अग्रवाल ने स्पोर्ट्स इंजरी के उपचार को नई दिशा दी है। आयुष्मान हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर में संचालित स्पोर्ट्स इंजरी एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर ने खिलाड़ियों को बड़े शहरों की दौड़ से मुक्त किया है। आर्थ्रोस्कोपी, घुटना रिप्लेसमेंट और आधुनिक रिहैब तकनीकों के माध्यम से वे न सिर्फ शरीर का इलाज करते हैं, बल्कि खिलाड़ियों का आत्मविश्वास भी लौटाते हैं। आज वे वाराणसी के खेल-जगत के लिए आशा और भरोसे का नाम बन चुके हैं।

  • स्पोर्ट्स इंजरी से लेकर घुटना रिप्लेसमेंट तक, वाराणसी के खिलाड़ियों के लिए उम्मीद बने डॉ. आशुतोष अग्रवाल

गंगा के तट पर बसा वाराणसी – जहां आरती की लौ कभी बुझती नहीं, जहां साधना और सेवा साथ-साथ बहती है – वहीं अब एक नई कहानी लिखी जा रही है। यह कहानी किसी मंदिर, साधु या तीर्थ की नहीं, यह कहानी है एक ऐसे चिकित्सक की, जिसने घायल शरीरों के साथ टूटे सपनों को भी जोड़ा है। वह नाम है – डॉ. आशुतोष अग्रवाल ,शहर के प्रसिद्ध आर्थोपेडिक सर्जन, जिन्होंने वाराणसी के खेल-जगत में चिकित्सा की एक नई क्रांति शुरू की है। यह कहानी सिर्फ इलाज की नहीं, विश्वास की है। जहां हर खिलाड़ी जानता है – मैदान पर चाहे जितना बड़ा झटका लगे, अगर डॉक्टर आशुतोष अग्रवाल हैं, तो “वापसी” सिर्फ संभव नहीं, निश्चित है।

जब वाराणसी में नहीं थी ऐसी सुविधा

कुछ वर्षों पहले तक बनारस में खेल-चोटों (Sports Injuries) का कोई समर्पित केंद्र नहीं था। खिलाड़ी चाहे क्रिकेटर हो, फुटबॉलर या एथलीट – अगर घुटना फट गया या लिगामेंट टूट गया, तो उसे दिल्ली या लखनऊ की राह पकड़नी पड़ती थी। इलाज से ज़्यादा थकान सफ़र की होती थी – और मन में सवाल, “क्या मैं दोबारा खेल पाऊँगा?” तभी शहर के एक युवा आर्थोपेडिक सर्जन ने ठान लिया – “जब खिलाड़ी बनारस का है, तो इलाज भी बनारस में ही होगा।” यही सोच थी जिसने जन्म दिया – स्पोर्ट्स इंजरी एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर , जो आज आयुष्मान हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर (अलईपुर और महमूरगंज) में संचालित है।

एक डॉक्टर का समर्पण – “खिलाड़ी को मैदान में लौटाना ही मिशन है”

“जब कोई खिलाड़ी मेरे पास आता है, तो मैं सिर्फ एक्स-रे नहीं देखता, मैं उसके चेहरे पर टूटा हुआ आत्मविश्वास देखता हूँ।”- कहते हैं डॉ. आशुतोष अग्रवाल , जो आज शहर के सबसे विश्वसनीय नामों में शुमार हैं। वह हर मरीज से एक ही बात कहते हैं – “तुम्हारा ठीक होना अब हमारी जिम्मेदारी है।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उनके जीवन का दर्शन है।

स्पोर्ट्स इंजरी – दर्द नहीं, जिम्मेदारी

डॉ. अग्रवाल के अनुसार, खेल के दौरान लगने वाली चोटें कई प्रकार की होती हैं –

मोच (Sprain): जब दो हड्डियों को जोड़ने वाला ऊतक (Ligament) अधिक खिंच जाए या फट जाए।

खिंचाव (Strain): जब मांसपेशियाँ या टेंडन अत्यधिक दबाव में आ जाएँ।

घुटने की चोट (Knee Injury): खिलाड़ियों में सबसे सामान्य और करियर-नाशक मानी जाती है।

अकिलिस टेंडन का फटना (Achilles Tendon Rupture): एड़ी के पीछे स्थित रेशे का फटना, जिससे चलना तक कठिन हो जाता है।

हड्डी का खिसकना (Dislocation): जोड़ से हड्डी का बाहर निकल जाना, जो असहनीय दर्द पैदा करता है।

रोटेटर कफ की चोट (Rotator Cuff Tear): कंधे को घुमाने वाली चार मांसपेशियों में से किसी एक के फटने से गतिशीलता प्रभावित होती है।

इन चोटों का उपचार केवल तकनीकी नहीं होता – इसमें मनोवैज्ञानिक पुनर्वास (Rehabilitation) भी उतना ही जरूरी है। डॉक्टर कहते हैं – “हम शरीर का इलाज करते हैं, लेकिन असली जीत मन के डर को हराने में होती है।”

उपचार की आधुनिक पद्धतियाँ

आयुष्मान हॉस्पिटल में खिलाड़ियों का इलाज दो प्रमुख तकनीकों से किया जाता है:

1. आर्थ्रोस्कोपी (Arthroscopy)

एक आधुनिक तकनीक जिसमें बहुत छोटे चीरे से एंडोस्कोप की मदद से जोड़ के अंदर देखा और ठीक किया जाता है। इससे मरीज जल्दी ठीक होता है और निशान लगभग न के बराबर रहते हैं।

2. जॉइंट रिप्लेसमेंट (Joint Replacement)

जब जोड़ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो उसे धातु, प्लास्टिक या सिरेमिक के कृत्रिम अंग (Prosthesis) से बदला जाता है। यह जोड़ सामान्य जोड़ की तरह काम करता है – लचीलापन और मजबूती दोनों प्रदान करता है। डॉ. अग्रवाल बताते हैं – “हम केवल आयातित (Imported) इम्प्लांट्स का उपयोग करते हैं, और मेट्रो शहरों की तुलना में एक-चौथाई लागत पर विश्वस्तरीय सुविधा देते हैं।”

घुटना रिप्लेसमेंट में महारत – बनारस का नाम देशभर में

वाराणसी के लोग आज गर्व से कहते हैं कि “घुटना बदलवाना है तो डॉ. अग्रवाल के पास जाओ।”वे देश के उन चुनिंदा डॉक्टरों में हैं जिन्हें टोटल नी रिप्लेसमेंट (Total Knee Replacement) सर्जरी में महारत हासिल है। उनकी सूक्ष्म सर्जिकल तकनीक और दर्द रहित रिकवरी के अनुभव ने सैकड़ों मरीजों को फिर से चलने, दौड़ने और नाचने तक का आत्मविश्वास दिया है।

दिल्ली से बनारस – एक मिशन की यात्रा

डॉ. आशुतोष अग्रवाल ने दिल्ली में आठ वर्षों तक देश के शीर्ष आर्थोपेडिक सर्जनों के साथ कार्य किया। लेकिन उनका मन हमेशा बनारस की ओर खिंचता रहा। 2006 में उन्होंने ठान लिया – “अब सेवा वहीं करनी है, जहां जरूरत सबसे ज्यादा है।” और उसी वर्ष उन्होंने आयुष्मान हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर की स्थापना की।

उनकी पत्नी डॉ. अनु अग्रवाल, जो वंश फर्टिलिटी एंड टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर की निदेशक हैं, ने भी हजारों दंपतियों को संतान-सुख देकर एक नया जीवन दिया है। दोनों पति-पत्नी वाराणसी की चिकित्सा जगत की मिसाल हैं – एक “नई पीढ़ी के इलाज” की और दूसरा “नई पीढ़ी के जीवन” की सेवा में।

खिलाड़ियों का भरोसा, डॉक्टर का वादा

आज वाराणसी और आसपास के जिलों के खिलाड़ी डॉ. अग्रवाल को “स्पोर्ट्स इंजरी का मसीहा” कहते हैं। एक युवा क्रिकेटर ने बताया – “घुटने में लिगामेंट फट गया था, करियर खत्म समझा। डॉक्टर साहब ने कहा – ‘छह महीने बाद फिर मैदान में रहोगे।’ सच में, मैं अब पहले से बेहतर खेल रहा हूं।”

सिर्फ डॉक्टर नहीं, समाजसेवी भी

डॉ. अग्रवाल रोटरी क्लब ऑफ वाराणसी ब्राइट के गवर्नर भी हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। हर वर्ष गरीब खिलाड़ियों के लिए मुफ्त मेडिकल चेकअप कैंप आयोजित करते हैं।उनका मानना है – “खिलाड़ी देश का गौरव हैं, उनका स्वास्थ्य हमारी जिम्मेदारी है।”

विरासत में मिली सेवा की भावना

डॉ. अग्रवाल के पिता स्वर्गीय डॉ. नन्दलाल गुप्ता स्वयं नगर के प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। उन्होंने अपने बेटे को सिखाया था – “डॉक्टर का हाथ केवल इलाज नहीं करता, वह किसी के जीवन की दिशा बदलता है।” यही शिक्षा आज डॉ. आशुतोष अग्रवाल की हर सर्जरी में झलकती है।

वाराणसी का भविष्य – खेल और चिकित्सा का संगम

शहर में बन रहे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के साथ अब खेल गतिविधियों में तेजी आ रही है। ऐसे में यह स्पोर्ट्स इंजरी एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर शहर के लिए एक वरदान साबित होगा। भविष्य में डॉ. अग्रवाल एक पूर्ण समर्पित “स्पोर्ट्स रिहैब सेंटर” की स्थापना की योजना बना रहे हैं, जहां चोटिल खिलाड़ियों को न केवल इलाज बल्कि मानसिक व शारीरिक पुनर्वास का पूरा प्रशिक्षण भी मिलेगा।

एक डॉक्टर, जो सिर्फ इलाज नहीं करता, उम्मीद देता है

वाराणसी के लोग कहते हैं – “अगर दर्द है तो दवा है, और अगर डॉक्टर आशुतोष हैं, तो राहत तय है।” वे सिर्फ सर्जन नहीं, एक संवेदनशील इंसान हैं जो मानते हैं – “खिलाड़ी जब गिरता है, उसे उठाना ही मेरा धर्म है।” आज बनारस के खिलाड़ी बड़े शहरों के अस्पतालों की ओर नहीं भागते। वे जानते हैं – अपने शहर में एक ऐसा डॉक्टर है, जो उनके सपनों की रक्षा करता है।

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