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जाति जनगणना : अंग्रेजों की साज़िश, नेताओं का खेल और जनता की चुनौती

बिहार चुनाव 2025 में जाति बनाम विकास की बहस तेज। अंग्रेज अफसर रॉबर्ट वैन रसेल की जाति जनगणना से शुरू हुआ यह खेल मंडल-कमंडल और बिहार जाति सर्वे तक पहुँचा। जानें पूरी कहानी।

  • जाति जनगणना से बिहार चुनाव 2025 तक: अंग्रेजों की साज़िश और आज की राजनीति
  • 1औपनिवेशिक दौर की चाल: जब अंग्रेजों ने समाज को बाँटा
  • रॉबर्ट वैन रसेल: रिपोर्ट या औपनिवेशिक हथियार?
  • मंडल बनाम कमंडल: स्वतंत्र भारत में जाति की सियासत
  • बिहार चुनाव 2025: जाति की राजनीति या विकास का एजेंडा?

बिहार विधानसभा चुनाव की आहट तेज है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों में जुट गए हैं। मंचों से रोजगार, विकास और कानून-व्यवस्था की बातें हो रही हैं, लेकिन असली शोर जातिगत समीकरणों का है। इतिहास गवाह है कि जाति-जनगणना से शुरू हुआ यह खेल अंग्रेजों की साज़िश थी, जिसने समाज को टुकड़ों में बाँट दिया। वही जातिगत पहचान आज बिहार की राजनीति का केंद्र है। बिहार सर्वे में 2022-23: OBC+EBC = 63% आबादी है ।

औपनिवेशिक दौर की चाल

1871-72 में पहली बार भारत की जनगणना में जाति का उल्लेख हुआ। 1881 में इसे संगठित रूप मिला और 1901 में अंग्रेज अफसर हर्बर्ट होप राइज़ली के नेतृत्व में 1,646 जातियाँ दर्ज की गईं। 1931 तक यह संख्या बढ़कर 4,147 हो गई। ब्रिटिश प्रशासन का असली मकसद स्पष्ट था – भारतीय समाज को छोटी-छोटी जातियों में बाँटकर शासन आसान करना।

ब्रिटिश अफसर रॉबर्ट वैन रसेल ने जातियों को स्थायी पहचान बनाकर समाज में दरार डाली ,आजादी के बाद उसी विरासत पर खड़ी हुई भारतीय राजनीति ,बिहार चुनाव 2025 में फिर वही सवाल – जाति की सियासत या विकास का रास्ता? .

रसेल और औपनिवेशिक दृष्टि

1901 में मध्य भारत के प्रभारी रहे रॉबर्ट वैनिस्टार्ट रसेल ने The Tribes and Castes of the Central Provinces of India लिखी। इसमें जातियों को पेशा, खानपान, विवाह और धार्मिक प्रथाओं के आधार पर दर्ज किया गया। रसेल ने जाति को “स्थायी” पहचान बना दिया। भारतीय समाज की गतिशीलता को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने जातियों को कठोर ढाँचों में बाँध दिया। उनकी रिपोर्ट प्रशासनिक सुविधा का औजार थी, जिसने समाज में विभाजन गहरा किया। इतिहासकार मानते हैं कि रसेल का काम औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक था – समाज को तोड़ो और राज करो।

स्वतंत्र भारत में मंडल बनाम कमंडल

आज़ादी के बाद भी जाति राजनीति से बाहर नहीं हुई। 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग लागू किया और पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण मिला।

  • बिहार में लालू प्रसाद यादव ने “MY समीकरण” (मुसलमान + यादव) से सत्ता हासिल की।
  • झारखंड में शिबू सोरेन और अब हेमंत सोरेन ने जाति-जनजाति राजनीति से अपनी पकड़ मजबूत की।
  • उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती इसी आधार पर उभरे।

SECC-2011 और बिहार का जाति सर्वे

  • 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) में रिकॉर्ड 46.7 लाख प्रविष्टियाँ दर्ज हुईं। इसमें जातियाँ, उपजातियाँ और उपनाम शामिल थे, लेकिन भारी त्रुटियों के चलते इसे सार्वजनिक नहीं किया गया।
  • बिहार सरकार ने 2022-23 में अपना सर्वे कराया। इसमें 214 समुदाय दर्ज हुए और यह सामने आया कि राज्य की 63% आबादी OBC और EBC वर्ग में आती है। यही आँकड़े अब चुनावी रणनीति का आधार हैं।

बिहार चुनाव 2025: जनता के सामने असली सवाल

आज बिहार की राजनीति दो राहों पर खड़ी है। विपक्ष जाति गणना और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला रहा है। सत्ताधारी दल विकास परियोजनाओं, रोजगार और सुरक्षा पर जोर दे रहा है।

लेकिन जनता के सामने मूल सवाल यही है – क्या वह जाति समीकरणों के चक्रव्यूह में उलझे रहेंगे या विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों पर अपनी राय रखेंगे ?

टाइमलाइन (Fact Timeline)

  • 1871-72: पहली बार जनगणना में जाति का विवरण।
  • 1881: पहली संगठित राष्ट्रीय जनगणना।
  • 1901: 1,646 जातियाँ दर्ज, रसेल और राइज़ली की प्रमुख भूमिका।
  • 1931: 4,147 जातियाँ दर्ज, आखिरी ब्रिटिश जातिगत जनगणना।
  • 2011: SECC में 46.7 लाख प्रविष्टियाँ, लेकिन डेटा सार्वजनिक नहीं।
  • 2022-23: बिहार सरकार का जाति सर्वे, 214 समुदाय दर्ज।

फैक्ट बॉक्स

  • 1901: 1,646 जातियाँ
  • 1931: 4,147 जातियाँ
  • 2011 SECC: 46.7 लाख प्रविष्टियाँ (डुप्लीकेट और उपनाम सहित)

अंग्रेजों ने जाति जनगणना के जरिए समाज को विभाजित किया। रॉबर्ट वैन रसेल जैसे अफसरों ने जाति को कठोर पहचान बनाकर दरार और गहरी की। आजादी के बाद उसी विरासत को नेताओं ने राजनीति का औजार बना लिया। बिहार चुनाव 2025 इस इतिहास की गूंज है। जनता के सामने चुनौती है—क्या वे फिर से जाति की राजनीति में उलझेंगे या विकास और देश की सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे। यही फैसला राज्य और देश के भविष्य की दिशा तय करेगा।

डिस्क्लेमर :इस समाचार/विश्लेषण में प्रस्तुत तथ्य, आँकड़े और ऐतिहासिक संदर्भ विभिन्न उपलब्ध स्रोतों, सरकारी रिपोर्टों और इतिहासकारों के शोध कार्यों पर आधारित हैं। तथ्यों को यथासंभव सटीक और अद्यतन रखने का प्रयास किया गया है। यदि किसी विवरण में त्रुटि या कमी पाई जाती है तो कृपया हमें सूचित करें। आवश्यकतानुसार जाँच कर संशोधन किया जाएगा।

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