भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दुर्लभ रचनाएं आईं सामने, ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का लोकार्पण
वाराणसी। ऋषि पंचमी एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जयंती के अवसर पर हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत और काशी के प्रख्यात साहित्यकार बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दुर्लभ एवं अप्रकाशित रचनाओं के संकलन ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का विशेष लोकार्पण किया गया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की वंशजा दीपाली राजकृष्ण द्वारा संकलित इस ग्रंथ में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके पिता बाबू गोपाल चन्द्र ‘गिरिधर दास’ की दुर्लभ एवं अप्रकाशित रचनाओं को शामिल किया गया है। पुस्तक में बसंत, धमार, ग्रीष्म, जाड़े, प्रातः, स्तुति, पुष्टिमार्गीय पद और भीष्म स्तुति सहित अनेक रचनाएं संकलित हैं। इसके अलावा महाकवि जयदेव के ‘गीत गोविंद’ की कुछ रचनाओं का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद भी इस ग्रंथ की खास विशेषता है।
वाराणसी। ऋषि पंचमी एवं हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत, काशी के यशस्वी साहित्यकार और आधुनिक हिन्दी के प्रमुख रचनाकार बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की जयंती के अवसर पर उनकी दुर्लभ एवं अप्रकाशित रचनाओं के महत्वपूर्ण संकलन ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का विशेष लोकार्पण किया गया। यह ग्रंथ साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और काशी की सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आया है।
ग्रंथ का संकलन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की वंशजा दीपाली राजकृष्ण ने किया है। पुस्तक में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ उनके पिता बाबू गोपाल चन्द्र ‘गिरिधर दास’ की भी दुर्लभ एवं अप्रकाशित रचनाओं को शामिल किया गया है। इन रचनाओं के माध्यम से उस दौर की साहित्यिक चेतना, धार्मिक आस्था, भक्ति भावना और काशी के सांगीतिक वातावरण की विविध झलक देखने को मिलती है।
‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ की विशेषता केवल अप्रकाशित साहित्य के संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसमें बसंत, धमार, ग्रीष्म, जाड़े और प्रातः जैसे विभिन्न प्रसंगों से जुड़ी रचनाओं के साथ स्तुति, पुष्टिमार्गीय पद और भीष्म स्तुति जैसी रचनाओं को भी स्थान दिया गया है। इन रचनाओं में तत्कालीन समाज, धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन और काव्य परंपरा के अनेक महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देते हैं।
ग्रंथ की एक उल्लेखनीय विशेषता महाकवि जयदेव के प्रसिद्ध ‘गीत गोविंद’ की कुछ रचनाओं का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद है। इससे भारतेन्दु की साहित्यिक दृष्टि और भारतीय काव्य परंपराओं के प्रति उनकी रुचि का परिचय मिलता है। संस्कृत की शास्त्रीय काव्य परंपरा को हिन्दी पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रयास उस समय की हिन्दी साहित्यिक चेतना के महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है।
पुस्तक में काशी की संगीत परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण नामों को भी स्थान दिया गया है। काशी की प्रसिद्ध समकालीन गायिकाओं हुस्ना बाई, मल्लिका और माधवी की रचनाओं का समावेश ग्रंथ को और विशिष्ट बनाता है। विशेष रूप से हुस्ना बाई के आग्रह पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित पद भी इसमें संकलित किए गए हैं। यह सामग्री काशी में साहित्य और संगीत के बीच रहे गहरे संबंध तथा तत्कालीन सांस्कृतिक परिवेश की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।
काशी सदियों से साहित्य, संगीत, भक्ति और कला की विविध परंपराओं का केंद्र रही है। ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ इन परंपराओं को केवल साहित्यिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ देखने का अवसर देती है। ग्रंथ में संकलित सामग्री के माध्यम से भारतेन्दु युग की रचनात्मक दुनिया के साथ-साथ उस समय काशी में विकसित हो रही संगीत और भक्ति की परंपराओं की भी झलक मिलती है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिन्दी नवजागरण के प्रमुख सूत्रधारों में माना जाता है। उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, रंगमंच और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं में तत्कालीन समाज और संस्कृति की अनेक परतें दिखाई देती हैं। ऐसे में उनकी दुर्लभ और अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया जाना शोध और साहित्य के दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है।
संकलन में भारतेन्दु परिवार की साहित्यिक विरासत के साथ उस समय के काशी के सांस्कृतिक जीवन को भी जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। गोपाल चन्द्र ‘गिरिधर दास’ की रचनाओं से लेकर भारतेन्दु के काव्य, पुष्टिमार्गीय भक्ति पदों, स्तुतियों और संगीत से जुड़े साहित्य तक, पुस्तक एक विस्तृत सांस्कृतिक परिदृश्य प्रस्तुत करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के दुर्लभ साहित्यिक स्रोतों का प्रकाशन नई पीढ़ी को अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास से जोड़ने में सहायक हो सकता है। साथ ही शोधार्थियों के लिए भी यह सामग्री हिन्दी नवजागरण, भारतेन्दु युग, काशी की संगीत परंपरा और पुष्टिमार्गीय साहित्य के अध्ययन में उपयोगी आधार प्रदान कर सकती है।
ऋषि पंचमी और भारतेन्दु जयंती के अवसर पर हुआ यह लोकार्पण इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा कि इसके माध्यम से काशी की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी ऐसी सामग्री सार्वजनिक हुई, जो लंबे समय से दुर्लभ अथवा अप्रकाशित रूप में रही थी। ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ साहित्य, संगीत, भक्ति और काशी के सांस्कृतिक इतिहास को एक ही कृति में समेटने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर सामने आई है।



