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पापांकुशा एकादशी 2025 : पापों पर अंकुश लगाने वाला व्रत, जो खोलता है मोक्ष का द्वार

पापांकुशा एकादशी 2025- यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष पापांकुशा एकादशी 3 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को पड़ेगी और पारण 4 अक्टूबर, शनिवार सुबह 06:16 से 08:37 बजे के बीच किया जाएगा। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु (पद्मनाभ स्वरूप) की पूजा से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस एकादशी पर उपवास, भजन, दान और प्रभु नाम-स्मरण का विशेष महत्व है।पौराणिक कथा के अनुसार, “क्रोधन नामक शिकारी” ने इस व्रत के प्रभाव से पापों से मुक्ति पाई थी।यह दिन आत्मशुद्धि, संयम और प्रभु-भक्ति का उत्सव है।

  • 3 अक्टूबर को पड़ेगी कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी, श्री पद्मनाभ भगवान की आराधना से मिलता है पाप-क्षय और विष्णु-लोक का आशीर्वाद

कार्तिक मास की शुरुआत के साथ ही भक्ति, उपवास और धर्म का पर्व-संस्कार शुरू हो जाता है। इसी कड़ी में आने वाली पापांकुशा एकादशी, जो इस वर्ष शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025 को पड़ रही है, धर्म और आस्था की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह एकादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष में आती है और इसे “पापों का नाश करने वाली एकादशी” कहा गया है। शास्त्रों में वर्णन है -“पापांकुशा एकादशी-व्रत पापों को नष्ट करने वाला और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कराने वाला है।”

पौराणिक आधार : जब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया व्रत का महात्म्य

पौराणिक कथाओं में पापांकुशा एकादशी का वर्णन पद्मपुराण और स्कंदपुराण दोनों में मिलता है। कथा के अनुसार, पांडवों के ज्येष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा -“हे जनार्दन! कार्तिक कृष्ण एकादशी का क्या नाम है, और इसका क्या फल बताया गया है?”

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया – “राजन्! यह ‘पापांकुशा एकादशी’ नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन जो मनुष्य उपवास करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर विष्णुधाम को प्राप्त करता है।” उन्होंने आगे कहा -“पद्मनाभ भगवान की उपासना इस दिन करने से मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। जो इस एकादशी को भक्ति-भाव से करता है, उसके समस्त पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि से लकड़ी जल जाती है।”

कथा : शिकारी क्रोधन का उद्धार – पाप से पुण्य की यात्रा

पुराणों में एक कथा आती है। विंध्याचल के घने जंगलों में एक क्रोधन नामक शिकारी रहता था। वह जीवहत्या और हिंसा में लिप्त था। बुढ़ापे में उसे पश्चात्ताप हुआ। उसने एक महात्मा से सुना कि पापांकुशा एकादशी पापों से मुक्ति देने वाली होती है। वृद्ध शिकारी ने उसी दिन संकल्प लेकर उपवास किया, भगवान विष्णु की आराधना की, और उस रात प्रभु का नाम लेते हुए ही उसका देहांत हो गया। मृत्यु के पश्चात यमदूत उसके पास पहुँचे, लेकिन तत्काल ही विष्णुदूत आ गए और बोले -“यह व्यक्ति पापांकुशा एकादशी का व्रत कर चुका है। इसे ले जाने का अधिकार अब तुम्हारा नहीं, यह हरिधाम जाएगा।”

कथा का संदेश स्पष्ट है – “घोर पापी भी यदि सच्चे हृदय से इस एकादशी का व्रत करे, तो वह प्रभु की शरण में जाकर मुक्ति पा सकता है।”

तिथि, मुहूर्त और राहुकाल

एकादशी तिथि प्रारंभ: 2 अक्टूबर, रात 08:42 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 3 अक्टूबर, रात 09:18 बजे
व्रत रखने की तिथि: शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025
पारण (व्रत खोलना): शनिवार, 4 अक्टूबर, प्रातः 06:16 से 08:37 बजे तक
राहुकाल (वाराणसी): पूर्वाह्न 10:18 से 11:47 बजे तक

धर्माचार्यों के अनुसार राहुकाल के समय कोई नया शुभ कार्य प्रारंभ नहीं करना चाहिए। यद्यपि पूजा, जप और भक्ति निरंतर जारी रह सकती है।

पूजा-विधि : संकल्प से लेकर आरती तक

प्रातः स्नान और संकल्प

भोर में स्नान कर, पीले या सफेद वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख कर भगवान विष्णु का ध्यान करें और संकल्प लें —“मैं श्री हरि विष्णु की कृपा प्राप्ति और पापों के नाश के लिए पापांकुशा एकादशी का व्रत करूँगा।”

विष्णु पूजा और अभिषेक

भगवान विष्णु या श्री पद्मनाभ की मूर्ति/चित्र का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और तुलसी-दल अर्पित करें।

पाठ और जप

  • विष्णु सहस्रनाम
  • विष्णु चालीसा
  • गीता के अध्याय 12 (भक्ति योग) या 15 (पुरुषोत्तम योग) का पाठ करें।
    “ॐ नमो नारायणाय” का जप करें।

उपवास नियम

  • निर्जला, फलाहार या एकभुक्त उपवास करें।
  • मांस, प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन वर्जित है।
  • असत्य, कटु वचन और क्रोध से दूर रहें।

रात्रि में भजन और जागरण

सायंकाल दीपदान करें और हरि नाम का कीर्तन करें। रात्रि में संभव हो तो भजन, ध्यान या विष्णु कथा श्रवण करें।

पूजन सामग्री सूची

तुलसी पत्ते
गंगाजल / पंचामृत
चंदन / अक्षत / पुष्प
धूप, दीप, घी / तेल
फल, मेवा, मिश्री, नारियल
आरती थाल, घंटी, जलपात्र, आसन
विष्णु मूर्ति या चित्र
पूजा वस्त्र व नैवेद्य

व्रत का फल और महात्म्य

शास्त्रों में वर्णित है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। पद्मपुराण में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं – “इस एकादशी के व्रत से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो इसे करता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता।” व्रतधारियों का विश्वास है कि इस दिन किया गया उपवास और दान सहस्त्र अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है।

कौन कर सकता है व्रत?

यह व्रत स्त्री-पुरुष, गृहस्थ, विद्यार्थी, संन्यासी – सभी के लिए समान रूप से फलदायी बताया गया है। भक्तजन इसे फलाहार रूप में भी रख सकते हैं। जिनसे निर्जला संभव नहीं, वे दूध, फल और सात्त्विक आहार ग्रहण कर सकते हैं।

पारण का विधान

व्रत के अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद हरिवसरा के समाप्त होने पर पारण किया जाता है।

  • तुलसी-दल और गंगाजल से भगवान को अर्पण करें।
  • फल अथवा जल से व्रत खोलें।
  • ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा दें।
  • गोसेवा, अन्नदान या जरूरतमंद को भोजन कराना सर्वोत्तम माना गया है।

धर्माचार्य क्या कहते हैं?

वाराणसी स्थित प्राचीन आदि केशव मंदिर के महंत विद्याशंकर त्रिपाठी बताते हैं -“पापांकुशा एकादशी का अर्थ ही है – पापों पर अंकुश लगाने वाली एकादशी। यह व्रत व्यक्ति के भीतर के राग, द्वेष, लालच और आसक्ति को समाप्त करता है। एक दिन का व्रत यदि सच्चे भाव से किया जाए तो वह आत्मशुद्धि का मार्ग बनता है।”“यह केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मानुशासन का उत्सव है। एकादशी हमें संयम, सत्य और सेवा का पाठ पढ़ाती है।”

शास्त्रीय उल्लेख

पद्मपुराण के अनुसार – “जो मनुष्य इस व्रत का पालन करता है, उसके पितर स्वर्ग में जाते हैं, और वह स्वयं भी विष्णु लोक को प्राप्त करता है।” स्कंदपुराण में उल्लेख है – “एकादशी व्रत मनुष्य के चित्त को निर्मल करता है और उसे भगवान के सान्निध्य में ले जाता है।”

लोक परंपराएँ और सामाजिक आस्था

उत्तर भारत में पापांकुशा एकादशी के दिन घरों में तुलसी पूजन का विशेष आयोजन होता है।
स्त्रियाँ स्नान के बाद भगवान विष्णु की आरती करती हैं और घर में दीप जलाती हैं।
कई स्थानों पर ‘हरिनाम संकीर्तन’ और भजन-संध्या का आयोजन भी होता है।
ग्रामीण अंचलों में इसे “पद्मनाभ एकादशी” नाम से भी जाना जाता है।

एकादशी का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर और मन की डिटॉक्स प्रक्रिया भी है। आयुर्वेद कहता है –

  • “मास में दो बार उपवास करने से शरीर के दोष संतुलित रहते हैं।”
  • एकादशी के दिन हल्का भोजन या उपवास पाचन तंत्र को विश्राम देता है।
  • विष्णु पूजा के दौरान ध्यान, मौन और जप मन की स्थिरता को बढ़ाता है।

पापांकुशा एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का उत्सव है।जो व्यक्ति इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति, उपवास और दान करता है, उसे जन्म-मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।यह एक ऐसा पर्व है जो हर मनुष्य को यह सिखाता है कि -“पाप चाहे कितना भी बड़ा हो, यदि व्यक्ति पश्चाताप और भक्ति के मार्ग पर चले तो ईश्वर उसे क्षमा कर देते हैं।” जैसा कि धर्मशास्त्रों में कहा गया है -“एकादशी व्रत ही सर्वोच्च पुण्य का दाता है। जो एकादशी का पालन करता है, वह सब तीर्थों के फल को प्राप्त करता है।”3 अक्टूबर 2025 की पापांकुशा एकादशी न केवल पापों का क्षय करती है, बल्कि हर भक्त के जीवन में भक्ति, शांति और मोक्ष का दीप जलाती है।

डिस्क्लेमर :इस पोस्ट/रिपोर्ट/डिज़ाइन में प्रकाशित धार्मिक, पौराणिक या ज्योतिषीय जानकारी प्राचीन शास्त्रों, ग्रंथों, पुराणों और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जन-सामान्य को धर्म, संस्कृति और परंपरा से अवगत कराना है।यह जानकारी किसी भी प्रकार के अंधविश्वास या भ्रम को बढ़ावा देने के लिए नहीं है। यदि किसी तथ्य में त्रुटि, अशुद्धि या अपूर्णता प्रतीत हो तो कृपया हमें सूचित करें -सत्यापन के उपरांत संशोधन किया जाएगा।

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