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पीएम मोदी ने श्रीमद्भागवत गीता की पाण्डुलिपि के 11 खंड किए जारी

कहा- 'गीता ने महाभारत से आजादी की लड़ाई तक हमारे राष्ट्र का किया पथ-प्रदर्शन'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को नई दिल्ली में श्रीमद्भागवत गीता के श्लोंकों पर 21 विद्वानों की व्याख्याओं के साथ पांडुलिपि के 11 खंडों का विमोचन किया। इस अवसर पर जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और डॉक्टर कर्ण सिंह भी मौजूद रहे। श्रीमद्भागवत गीता संस्कृत की कई दुर्लभ व्याख्याएं (भाष्य) मूल हस्तलिखित रूप में हैं। सामान्य तौर पर श्रीमद्भागवत गीता को एकल व्याख्या के रूप के साथ प्रस्तुत करने का प्रचलन है। श्रीमद्भागवत गीता की व्यापक और तुलनात्मक समझ प्राप्त करने के लिए एक साथ लाया गया है । पहली बार प्रसिद्ध भारतीय विद्वानों की प्रमुख व्याख्याओं को श्रीमद्भागवत गीता की व्यापक और तुलनात्मक समझ प्राप्त करने के लिए एक साथ लाया जा रहा है। धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पांडुलिपि, असाधारण विविधता और भारतीय सुलेख की सूक्ष्मता के साथ तैयार की गई है जिसमें शंकर भाष्य से लेकर भाषानुवाद तक को शामिल किया गया है। बताना चाहेंगे कि डॉ. कर्ण सिंह धर्माथ ट्रस्ट जम्मू कश्मीर के अध्यक्ष ट्रस्टी हैं।

ऐसे प्रकाशित हुए श्रीमद्भागवत गीता की पाण्डुलिपि के 11 खंड

इस अवसर पर डॉ. कर्ण सिंह ने कहा, हम प्रधानमंत्री मोदी जी के बहुत कृतज्ञ हैं। मेरे अनुरोध पर आपने इस प्रकाशन के लोकार्पण को ही स्वीकार नहीं किया बल्कि निवास स्थान पर हमें बुलाया। इसके आगे जोड़ते हुए कर्ण सिंह बोले 1846 में हमारे पूर्वज महाराजा गुलाब सिंह ने जब जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थापना की थी उसके साथ उन्होंने धर्माथ की भी स्थापना की क्योंकि वे जानते थे कि वहां कई प्राचीन स्थान है करीब 1000 वर्ष पहले शंकराचार्य थे और खीरभवानी थे व जम्मू में भी ऐसे ही कुछ स्थान रहे जिनकी रक्षा के लिए उन्होंने धर्माथ की स्थापना की थी। उस समय से लेकर आज तक ये ट्रस्ट चला आ रहा है।

हमारे दूसरे महाराजा रणधीर सिंह ने जम्मू में भव्य मंदिर बनाए जिनमें से एक है त्रिभुवन नाथ मंदिर जो बेहद अदभुत है। मंदिर निर्माण के अतिरिक्त उन्होंने भारतवर्ष के कोने से अपने पंडित वहां भेजे कि पांडुलिपियां ले आओ। ये पांडुलिपिया बेहद पुरानी हैं जो इस समय श्री रणवीर संस्कृत रिसर्च इंस्टीट्यूट जो रघुनाथ मंदिर के प्रांगण में है वहीं सुरक्षित है। उन्हीं पांडुलिपियों में से संपादक डॉक्टर कर्ण किशोर मिश्र ने काफी परिश्रम करके श्रीमद्भागवत गीता की पांडुलिपिया निकाली। इसके बाद उन्होंने ऐसा किया कि उन्हें एकत्रित करके गीता के हर एक श्लोक के ऊपर 20 या 21 अलग-अलग टिप्पणियां हैं। यह एक अद्भुत चीज है। इस भव्य कार्यक्रम के 11 वॉल्यूम हैं। मोती लाल बनारसी दास को यह काम दिया गया है क्योंकि वे बेहद पुराने प्रकाशक हैं। तकरीबन 100 साल से ये संस्कृत की किताबें छाप रहे हैं।

भगवतगीता पर शंकराचार्य जी ने कहा है…

”भगवद्गीता किञ्चिदधीता
गङ्गाजललवकणिका पीता ।
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा
क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ।।”

पीएम मोदी का संबोधन

वहीं इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा, आज हम श्रीमद्भागवत गीता की 20 व्याख्याओं को एक साथ लाने वाले हैं। इसके लिए 11 संस्करणों का लोकार्पण कर रहे हैं। मैं इस पुणितकार्य के लिए प्रयास करने वाले सभी विद्वानों को, इससे जुड़े हर व्यक्ति को और उनके प्रयास को आदरपूर्वक नमन करता हूं और बधाई देता हूं। आपने ज्ञान का इतना बड़ा कोष आज के युवाओं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुलभ करने का बहुत ही महान काम किया है। मैं इसके लिए डॉ. कर्ण सिंह का विशेष अभिनंदन करता हूं जिनके मार्गदर्शन में ये कार्य सिद्ध हुआ है। जब भी मैं उनसे मिला हूं एक प्रकार से ज्ञान और संस्कृति की धारा अविरत बहती रहती है। ऐसे बहुत कम विरले मिलते हैं और आज ये भी बहुत शुभ अवसर है कि आज डॉ. कर्ण सिंह का जन्मदिवस भी है और 90 साल की एक प्रकार से उनकी एक सांस्कृतिक यात्रा भी है।

जम्मू कश्मीर की उस पहचान को किया पुनर्जीवित, जिसने सदियों तक पूरे भारत की विचार परंपरा का किया नेतृत्व

उन्होंने कहा, डॉ कर्ण सिंह जी ने भारतीय दर्शन के लिए जो काम किया है, जिस तरह अपना जीवन इस दिशा में समर्पित किया है, भारत के शिक्षा जगत पर उसका प्रकाश और प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आपके इस प्रयास ने जम्मू कश्मीर की उस पहचान को भी पुनर्जीवित किया है जिसने सदियों तक पूरे भारत की विचार परम्परा का नेतृत्व किया है। कश्मीर के भट्ट भास्कर, अभिनव गुप्त, आनंदवर्धन अनगिनत विद्वान जिन्होंने गीता के रहस्यों को हमारे लिए उजागर किया। आज वो महान परम्परा एकबार फिर देश के संस्कृति को समृद्ध करने के लिए तैयार हो रही है। ये कश्मीर के साथ-साथ पूरे देश के लिए भी गर्व का विषय है।

किसी एक ग्रंथ के हर श्लोक पर अलग-अलग व्याख्याएं, इतने मनीषियों की अभिव्यक्ति, ये गीता की उस गहराई का प्रतीक है, जिस पर हजारों विद्वानों ने अपना पूरा जीवन दिया है। ये भारत की उस वैचारिक स्वतन्त्रता और सहिष्णुता का भी प्रतीक है, जो हर व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण, अपने विचार रखने के लिए प्रेरित करती है। किसी के लिए गीता ज्ञान का ग्रंथ है, किसी के लिए सांख्य का शास्त्र है, किसी के लिए योग सूत्र है तो किसी के लिए कर्म का पाठ है। मैं जब गीता को देखता हूं तो मेरे लिए ये उस विश्वरूप समान है जिसका दर्शन हमें 11वें अध्याय में होता है।

”मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि”

अर्थात मुझमें जो कुछ भी देखना चाहो देख सकते हो। हर विचार, हर शक्ति के दर्शन कर सकते हो। गीता के विश्वरूप ने महाभारत से लेकर आजादी की लड़ाई तक हर कालखंड में हमारे राष्ट्र का पथ-प्रदर्शन किया है।

भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाले आदि शंकराचार्य ने गीता को आध्यात्मिक चेतना के रूप में देखा

पीएम मोदी ने कहा, भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाले आदि शंकराचार्य ने गीता को आध्यात्मिक चेतना के रूप में देखा। गीता को रामानुजाचार्य जैसे संतों ने आध्यात्मिक ज्ञान की अभिव्यक्ति के रूप में सामने रखा। स्वामी विवेकानंद के लिए गीता अटूट कर्मनिष्ठा और अदम्य आत्मविश्वास का स्रोत रही है। गीता श्री अरबिंदो के लिए तो ज्ञान और मानवता की साक्षात अवतार थी। गीता महात्मा गांधी की कठिन से कठिन समय में पथप्रदर्शक रही है। गीता नेताजी सुभाषचंद्र बोस की राष्ट्रभक्ति और पराक्रम की प्रेरणा रही है। ये गीता ही है जिसकी व्याख्या बाल गंगाधर तिलक ने की और आज़ादी की लड़ाई को नई ताकत दी।

हमारी आजादी की लड़ाई को गीता से मिली उर्जा

पीएम मोदी ने कहा, मैं समझता हूं कि ये सूची इतनी लंबी हो सकती है कि कई घंटे भी इसके लिए कम पड़ेंगे। आज जब देश आजादी के 75 साल मनाने जा रहा है तो हम सबको गीता के इस पक्ष को भी देश के सामने रखने का प्रयास करना चाहिए कि कैसे गीता ने हमारी आजादी की लड़ाई को उर्जा दी। कैसे हमारे स्वाधीनता सेनानियों को देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने का साहस दिया, कैसे गीता ने देश को एकता के आध्यात्मिक सूक्ष में बांधकर रखा। हम शोध करें और लिखें और अपनी युवा पीढ़ी को इससे परिचित कराएं। गीता तो भारत की एकजुटता है, सदत्व की भावना का मूल पाठ है क्योंकि गीता कहती है..

“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।”

अर्थात प्राणी मात्र में ईश्वर का वास है। नर ही नारायण है। गीता हमारे ज्ञान और सोच की प्रवृत्ति की प्रतीक है क्योंकि गीता कहती है…

”न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”

अर्थात ज्ञान से पवित्र और कुछ भी नहीं है। गीता भारत के वैज्ञानिक चिंतन की, साइंटिफिक टेम्परामेंट की भी उर्जा स्रोत है। क्योंकि गीता का वाक्य है…

“ज्ञानम् विज्ञानम्-सहितम् यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्”

अर्थात ज्ञान और विज्ञान जब साथ मिलते हैं तभी समस्याओं का, दुविधाओं का समाधान होता है। गीता सदियों से भारत की कर्मनिष्ठा का प्रतीक है क्योंकि गीता कहती है…

“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात अपने कर्तव्यों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। गीता एक ऐसा आध्यात्मिक ग्रंथ है जिसने यह कहने का साहस किया कि

“न अन्व्यातं न अनवातं आवात्ज्ञं वर्तयेवच कर्मये”

अर्थात सभी हानि, लाभ व इच्छाओं से मुक्त ईश्वर भी बिना कर्म किए नहीं रहता है इसलिए गीता पूरी व्यवहारिकता से यह बात कहती है कि कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता। हम कर्म से मुक्त नहीं हो सकते। अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने कर्मों को कैसा स्वरूप दें, गीता हमें मार्ग दिखाती है, हम पर कोई आदेश नहीं थोपती। गीता ने अर्जुन पर भी कोई आदेश नहीं थोपा था। श्रीकृष्ण ने पूरी गीता के उपदेश के बाद अंतिम अध्याय में अर्जुन से यही कहा…

”यथेच्छसि तथा कुरु”

यानी मैंने जितना कहना था कह दिया अब तुम्हें जितना ठीक लगे करो। ये अपने आप में शायद इससे ज्यादा लिबरल थिकिंग कोई और हो ही नहीं सकती। कर्म और विचारों की ये स्वतंत्रता ही भारत के लोकतंत्र की सच्ची पहचान रही है। हमारा लोकतन्त्र हमें हमारे विचारों की आज़ादी देता है, काम की आज़ादी देता है, अपने जीवन के हर क्षेत्र में समान अधिकार देता है। हमें ये आज़ादी उन लोकतान्त्रिक संस्थाओं से मिलती है, जो हमारे संविधान की संरक्षक हैं। इसलिए, जब भी हम अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो हमें अपने लोकतान्त्रिक कर्तव्यों को भी याद रखना चाहिए। गीता तो एक ऐसा ग्रंथ है जो पूरे विश्व के लिए है, जीव मात्र के लिए है। दुनिया की कितनी ही भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया, कितने ही देशों में इस पर शोध किया जा रहा है, विश्व के कितने ही विद्वानों ने इसका सानिध्य लिया है।

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