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दिल्ली में आज वे भी डरे हुए हैं, जिन्होंने दंगा भड़काने में परोक्ष सहयोग किया

अभिरंजन कुमार 

दिल्ली में आज वे हिन्दू-मुसलमान भी डरे हुए हैं, जो पिछले ढाई महीनों से CAA-NRC-NPR के खिलाफ अफवाहें फैलाकर दो समुदायों को आमने-सामने खड़ा करके दंगा भड़काने में जुटे थे।

दिल्ली में आज वे हिन्दू-मुसलमान भी अपनी जान बचाने के लिए पुलिस की ओर ही कातर दृष्टि से देख रहे हैं, जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दंगाई गुंडों पर लाठीचार्ज के बाद पुलिस के खिलाफ ज़हर उगल रहे थे और लोगों की साम्प्रदायिक भावनाएं भड़का रहे थे।

दिल्ली में आज वे हिन्दू-मुसलमान भी डरे हुए हैं, जिन्हें जामिया, एएमयू, आईआईटी कानपुर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद से की गई देशविरोधी और हिंदू विरोधी बातों में तो मज़ा आ रहा था, लेकिन आलोचना के शब्द केवल कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के बयानों पर फूटते थे।

दिल्ली में आज वह हर हिन्दू-मुसलमान भी डरा हुआ है, जिसने परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से इन दंगों की बुनियाद रखी है। जानते हैं क्यों? क्योंकि उन्हें लगता था कि वे दूसरों के घर और ज़िंदगियां जलाकर जाती हुई सर्दी का मज़ा उठा लेंगे, लेकिन यह आग उनके घरों, उनकी जिंदगियों तक नहीं पहुंच पाएगी।

जिन दंगों को धूर्तता के साथ अब भी मुस्लिम-विरोधी दंगा बताकर मुसलमान भाइयों-बहनों को और भी कुछ करने के लिए भड़काया जा रहा है, उन दंगों की सच्चाई यह है कि इनमें नुकसान का शिकार हुई लगभग 90% संपत्तियां हिंदुओं की हैं, और अगर एक दिन बाद ही सही, विभिन्न सुरक्षा बलों ने मोर्चा नहीं संभाला होता, तो सैंकड़ों हिन्दू मार दिए गए होते, क्योंकि हफ्तों की तैयारी के बाद ही ये दंगे भड़काए गये थे।

इसका मतलब यह तो बिल्कुल भी नहीं है कि इन दंगों में मुसलमान भाई-बहन नहीं मारे गए हैं या कम मारे गए हैं। माली नुकसान तुलनात्मक रूप से भले ही उन्हें कम हुआ हो, पर जानी नुकसान तो उन्हें भी भयानक हुआ है, क्योंकि भारत में हिंदू-मुस्लिम दंगे सिख-विरोधी दंगों की तरह पूर्णरूपेण एकतरफा तो हो नहीं सकते। लेकिन मुसलमान भाइयों-बहनों को हुए इस नुक़सान की अधिक ज़िम्मेदारी उन रेडिकल इस्लामिक एलिमेंट्स की है, जिन्हें धर्म के नाम पर वे अपने बीच पनपने, पलने और बढ़ने दे रहे हैं। साथ ही, उन सूडो सेक्युलर लोगों की भी है, जिन्हें उन्होंने अपना आका मान रखा है और जिनके बहकावे में वे ढाई महीने से युद्ध की मुद्रा में खड़े हैं। वे अपने आप से ईमानदारी से क्यों नहीं पूछते कि वे किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं- अपनी और अपने बच्चों की या फिर कुछ सत्तालोलुप लोगों के स्वार्थ की?

दुर्भाग्य यह, कि इतना सब हो जाने के बाद भी, जहां मुसलमान भाइयों-बहनों को भड़काने की जुगत में जुटे लोग इसे मुस्लिम-विरोधी दंगा बताने में जुटे हैं, वहीं मौका ताड़कर दूसरे पक्ष ने भी इसे हिन्दू-विरोधी दंगा बताना शुरू कर दिया है, जबकि हकीकत यह है कि यह पूरी तरह से एक देश-विरोधी दंगा था, जो कि ट्रम्प दौरे की इसकी टाइमिंग से भी स्पष्ट है, और इसे रेडिकल इस्लामिक तत्वों के द्वारा सूडो सेक्युलर पॉलिटिक्स करने वालों के साथ मिलकर रचा गया था।

अगर आज इस कड़वे सच को आम हिन्दू और मुसलमान नहीं समझ सके, और इस सीधी-सपाट सच्चाई में भी पॉलिटिक्स ढूंढने का प्रयास करते रहे, तो अभी और भी कई दंगों में मरने और उसकी दहशत झेलने के लिए तैयार रहिए। यह आंच हमारे, आपके, किसी के भी घर पहुंच सकती है। इसलिए दंगाइयों और आतंकवादियों को अपनी कम्युनिटी का समझकर इसे दिल पर लेकर उसका बचाव और समर्थन करना बंद कीजिए।

मैं ऐसे अनेक मुसलमान देख रहा हूँ जो जानना चाह रहे हैं कि मुसलमान तो अधिक नहीं मरे? और ऐसे अनेक हिन्दू भी देख रहा हूँ, जो जानना चाहते हैं कि हिंदू तो अधिक नहीं मरे? मतलब कि अगर दूसरे समुदाय के लोग ज़्यादा मरे होंगे, तो ये सभी लोग भीतर ही भीतर पुलकित होंगे और राहत की सांस लेंगे। ऐसे तमाम लोग बेहद घिनौने और मानवता के दुश्मन हैं, जो इतने सारे लोगों के मारे जाने के बाद भी लाशों के ढेर में अपने (अ)धर्म की विजय ढूंढना चाह रहे हैं। लानत है इन नरपिशाचों पर! वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वाल से

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