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1857 के बाद की सबसे साहसिक घटना थी चौरी-चौरा

विदेश तक पहुँची थी इसकी गूंज, लीडर में प्रमुखता से छपा था इसका विवरण

लखनऊ : आठ फरवरी 1921 को गाँधीजी के गोरखपुर आगमन से पूरे क्षेत्र में आजादी के आंदोलन को वैचारिक ताकत मिली। ब्रिटिश हुक्मरानों ओर उनके पिट्ठू जमींदारों के जुल्म से डरी हुई आवाम मुखर होने लगी थी। गाँधीजी के आह्वान पर जगह-जगह विदेशी वस्तुओं का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार होने लगा।

इस क्रम में चौरी-चौरा से सटे छोटकी डुमरी में लोगों ने 2 या 3 फरवरी को विदेशी सामानों के साथ मांस-मंदिर छोड़ने का संकल्प लिया। उसी क्रम में 4 फरवरी को स्थानीय लोग चौरी-चौरा कस्बे में असहयोग आंदोलन के समर्थन में जुलूस निकाल रहे थे। वहां स्थानीय पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई। कहा जाता है कि पुलिस ने जुलूस में शामिल लोगों पर गोली चला दी।

इससे तीन लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। इसके बाद प्रदर्शनकारी बेकाबू हो गए। इनका रुख देखकर पुलिस वाले भाग कर थाने में छिप गए, पर लोगों ने बाहर से कुंडी लगाकर थाने में आग लगा दी। इस घटना में 23 पुलिसकर्मी जलकर मर गये।
घटना की प्रतिक्रिया में ब्रिटिश हुकुमत भारी दमनचक्र पर न आमदा हो, इसकी वजह से गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। 

19 को हुई थी फाँसी, 14 को आजीवन ओर 10 को साल का सश्रम कारावास

– चौरी-चौरा काण्ड में 172 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। बतौर वकील पंडित मदन मोहन मालवीय की पैरवी से इनमें से 151 लोग फांसी की सजा से बच गये। बाकी 19 लोगों को 2 से 11 जुलाई 1923 के दौरान फांसी दे दी गई। इस घटना में 14 लोगों को आजीवन और 10 लोगों को 8 साल की सश्रम कारावास की सजा हुई। मालवीयजी ने इनकी सजा की माफी के लिए भी दो बार पत्र लिखा था।

– मालूम हो 1857 के गदर के बाद यह पहला साहसिक कृत्य या जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया। इसकी गूंज पूरे दुनिया में सुनाई दी। ब्रिटेन के साथ अमेरिका, आस्ट्रेलिया, सोवियत संघ, जापान आदि देशों में इसकी खबर छपी।

– इलाहाबाद से निकलने वाले अंग्रेजी अखबार द लीडर ने इस घटना की खबर को बहुत प्रमुखता से छापा था। तब लीडर ने लिखा था कि चौरी-चौरा का विद्रोह अपने में अलग और अद्वितीय था। अब इसकी शताब्दी पर योगी सरकार इसे अद्भुत,अकल्पनीय और अमिट बनाने जा रही है।

जिन्होंने फांसी का फंदा चूमा :

विक्रम, अब्दुल, भगवान, दुधई, कालीचरण, लाल मोहम्मद, लट्टू, महादेव, मेघू, नजर अली, रघुवीर, रामलालन, रांगू, रुदाली, सहदेव, सम्पत पुत्र जीतू, संपत्त पुत्र मोहन, श्याम सुंदर और सीताराम।

(स्त्रोत : श्रवण सामाजिक एवं वेलफेयर सोसाइटी)

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