इस साल भी बाढ़ से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम,पिछले साल औसत से दो गुना बारिश के बाद भी नहीं आई बाढ़
बंधों के अनुरक्षण में समय, मानक और पारदर्शिता पर रहा पूरा जोर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के तराई के पूरे इलाके, खासकर पूर्वांचल में बाढ़ डर का दूसरा नाम रहा है। हर साल बारिश ( 15 जून से 15 अक्टूबर) के मौसम में नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाली गंडक, रोहिन, राप्ती, शारदा, सरयू/घाघरा आदि नदियां सामान्य बारिश होने पर भी खतरे के निशान को पार करती हैं। जिसकी वजह से जन-धन की भारी हानि होती है।
इस दौरान लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर परिवार और मवेशियों के साथ बंधो या अन्य सुरक्षित जगहों पर ठिकाना बनाते हैं। सरकार या स्वयंसेवी संस्थाओं से मिली राहत के भरोसे बाढ़ उतरने की प्रतीक्षा करते हैं। मानसून के पिछले सीजन में ऐसा पहली बार हुआ जब पूर्वांचल के अधिकांश जिलों में औसत से दो से तीन गुना अधिक बारिश के बावजूद बाढ़ नहीं आई। अब तो लोगों में इसका डर भी नहीं रहा।

यह सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समयपूर्व बाढ़ सुरक्षा के बेहतर प्रबंधन से हो सका है। इस साल भी मानसून का सीजन शुरू हो चुका है। मौसम विभाग झमाझम बारिश का पूर्वानुमान जता चुका है। इसी अनुसार इस साल भी योगी सरकार ने बाढ़ से सुरक्षा के मुकम्मल इंतजाम किए हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 75 जिलो में से 45 बाढ़ के लिहाज संवेदनशील हैं। इसमें से 24 अति संवेदनशील, 16 संवेदनशील और पांच सामान्य हैं। संबंधित जिलों में मानसून के सीजन (15 जून) के पहले बंधो की मरम्मत की जा चुकी है। संवेदनशील स्थानों पर बाढ़ आने पर जिन सामानों यथा बालू की बोरियां, बम्बू कैरेट की जरूरत होती है, उनका पर्याप्त मात्रा में स्टॉक है।
इन जगहों पर सीजन भर 24×7 घंटे बाढ़ नियंत्रण कक्ष, बाढ़ की चेतावनी के लिए बेतार केंद्र और इनकी निगरानी के लिए शासन स्तर पर लखनऊ में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है। संवेदनशील जगहों की प्रभावी निगरानी के लिए गार्ड लगाये गये हैं। रात में निगरानी के लिए जेनरेटर और पेट्रोमेक्स की व्यवस्था की गई है। विभागीय और जिले के प्रभारी मंत्री और अधिकारी अनुरक्षण से लेकर बारिश के सीजन में संवेदनशील जगहों की निगरानी करते रहे। जहां जरूरत थी वहां अधिकारियों ने कैम्प भी किया।
कुछ जगहों पर नदियों की ड्रेजिंग भी की गई, प्रभावी अनुश्रवण के लिए मुख्यालय पर सीसीटीवी कैमरे भी लगाये गये। अनुरक्षण के कार्यो में हमेशा की तरह सीएम का मानक, समय और पारदर्शिता को लेकर साफ संदेश था कि इनसे कोई समझौता नहीं। कार्यो के लिए समय से धन उपलब्ध कराने की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यूं तो बाढ़ के प्रभावी नियंत्रण की कार्ययोजना 2017 में उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही शुरू हो गई थी, पर कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान भी उनके निर्देश में बाढ़ के रोकथाम के लिए अनुरक्षण के काम लगातार जारी रहे। आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं।
कार्य के साथ बजट में कई गुना वृद्धि की योगी सरकार ने
सपा सरकार ने 2014 से 2017 तक के तीन साल के कार्यकाल के दौरान बाढ़ संबंधित कुल 265 परियोजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य रखा, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 2019/20 से 2021/22 तक इस लक्ष्य को बढ़ाकर 536 कर दिया। इसी तरह बजट व्यवस्था में भी वृद्धि की गई। 2014 से 2017 के दौरान सपा सरकार ने बजट में इस काम के लिए ₹ 382 करोड़ की व्यवस्था की।
मौजूदा सरकार के 2019/20 से 2021/22 के कार्यकाल में इसे बढ़ाकर ₹ 1058.56 करोड़ कर दिया गया। इन सबका नतीजा सामने है। 2013 में प्रदेश का कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र 2336992 हेक्टेयर रहा। प्रभावित कुल कृषि योग्य भूमि 1541373 हेक्टेयर रही। 2020 में कुल प्रभावित रकबा और कृषि भूमि रही क्रमशः 146953 और 6886 हेक्टेयर। इसमें भी कृषि भूमि सीधे बाढ़ से नहीं कटान से प्रभावित रही।
काम आया पूर्वांचल का अनुभव
मालूम हो कि मुख्यमंत्री पूर्वांचल के गोरखपुर के रहने वाले हैं। बाढ़ यहां के लिए आम है। 1998 में बतौर सांसद उन्होंने सदी की सबसे भयंकर बाढ़ को देखा था। ऐसी बाढ़ जिसे उस समय दौरे पर आए तबके प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी ने जलप्रलय की संज्ञा दी थी।
गोरखपुर में बतौर सांसद योगी ने हर साल की बाढ़ को देखते हुए बाढ़ की वजहों और नेपाल से निकलने वाली नदियों की प्रवृत्ति और बाढ़ नियंत्रण के उपायों को ठीक से जान लिया था। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने बाढ़ से होने वाली व्यापक जन-धन की हानि के मद्देनजर इसके नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा। उनके अनुभव से बनी कार्ययोजना जनता को बाढ़ की विभीषिका से राहत दे रही है।



