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शरद पूर्णिमा विशेष : सोमवार रात बरसेगा अमृत -जानिए पूजा विधि, कथा, मंत्र और आरती

शरद पूर्णिमा 2025:6 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा - जिसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।हिंदू पंचांग के अनुसार यह रात चंद्रमा की सोलह कलाओं से पूर्ण होती है।मां लक्ष्मी इस दिन पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं, इसलिए इस रात जागरण कर लक्ष्मी पूजा करने की परंपरा है।ब्रजभूमि में यही रात रास लीला के रूप में पूजनीय है।इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, खीर को खुले आसमान में रखकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।कहा जाता है कि इस रात की चांदनी में अमृत बरसता है जो आरोग्य और समृद्धि देता है। जानिए शरद पूर्णिमा की पूजा विधि, व्रत कथा, आरती और महत्व - CMG TIMES के इस विशेष लेख में।

इस वर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व सोमवार, 6 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। पंचांगानुसार पूर्णिमा तिथि 6 अक्टूबर को दोपहर 12:23 बजे से प्रारंभ होकर 7 अक्टूबर सुबह 9:16 बजे तक रहेगी। इसी रात लक्ष्मी-पूजन, चंद्र-दर्शन और रात्रि-जागरण की परंपरा निभाई जाएगी, जिसे देश के कई हिस्सों में कोजागिरी/कोजागरी पूर्णिमा और ब्रज-परंपरा में रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा का पर्व भारत के अलग-अलग भाषिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में भिन्न नामों और रिवाजो के साथ मनाया जाएगा – पर केंद्र में रहेगा रात्रि-जागरण (को-जागृति), लक्ष्मी-पूजन और चंद्र-प्रकाश का उत्सव। ब्रज-अंचल में यही रात “रास पूर्णिमा” बनकर श्रीकृष्ण-राधा की दिव्य लीला का सांस्कृतिक-आध्यात्मिक महोत्सव भी है।“शरद पूर्णिमा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो श्रद्धा, भक्ति और स्वास्थ्य — तीनों का संगम प्रस्तुत करता है। इस रात की चांदनी को शुद्धता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।”

शरद पूर्णिमा कब-कैसे: तिथि, समय और प्रचलन

तिथि: सोमवार, 6 अक्टूबर 2025 (आश्विन शुक्ल पूर्णिमा)।तिथि-आरंभ/समापन (IST):06 अक्तूबर 12:23 बजे -07 अक्तूबर 09:16 बजे।रात्री अनुष्ठान: चंद्र-दर्शन, लक्ष्मी-पूजन, जागरण, और खीर को चांदनी में रखना – अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण। स्थानीय शहर के अनुसार चंद्रोदय में मिनटों का अंतर सम्भव है।

“कोजागिरी/कोजागरी पूर्णिमा” नाम क्यों पड़ा?

“कोजागरी/कोजागिरी” का सरोकार लोक-मान्यता और भाषा-व्युत्पत्ति से है। बंगाल-आसाम-मिथिला क्षेत्र में यह रात ‘कोजागरी पूर्णिमा’ कहलाती है। शब्द ‘कोजागरी’ संस्कृत-स्रोत वाक्य “को जागर्ति?” (अर्थात कौन जाग रहा है?) से जुड़ता है। परंपरा है कि इस रात महालक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण कर जागरण करने वालों को आशीर्वाद देती हैं – इसलिए इस पर्व का एक केन्द्रीय अनुष्ठान रात्रि-जागरण है। शास्त्रीय/लोक-मत में कोजागरी-व्रत (Kojagara Vrata) का उल्लेख मिलता है, जिसमें लक्ष्मी-पूजन रात्रि में चंद्र-प्रकाश के नीचे किया जाता है।

“रास पूर्णिमा” नाम क्यों?

ब्रज-परंपरा में शरद पूर्णिमा को “रास पूर्णिमा” कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि इसी शरद-पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास-लीला की – जिसे भागवत पुराण के दशम स्कंध (प्रसिद्ध “रास-पंचाध्यायी” – अध्याय 29–33) में वर्णित किया गया है। इसीलिए यह पूर्णिमा ब्रज-उत्सवों और रास-नाट्य की आधार-रात मानी जाती है। समय के साथ “रासलीला” उत्तर भारत से लेकर मणिपुर तक शास्त्रीय-लोक-नृत्य-नाट्य का रूप लेकर प्रतिष्ठित हुई; विषयवस्तु का केन्द्र श्रीकृष्ण-राधा और ब्रज-लीलाएँ हैं।

शरद पूर्णिमा: धार्मिक-सांस्कृतिक अर्थ

लक्ष्मी-पूजन व रात्रि-जागरण: कोजागरी परंपरा में घर-आंगन सजाकर, दीप रखकर, लक्ष्मी-नारायण की आराधना होती है। कई जगह खीर/मिश्रित दूध (मसाला दूध) अर्पित किया जाता है।
खीर को चांदनी में रखने की परंपरा: उत्तर-मध्य भारत में खीर को खुले आसमान में रखकर अगली सुबह प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है; लोक-विश्वास है कि इस रात चंद्र-किरणें “अमृत-तुल्य” मानी जाती हैं। (

क्षेत्रीय रूपांतर:

बंगाल/आसाम/त्रिपुरा/मिथिला: “कोजागरी पूर्णिमा”– लक्ष्मी-पूजन, अल्पना/रंगोली, रात्रि-जागरण।
महाराष्ट्र/गुजरात: छत/आंगन में चांदनी के नीचे दूध/खीर का प्रसाद, गरबा/नृत्य के आयोजन।
ओडिशा: “कुमार पूर्णिमा” – अविवाहित युवतियाँ कार्तिकेय (कुमार) की पूजा कर सुयोग्य वर की कामना करती हैं।

शास्त्रीय सन्दर्भ और साहित्य

शरद-पूर्णिमा के प्रसंग पुराण-साहित्य में भी वर्णित हैं; समकालीन संकलनों में ब्राह्म, स्कन्द, ब्रह्मवैवर्त, लिंग पुराण आदि में इस रात्रि का महत्त्व दर्ज माना गया है। “रास-लीला” के मूल आख्यान का शास्त्रीय स्रोत भागवत पुराण (स्कंध 10) है, जिसने भारतीय नृत्य-नाट्य परंपराओं (कथक, ओडिशी, मणिपुरी आदि) को भी व्यापक प्रेरणा दी।

स्वास्थ्य-लोकमान्यताएँ

रात्रि-जागरण, ध्यान/कीर्तन और चंद्र-प्रकाश में समय बिताने की परंपरा इस रात विशेष रूप से निभाई जाती है। लोक-मान्यताओं के अनुसार शरद-रात्रि की शीतल चांदनी मन-शरीर को शांति देती है; खीर/दूध को खुले में रखने की परंपरा भी यहीं से जुड़ती है (इसे लोक-आयुर्वेदिक विश्वास के रूप में देखा जाता है; चिकित्सकीय सलाह के लिए विशेषज्ञ-मत आवश्यक है)।

“कोजागरी/रास/कौमुदी/नवान्न”: एक ही रात, कई नाम

कोजागरी/कोजागिरी/कोजाग्रत – “को जागर्ति?” से; लक्ष्मी-पूजन और जागरण-पर्व।
रास पूर्णिमा – ब्रज-परंपरा में रास-लीला की स्मृति; धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सवों का केन्द्र।
कौमुदी/कौमुदोत्सव – चंद्र-किरण/चंद्र-प्रकाश (कौमुदी) पर बल।
नवान्न पूर्णिमा – पूर्वी भारत में नई फसल/अन्न (नवान्न) का आयाम।
कुमार पूर्णिमा – ओडिशा में कुमार-पूजा का रूप।

शरद पूर्णिमा की कथा

एक बार भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा: “हे देवी! पृथ्वी पर कई लोग आलस्य में पड़े रहते हैं। जो परिश्रम नहीं करते, वे धन की कमी से दुखी रहते हैं। अतः तुम पृथ्वी पर जाओ और देखो कौन जाग रहा है, कौन सत्कर्म कर रहा है।”

मां लक्ष्मी उस रात पृथ्वी पर उतरीं। उन्होंने प्रत्येक घर के द्वार पर जाकर पुकारा – “को जागर्ति? यानी कौन जाग रहा है?”जो भी व्यक्ति उस रात जागरण कर रहा था, भक्ति में लीन था, उनके घर मां लक्ष्मी ने प्रवेश किया और उन्हें धन, सुख, समृद्धि का वरदान दिया।जबकि जो लोग सो गए थे, उनके घर मां लक्ष्मी नहीं गईं।तभी से यह परंपरा बनी कि शरद पूर्णिमा की रात को जागरण कर लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए।इसी कारण इस पर्व को “कोजागरी पूर्णिमा” कहा जाता है, अर्थात – जो जागता है, वही भाग्यशाली होता है।

दूसरी ओर, ब्रजभूमि में यह दिन रास पूर्णिमा कहलाया क्योंकि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था। यह रास केवल प्रेम का नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना गया।तब से शरद पूर्णिमा न केवल लक्ष्मी-पूजन का पर्व है, बल्कि भक्ति, संगीत, प्रेम और अध्यात्म का उत्सव भी है।

शरद पूर्णिमा 2025 – पूजन सामग्री सूची (लक्ष्मी पूजन + चंद्र अर्घ्य + खीर प्रसाद हेतु)

सामान्य पूजा सामग्री

| क्रम | सामग्री | प्रयोग/उपयोग |
| —- | ——————————————– | ———————————– |
| 1 | स्वच्छ आसन / पूजन चौकी | मूर्ति या चित्र स्थापित करने के लिए |
| 2 | लाल या पीला वस्त्र / आसन | लक्ष्मी-नारायण स्थापना हेतु |
| 3 | लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति / चित्र | पूजन का मुख्य केंद्र |
| 4 | घी या तेल का दीपक | आरती और पूजन के समय जलाने हेतु |
| 5 | रुई की बत्ती | दीपक में प्रयोग के लिए |
| 6 | अगरबत्ती / धूप / कपूर | सुगंध और आरती के लिए |
| 7 | पंचामृत** (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर) | अभिषेक के लिए |
| 8 | गंगाजल या शुद्ध जल | शुद्धि और अर्घ्य हेतु |
| 9 | कलश, नारियल और आम के पत्ते | पूर्णता का प्रतीक |
| 10 | चावल (अक्षत) | आरती, तिलक और अर्घ्य के समय |
| 11 | रोली, हल्दी, कुमकुम, चंदन | तिलक और पूजन हेतु |
| 12 | फूल (विशेषकर कमल) | लक्ष्मी जी को अर्पित करने के लिए |
| 13 | माला (कमल गट्टा या वैष्णव माला) | जप हेतु |
| 14 | घंटा / शंख | पूजा के आरंभ और समापन के लिए |
| 15 | भोजन सामग्री (खीर, फल, मिठाई, सूखे मेवे) | नैवेद्य व प्रसाद हेतु |

लक्ष्मी पूजन के लिए विशेष सामग्री

| सामग्री | प्रयोग |
| ————————————————– | ————————————— |
| चौकी / पाट | लक्ष्मी-नारायण की स्थापना |
| लाल वस्त्र | लक्ष्मी जी के आसन हेतु |
| कमल का फूल या चित्र | मां लक्ष्मी का प्रिय |
| सिंदूर / हल्दी / चावल / सुपारी / इलायची / लौंग | पूजा विधि में आवश्यक |
| सिक्के या रुपए के नोट | धन-संपत्ति का प्रतीक, पूजन में रखते हैं |
| धन लक्ष्मी / कुबेर यंत्र (वैकल्पिक) | धन वृद्धि हेतु पूजन में उपयोग |
| दीप (5 या 11 बत्तियों वाला) | लक्ष्मी आरती के समय जलाने हेतु |
| पान, इलायची, लौंग | पूजन और आरती के बाद भोग रूप में अर्पण |

चंद्र अर्घ्य के लिए सामग्री

| सामग्री | उपयोग |
| ————————————— | ————————————————- |
| स्टील / कांसे का लोटा या कलश | जल अर्पण हेतु |
| कच्चा दूध, शहद, गंगाजल | अर्घ्य जल में मिलाने हेतु |
| सफेद पुष्प (विशेषकर चमेली / चांदनी) | चंद्रदेव को अर्पित करने हेतु |
| चावल (अक्षत) | जल के साथ अर्पण में |
| दीपक / अगरबत्ती | अर्घ्य के समय जलाने हेतु |
| सफेद वस्त्र | अर्घ्य देते समय धारण करने के लिए शुभ माना जाता है |

खीर (अमृत प्रसाद) बनाने की सामग्री

| सामग्री | उपयोग |
| ———————————– | ———————— |
| दूध (पूर्ण क्रीम) | मुख्य सामग्री |
| चावल (धोकर भीगे हुए) | खीर के लिए |
| शक्कर / मिश्री | स्वादानुसार |
| सूखे मेवे (काजू, बादाम, किशमिश) | सजावट हेतु |
| केसर / इलायची / जायफल पाउडर | सुगंध हेतु |
| चांदी का बर्तन / ग्लास बाउल | चांदनी में खीर रखने हेतु |

महत्वपूर्ण परंपरा: रात्रि में खीर बनाकर छत या आंगन में खुले आसमान के नीचे रखें। बर्तन पर जाली या पतली मलमल की कपड़ा ढकें ताकि कीट न गिरे। संपूर्ण रात्रि चांदनी में रहने के बाद सुबह खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

वैकल्पिक सामग्री (यदि संपूर्ण पूजा करनी हो)

श्रीसूक्त या लक्ष्मी चालीसा की प्रति
शंख या घंटी
पंचदीप (पांच दीयों वाला दीपक)
शुभ-अशुभ संकेत हेतु कलावा / रक्षासूत्र
पीतल या तांबे की थाली – अर्घ्य और आरती हेतु
संगीत यंत्र / भजन पुस्तक – जागरण के लिए

पूजन क्रम (संक्षेप में)

1. स्नान कर नए वस्त्र धारण करें।
2. पूजन चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर लक्ष्मी-नारायण की स्थापना करें।
3. दीपक जलाएं, धूप-अगरबत्ती करें।
4. श्रीसूक्त या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें।
5. खीर बनाएं और लक्ष्मी जी को भोग लगाएं।
6. रात को चंद्रमा को अर्घ्य दें और खीर को चांदनी में रखें।
7. सुबह उस खीर को परिवार सहित प्रसाद रूप में ग्रहण करें।

शुभ दान सामग्री (फलदायक मानी जाती है)

चावल, दूध, कपड़ा, सफेद वस्त्र
खीर या गुड़ से बनी मिठाई
घी का दीप दान
अनाज या सिक्के

मंत्र

लक्ष्मी पूजन मंत्र

“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः॥”**

चंद्रदेव मंत्र

“ॐ सोमाय नमः॥” “ॐ चंद्राय नमः॥”

लक्ष्मी आवाहन मंत्र

“ॐ महालक्ष्मि च विद्महे विष्णु पत्न्यै धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥”

महालक्ष्मी आरती

ओम् जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम्हें निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

दुर्गा रूप निरंजन, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि पाता॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता।
कर्म प्रभाव प्रदर्शक, जग पालनकर्ता॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

विश्व रूप धारण कर, सब जगत उपाती।
कृपा दृष्टि रखो माँ, जन जीवन साथी॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

जो तुमको ध्यावे माँ, हर संकट हारे।
धन धान्य से पूर्ण हो, घर द्वार हमारे॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

माता लक्ष्मी की आरती, जो कोई जन गावे।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जावे॥
ओम् जय लक्ष्मी माता…॥

शुभ फल

| कार्य |                                                             फल |
| —————————- | ————————————– |
| शरद पूर्णिमा का व्रत रखने से | धन व आरोग्य प्राप्त होता है |
| लक्ष्मी पूजन और जागरण से | घर में सुख-समृद्धि आती है |
| चंद्र अर्घ्य देने से | मानसिक शांति और पित्त दोष दूर होते हैं |
| खीर प्रसाद से | आरोग्य और अमृत-फल की प्राप्ति होती है |

“शरद पूर्णिमा” का संदेश: यह रात केवल पूजा का समय नहीं, बल्कि प्रकाश और समृद्धि का प्रतीक है।जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं, तब यही संदेश देती हैं -“जो जागता है, वही पाता है। जो सोता है, वह खो देता है।”

शरद पूर्णिमा को केवल “पूजा और व्रत” का दिन नहीं, बल्कि सिद्धि और उपायों की सबसे प्रभावशाली रात्रि कहा गया है।
क्योंकि – इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं, और आकाशीय ऊर्जा सबसे अधिक शांत और शुभ मानी जाती है। इसलिए इस दिन किए गए सरल लेकिन सटीक उपाय जीवन में धन, सुख, स्वास्थ्य, वैभव और मानसिक शांति लाने वाले माने जाते हैं।

शरद पूर्णिमा के विशेष उपाय और उनके लाभ

मां लक्ष्मी और चंद्रदेव की कृपा पाने के सात प्रभावी पारंपरिक उपाय –

शरद पूर्णिमा की रात लक्ष्मी दीपदान का उपाय

विधि:

रात 12 बजे या चंद्रोदय के समय घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाएं।दीपक में कपूर या लौंग डालकर प्रज्वलित करें। “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” का 108 बार जप करें।

लाभ:

यह उपाय दरिद्रता दूर करता है।घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।व्यापार और धन वृद्धि के योग बनते हैं।

पौराणिक आधार:माना जाता है कि जो घर इस रात दीपक से आलोकित रहता है, वहां मां लक्ष्मी स्वयं प्रवेश करती हैं।

खीर चंद्र किरणों में रखने का उपाय (अमृत उपचार)

विधि:

चावल-दूध से बनी खीर बनाएं। इसे चांदी/स्टील के बर्तन में छत पर रख दें, ऊपर मलमल का कपड़ा ढक दें। सुबह वह खीर सभी परिवारजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण कराएं।

लाभ:

शारीरिक और मानसिक शांति मिलती है।पित्त दोष, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या में राहत।परिवार में सौहार्द और सुख बना रहता है।

वैज्ञानिक दृष्टि:

चंद्र-किरणों में कैल्शियम और ट्रेस मिनरल्स का संतुलन होता है, जिससे खीर पर प्राकृतिक शीतल प्रभाव आता है। यह परंपरा लोक-आयुर्वेद से जुड़ी है।

धान्य और चांदी का सिक्का पूजन

विधि:

पूजा के समय चांदी का सिक्का या रुपए का नया नोट लक्ष्मी जी के चरणों में रखें।
अगले दिन इसे अपने पर्स या तिजोरी में स्थापित करें।

लाभ:

व्यापार में उन्नति और स्थायी धन वृद्धि होती है।नया धन आने के मार्ग खुलते हैं।घर में वित्तीय स्थिरता बनी रहती है।

आस्था आधारित संदेश: यह प्रतीक है कि लक्ष्मी का आगमन केवल पूजा से नहीं, बल्कि श्रम और श्रद्धा से होता है।

चंद्र अर्घ्य से मानसिक शांति का उपाय

विधि:

एक लोटे में दूध, जल, शक्कर, चावल और फूल डालें।खुले आसमान में चंद्रमा को अर्घ्य दें। साथ ही मंत्र जप करें – “ॐ सोमाय नमः॥” या “ॐ चंद्राय नमः॥”

लाभ:

मन शांत होता है, तनाव और क्रोध कम होता है।मानसिक संतुलन और आत्म-विश्वास बढ़ता है।दांपत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बना रहता है।

वैज्ञानिक तथ्य:

चंद्रमा का प्रकाश मानव मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस केंद्र को प्रभावित करता है, जिससे शांति और पॉजिटिविटी बढ़ती है।

सफेद वस्त्र और दान का उपाय

विधि:

शरद पूर्णिमा की सुबह किसी गरीब या ब्राह्मण को दें -सफेद वस्त्र, दूध, चावल या मिश्री। दान करते समय बोले – “महालक्ष्मी प्रसन्नता हेतु अर्पण।”

लाभ:

धन से जुड़ी बाधाएँ दूर होती हैं। पुण्य और मानसिक संतोष की प्राप्ति होती है। यह उपाय ग्रह-दोषों और पितृदोष के निवारण में भी सहायक है।

जागरण और भजन-साधना का उपाय

विधि:

रात में जागरण करें, दीपक जलाएं और भक्ति-संगीत सुनें या कीर्तन करें। घर के कोनों में दीप जलाकर अंधकार हटाएं।

लाभ:

मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।घर के वातावरण में पवित्रता और समृद्धि आती है।आध्यात्मिक जागरण से आत्मबल बढ़ता है।

धार्मिक आधार: मां लक्ष्मी केवल जाग्रत, सत्कर्मशील और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति के घर में प्रवेश करती हैं।

तुलसी और शंख से लक्ष्मी पूजन का उपाय

विधि:

घर के पूजास्थल में तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएं। लक्ष्मी जी के चरणों पर शंख रखें और “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः” का जप करें।

लाभ:

घर में दरिद्रता और रोगों से रक्षा होती है।शंख में नकारात्मक ऊर्जा का निवारण करने की क्षमता होती है। यह उपाय विशेषकर गृहस्थ जीवन के लिए शुभ है।

विशेष योग – क्यों होती है यह रात ‘सिद्धि की रात्रि’

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा और पृथ्वी के बीच का ऊर्जात्मक संतुलन सर्वोत्तम होता है। आयुर्वेद में इसे “अमृत-रात्रि” कहा गया है।
इस समय ध्यान, साधना, जप या संकल्प करना अत्यंत फलदायी होता है।

ज्योतिष मत:

“इस रात किया गया कोई भी मंत्र-जप, लक्ष्मी साधना या दान साधारण दिनों की तुलना में सौ गुना फल देता है।”

शरद पूर्णिमा के उपायों से क्या लाभ मिलता है

| क्षेत्र         |                                लाभ |                                    प्रभाव |
| ————- | ————————————- | —————- |
| 💰 आर्थिक | व्यापार, धन-संचय, नौकरी में स्थायित्व | स्थायी समृद्धि |
| 🕉️ धार्मिक | मां लक्ष्मी की कृपा, मानसिक शांति | भक्ति और संतोष |
| 💫 स्वास्थ्य | तनाव, अनिद्रा, पित्त दोष में सुधार | शरीर–मन संतुलन |
| ❤️ सामाजिक | परिवारिक सौहार्द, प्रेम, एकता | सामाजिक शांति |
| 🌙 आध्यात्मिक | ध्यान और साधना की शक्ति में वृद्धि | आत्मबल और जागृति |

दीपावली पर उल्लू बलि की काली सच्चाई ,अंधविश्वास, तंत्र साधना और संकट में पक्षी

बिहार के नवजवान: परदेस में मेहनत, घर में बेरोजगारी

डिस्क्लेमर : इस लेख में दी गई धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय जानकारियाँ पारंपरिक मान्यताओं, पुराणों, धार्मिक ग्रंथों और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं।इसका उद्देश्य केवल जन-जानकारी और सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाना है।CMG TIMES किसी भी प्रकार के अंधविश्वास, अंधभक्ति या अवैज्ञानिक धारणा को प्रोत्साहित नहीं करता।पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे अपने विश्वास और विवेक के अनुसार ग्रहण करें।किसी भी विशेष पूजा-विधि, व्रत या स्वास्थ्य-सम्बंधी निर्णय से पूर्व संबंधित विद्वान या विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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