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कैलेंडर नहीं, सूर्य तय करता है एकादशी! जानिए सही तिथि, व्रत और पारण का नियम

एकादशी व्रत सनातन धर्म की उस दिव्य परंपरा का प्रतीक है, जहाँ भक्ति के साथ अनुशासन और शास्त्रीय नियमों का पालन अनिवार्य माना गया है। यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह और काल-शुद्धि की साधना है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी का निर्णय सूर्योदय-संयुक्त तिथि से होता है, इसलिए दशमी युक्त एकादशी से परहेज और द्वादशी युक्त एकादशी को श्रेष्ठ माना गया है। व्रत की पूर्णता शुद्ध पारण से होती है, जिसमें हरिवासर का पालन अनिवार्य है। यही मर्यादाएँ एकादशी को साधारण व्रत से उच्च आध्यात्मिक साधना बनाती हैं।

  • गलत दिन एकादशी रखने से क्या फल नष्ट हो जाता है? जानिए दशमी युक्त और हरिवासर का सच

एकादशी व्रत सनातन धर्म की उन परंपराओं में है, जहाँ आस्था केवल भावना नहीं, बल्कि समय, संयम और अनुशासन के साथ जुड़ी हुई साधना बन जाती है। यह व्रत सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह और शास्त्रीय मर्यादा के पालन की परीक्षा है। हर वर्ष जब पंचांग की गणनाओं में तिथि-संयोग जटिल होता है, तब एक बार फिर समाज के सामने यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि एकादशी किस दिन रखी जाए, दशमी युक्त एकादशी से परहेज क्यों किया जाता है, द्वादशी युक्त एकादशी को श्रेष्ठ क्यों माना गया है और पारण में हरिवासर का पालन इतना अनिवार्य क्यों है।

धर्मशास्त्र स्पष्ट करते हैं कि एकादशी व्रत को केवल कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि सूर्य के साथ जुड़ी तिथि से समझा जाता है। सनातन परंपरा में सूर्य को काल का साक्षी माना गया है। इसलिए जिस तिथि का प्रभाव सूर्योदय के समय रहता है, वही तिथि व्रत और धार्मिक कर्म के लिए ग्राह्य मानी जाती है। यही सिद्धांत एकादशी के निर्णय का मूल आधार बनता है।

जब एकादशी तिथि का आरंभ सूर्योदय से पहले हो जाए, लेकिन सूर्योदय के समय दशमी तिथि का अंश शेष रहे, तब उस एकादशी को दशमी युक्त कहा जाता है। शास्त्रों की दृष्टि में यह स्थिति साधारण नहीं मानी गई है। आचार्यों का मत है कि व्रत की शुद्धता सूर्य-संयुक्त तिथि पर आधारित होती है। यदि सूर्योदय में दशमी का प्रभाव बना रहे, तो एकादशी की तिथि-शुद्धि प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में व्रत का पुण्य पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं माना जाता। इसी कारण अनेक ग्रंथों और परंपराओं में दशमी युक्त एकादशी के दिन व्रत न रखने और अगली शुद्ध एकादशी को ग्रहण करने का विधान मिलता है। यह निषेध भय या कठोरता के कारण नहीं, बल्कि व्रत के फल की रक्षा के उद्देश्य से बताया गया है।

इसके विपरीत, जब एकादशी तिथि अगले दिन के सूर्योदय तक बनी रहती है और उसके साथ द्वादशी का अंश जुड़ जाता है, तब वह स्थिति द्वादशी युक्त एकादशी कहलाती है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में इस स्थिति को अत्यंत शुभ और व्रत के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसका कारण यह है कि ऐसी स्थिति में पूरी रात एकादशी में जागरण संभव होता है और प्रातःकाल द्वादशी में शुद्ध पारण किया जा सकता है। व्रत, जागरण और पारण तीनों क्रियाएँ एक सुव्यवस्थित काल-क्रम में संपन्न होती हैं। इसी कारण द्वादशी युक्त एकादशी को मोक्षप्रदा और व्रत की पूर्ण सिद्धि देने वाली कहा गया है।

एकादशी व्रत को लेकर स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में जो अंतर दिखाई देता है, उसे मतभेद नहीं, बल्कि सनातन धर्म की व्यापकता और विविधता के रूप में देखा जाता है। स्मार्त परंपरा में यदि एकादशी सूर्योदय से पहले आरंभ हो जाए और दिनभर रहे, तो उसी दिन व्रत रखा जाता है और पारण अगले दिन द्वादशी में, हरिवासर बीतने के बाद किया जाता है। वहीं वैष्णव परंपरा में उस दिन व्रत रखने पर बल दिया जाता है, जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी विद्यमान हो। दोनों परंपराओं का उद्देश्य एक ही है, व्रत की शुद्धता और फल की सिद्धि।

एकादशी व्रत की पूर्णता पारण से होती है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पारण के बिना व्रत अधूरा रहता है। लेकिन पारण भी मनमाने समय पर नहीं किया जाता। इसके लिए हरिवासर का विशेष महत्व बताया गया है। हरिवासर को एकादशी तिथि का अंतिम और पवित्र चरण माना गया है। यह वह काल है, जब भगवान विष्णु की विशेष उपस्थिति मानी जाती है। शास्त्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हरिवासर के रहते पारण वर्जित है।

आचार्यों के अनुसार, हरिवासर में अन्न ग्रहण करने से व्रत-फल क्षीण हो जाता है। यह केवल नियम-भंग नहीं, बल्कि काल-संयम का उल्लंघन माना जाता है। एकादशी व्रत की आत्मा संयम है और हरिवासर उसी संयम की अंतिम कसौटी है। इसलिए केवल सूर्योदय हो जाना पर्याप्त नहीं माना गया है, बल्कि हरिवासर का बीतना अनिवार्य बताया गया है। सामान्यतः द्वादशी तिथि के प्रारंभ के बाद, अथवा कई पंचांगों के अनुसार द्वादशी के प्रथम चौथाई भाग के समाप्त होने पर हरिवासर समाप्त माना जाता है। इसके बाद किया गया पारण ही शुद्ध और फलदायी माना गया है।

वर्तमान वर्ष में तिथि-संयोग की जटिलता के कारण दशमी युक्त और द्वादशी युक्त दोनों प्रकार की गणनाएँ सामने आ रही हैं। इसी कारण मठों, मंदिरों और धार्मिक संस्थानों द्वारा अलग-अलग तिथियाँ घोषित की गई हैं। धर्माचार्यों का कहना है कि प्रत्येक गृहस्थ और संस्था को अपनी परंपरा और आचार के अनुसार व्रत करना चाहिए, यही शास्त्रसम्मत मार्ग है।

एकादशी व्रत का मूल संदेश यही है कि भक्ति बिना अनुशासन के अधूरी है। दशमी युक्त से सावधानी, द्वादशी युक्त की महिमा और हरिवासर की मर्यादा मिलकर एकादशी को केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मिक साधना बना देती है। सनातन धर्म यही सिखाता है कि समय का सम्मान किया जाए, नियमों का पालन किया जाए और श्रद्धा को अनुशासन से जोड़कर जीवन को आध्यात्मिक दिशा दी जाए। यही एकादशी व्रत का शाश्वत सार है।

हिंदू पंचांग के अनुसार 24 एकादशियों के नाम, धार्मिक महत्व और व्रत परंपरा

सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। वर्ष भर में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं, जो प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष में होती हैं। इन एकादशियों का संबंध भगवान विष्णु की आराधना, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति से है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत रखने से पापों का क्षय होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। अलग-अलग एकादशियों का अपना विशिष्ट नाम और महत्व है, जैसे निर्जला, मोक्षदा, देवशयनी और देवउठनी एकादशी। व्रत की तिथि, पारण और नियम परंपरा व पंचांग के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं। कुछ वर्षों में तिथि-संयोग के कारण अधिक मास या क्षय मास की स्थिति में एकादशियों की संख्या बढ़ सकती है। सभी एकादशी व्रत तिथि-शुद्धि, परंपरा और पंचांग के अनुसार ग्रहण किए जाते हैं। स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में व्रत-तिथि अलग हो सकती है।

चैत्र मास : कामदा एकादशी ,पापमोचनी एकादशी । वैशाख मास : वरूथिनी एकादशी ,मोहिनी एकादशी । ज्येष्ठ मास : अपरा एकादशी , निर्जला एकादशी । आषाढ़ मास : योगिनी एकादशी , शयनी एकादशी (देवशयनी) । श्रावण मास : कामिका एकादशी , पुत्रदा एकादशी (श्रावण) । भाद्रपद मास : अजा एकादशी , पद्मा एकादशी (परिवर्तिनी) । आश्विन मास : इंदिरा एकादशी , पापांकुशा एकादशी । कार्तिक मास : रमा एकादशी , प्रबोधिनी एकादशी (देवउठनी) । मार्गशीर्ष मास : उत्पन्ना एकादशी , मोक्षदा एकादशी । पौष मास : सफला एकादशी , पुत्रदा एकादशी (पौष) । माघ मास : षट्तिला एकादशी , जया एकादशी । फाल्गुन मास : विजया एकादशी , आमलकी एकादशी ।

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का दिव्य महात्म्य

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का महात्म्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, आध्यात्मिक जागरण और जीवन को सात्त्विक दिशा देने की एक सशक्त साधना माना गया है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसी कारण इसे हरि-व्रत कहा गया है और वर्ष भर आने वाली प्रत्येक एकादशी को विशेष पुण्यफलदायी बताया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत मनुष्य को पापों से मुक्त करने, चित्त को शुद्ध करने और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने का अवसर देता है। यह व्रत केवल अन्न-त्याग नहीं, बल्कि विचार, वाणी और कर्म के संयम का संकल्प है। कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर को शुद्ध करने के लिए उपवास आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा को जाग्रत करने के लिए एकादशी का व्रत अनिवार्य साधन है।

पुराणों में वर्णित है कि एकादशी के दिन अन्न का त्याग करने से मन और बुद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इंद्रियाँ संयमित होती हैं और मनुष्य सांसारिक विषयों से हटकर ईश्वर-स्मरण में प्रवृत्त होता है। यही कारण है कि एकादशी को साधना, जप, ध्यान और कीर्तन के लिए सर्वोत्तम तिथि माना गया है। इस दिन किया गया विष्णु-स्मरण साधक को मानसिक शांति और आत्मिक बल प्रदान करता है।

एकादशी व्रत का महात्म्य केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पारिवारिक और सामाजिक शुद्धि से भी जोड़ा गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि एकादशी व्रत से न केवल वर्तमान जीवन के कष्टों का नाश होता है, बल्कि पूर्वजन्म के संस्कार भी शुद्ध होते हैं। इस व्रत को करने वाला व्यक्ति संयम, करुणा और धर्म के मार्ग पर स्थिर होता है।

सनातन परंपरा में एकादशी को मोक्ष का द्वार कहा गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी का व्रत करता है, उसे विष्णु-लोक की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि गृहस्थ से लेकर संन्यासी तक, सभी वर्गों में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत यह सिखाता है कि भक्ति केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अनुशासन और आत्मसंयम से जुड़ी हुई साधना है।

आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में भी एकादशी व्रत का संदेश उतना ही प्रासंगिक है। यह मनुष्य को रुककर आत्मचिंतन करने, इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का महात्म्य इसी कारण कालातीत है, क्योंकि यह शरीर, मन और आत्मा-तीनों के संतुलन का मार्ग दिखाता है।

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डिस्क्लेमर:यह लेख सनातन धर्म के शास्त्रों, परंपरागत मान्यताओं, पंचांग गणनाओं एवं विद्वान आचार्यों के मतों पर आधारित है। एकादशी व्रत की तिथि, विधि और पारण से संबंधित नियम स्मार्त एवं वैष्णव परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने स्थानीय पंचांग, गुरु, आचार्य अथवा परंपरा के अनुसार व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान करें। यह सामग्री धार्मिक जानकारी एवं जनहित के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है, किसी मत या परंपरा का विरोध अभिप्रेत नहीं है।

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