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इसे कहते हैं “दिन दूना रात चौगुना” की तरक्की

  • 2018 में 2.5 लाख रुपए से शुरू गारमेंट का काम 60 लाख तक पहुचा
  • दो साल वैश्विक महामारी कोरोना के ब्रेक के बावजूद यह उपलब्धि खुद में खास
  • इसका श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा तैयार इकोसिस्टम को: अखिलेश

वैश्विक महामारी कोरोना में तमाम जमे जमाए लोगों के पांव उखाड़ दिये। नये कारोबारियों की इसमें क्या बिसात? पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक युवा का उदाहरण इसके ठीक उलट है। पूर्वांचल के सबसे बड़े पर्व मकरसंक्रांति के पावन पर्व पर गुरु गोरक्षनाथ का आर्शीवाद लेकर मात्र 2.5 लाख रुपये की पूंजी से उन्होंने रेडीमेड गारमेंट्स की एक छोटी सी इकाई डाल दी। आज उनका कारोबार करीब 60 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। बेहद कठिन चैलेंजेज के उस दौर के मद्देजर खुद के कारोबार का संभालना और बाद में उसे बढ़ाना,” दूना रात चौगुना” मुहावरे का जीवंत प्रमाण है।

इसे कहते हैं "दिन दूना रात चौगुना" की तरक्की
इसे कहते हैं “दिन दूना रात चौगुना” की तरक्की

2018 में 2.5 लाख रुपए से शुरू गारमेंट का काम आज करीब 60 लाख रुपये तक पहुच गया है। दो साल के वैश्विक महामारी कोरोना के ब्रेक के बावजूद अखिलेश की यह उपलब्धि खुद में खास है। वह इसका श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कारोबार खासकर हम जैसे छोटे कारोबारियों के लिए तैयार इकोसिस्टम को है।

बकौल अखिलेश। हमारे जैसे नये कारोबारी के लिए कोरोना का वह दो साल का कार्यकाल किसी दुःस्वप्न जैसा था। लॉकडाउन के कारण पूरी आपूर्ति चेन ठप थी। प्रोडक्शन लगभग शून्य पर आ गया। पर घर वालों के सपोर्ट और उनके अनुभव से संभल गया।काम आया घर के बड़े लोगों का अनुभव

उल्लेखनीय है कि अखिल मूलरूप से संतकबीरनगर जिले के किठिउरी (हैसर बाजार) के रहने वाले हैं। संतकबीरनगर किसी जमाने में अपने हैंडलूम उत्पादों के लिए जाना जाता था। उनके बाबा स्वर्गीय झिनकू दुबे कोलकाता की एक नामचीन कंपनी में डिजाइन सेक्शन में काम कर चुके थे। चाचा शत्रुध्न दुबे दिल्ली के एक्सपोर्ट हाउस में प्रोडक्शन के हेड हैं।

कभी सिविल सर्विसेज की कर रहे थे तैयारी

ग्रेजुएशन के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी के अखिल भी 2014 में दिल्ली चले गये। चाचा के यहां आना-जाना होता रहता था। बातचीत के दौरान उनको गारमेंट इंडस्ट्री की कुछ समझ हो गई। सिविल सेवा में सफलता नहीं मिली। लौटकर गोरखपुर आये तो सूरजकुंड में गारमेंट की एक यूनिट डाल दी। 2017 में सरकार बदल चुकी थी। अपने ही शहर के योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन चुके थे। यहां का होने के नाते मैं सांसद के रूप में टेक्सटाईल पार्क, फूडपार्क, बंद खाद कारखाने को फिर से चलाने के लिए उनके संघर्षो और प्रतिबद्धताओं से वाकिफ था। लिहाजा उद्योग जगत के बेहतरी की उम्मीद थी। उम्मीद के अनुसार कारोबार के लिए इकोसिस्टम भी बदलने लगा था।

ओडीओपी और गारमेंट पार्क की घोषणा से बढ़ा हौसला

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर टेरोकोटा के बाद रेडीमेड गारमेंट का गोरखपुर का दूसरा उत्पाद, फ्लैटेड फैक्ट्री और गारमेंट्स परके की घोषणा ने हौसला बढ़ाने का काम किया। खासकर गारमेंट्स पार्क यहां के लिए बड़ी उपलब्धि है। सो कोरोना के बाद भी उम्मीद के मुताबिक संभल गये।

ऑनलाइन बाजार के जरिए पूरे देश मे उपस्थिति

युवा होने के नाते वह तकनीक में भी दक्ष हैं। इसके नाते ऑनलाइन कारोबार के जरिए पूरा भारत ही उनके उत्पादों का बाजार है। पर सीधी आपूर्ति गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़ मंडल के कई जिलों में है। वाराणसी मंडल के कुछ जिलों के अलावा रक्सौल, बगहा, बेतिया तक भी हमारे उत्पाद जाते हैं। ओडीओपी के तहत अनुदान पर 25 लाख रुपये का लोन मिल चुका है।

मेन्स वियर शर्ट, कुर्ता, सदरी, बॉक्सर, लोवर के उत्पादन पर उनका फोकस है। उत्पाद की जरूरत के अनुसार अहमदाबाद, भिवंडी आदि जगहों से कपड़ा आता है। पैकेजिंग के पैकेट दिल्ली से आते हैं। उनकी इकाई में 30 लोग काम करते हैं। जिनमें से 7 महिलाएं हैं। कारोबार के संबंध में किसीको सुझाव देने को वह तत्तपर हैं।

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