“पंकज त्रिपाठी : गाँव की मिट्टी से बॉलीवुड और OTT के सितारे तक का सफ़र”
बिहार के गोपालगंज के छोटे से गाँव गोल्टी से निकलकर पंकज त्रिपाठी ने संघर्ष, थिएटर और कड़ी मेहनत के दम पर बॉलीवुड और ओटीटी की दुनिया में अपनी खास पहचान बनाई। यह जीवनी बताती है कि कैसे होटल किचन में काम करने वाला युवक आज “मिर्ज़ापुर” का कालेन भैया और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार बन गया।
- गोल्टी गाँव का बेटा, जिसने अभिनय को जीवन का आईना बना दिया
- थिएटर से फिल्मों तक – संघर्ष और धैर्य की अद्भुत कहानी
- ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से ‘मिर्ज़ापुर’ तक – किरदारों का असली बादशाह
- सादगी ही सबसे बड़ा स्टारडम : आम आदमी का हीरो क्यों कहलाते हैं पंकज त्रिपाठी
गांव का बेटा जो सिनेमा का चेहरा बना
मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में जब परदे पर पंकज त्रिपाठी दिखाई देते हैं, तो उनकी आँखों की सादगी और चेहरे की सहजता हर किसी को अपनी ओर खींच लेती है। न बड़े नायक जैसी दबंग एंट्री, न सजे-धजे संवाद, न दिखावटी हाव-भाव—फिर भी पर्दे पर आते ही वे किरदार को जीने लगते हैं और दर्शक खुद को उस किरदार में पहचानने लगते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
आज भारतीय सिनेमा और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर पंकज त्रिपाठी एक ऐसा नाम बन चुके हैं जिनके बिना सफलता की गिनती अधूरी लगती है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक लम्बा संघर्ष छुपा है। गोपालगंज के छोटे से गाँव गोल्टी में जन्मे इस कलाकार का सफर आसान नहीं था। खेत-खलिहान और मंदिरों के बीच पले-बढ़े पंकज को बचपन में शायद ही कभी लगा हो कि एक दिन वह भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित चेहरे बन जाएंगे।
उनकी कहानी किसी परीकथा की तरह नहीं है, बल्कि पूरी तरह ज़मीनी है- किसान का बेटा, गाँव के मेलों में रंगमंच देखने वाला बच्चा, छोटे कस्बों की गलियों में पला-बढ़ा युवक, और फिर बड़े सपनों को लेकर महानगर पहुँचा इंसान। यही वजह है कि उनकी कहानी आम दर्शक को अपनी लगती है। आज जब “मिर्ज़ापुर” के कालेन भैया का नाम लिया जाता है तो लोगों के ज़हन में पंकज त्रिपाठी का चेहरा उभरता है। “न्यूटन” जैसी संवेदनशील फिल्म हो या “बरेली की बर्फी” जैसी हल्की-फुल्की कॉमेडी- हर रोल में वह अपना रंग भर देते हैं।
लेकिन उनके जीवन की असली ताक़त उस संघर्ष में छिपी है, जिसमें उन्होंने होटल किचन में काम किया, छोटे-छोटे विज्ञापनों में नज़र आए, और दर्जनों बार रिजेक्शन का सामना किया। यही संघर्ष उन्हें सबसे अलग बनाता है। यह जीवनी उस सफर की दास्तान है—जहाँ एक साधारण लड़का, अपनी मेहनत और ईमानदारी से, लाखों-करोड़ों दिलों का हीरो बन जाता है।
बचपन और गांव की मिट्टी – गोल्टी से निकला सितारा
बिहार के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बसे गोपालगंज ज़िले का गोल्टी गांव—एक साधारण सा गाँव, जहाँ सुबह सूरज उगते ही खेतों में हल चलाने की आवाज़ें और मंदिरों की घंटियाँ सुनाई देती हैं। इसी गाँव में 5 सितंबर 1976 को पंकज त्रिपाठी का जन्म हुआ। उनका परिवार खेती-किसानी करता था और गाँव के पुजारी के तौर पर उनके पिता बनारस त्रिपाठी का मान-सम्मान भी था। माँ हेमवती देवी गृहिणी थीं, जिनकी गोद और संस्कारों में पंकज ने अपना बचपन बिताया।
गाँव की पगडंडियों पर खेलते हुए, पोखरों के किनारे तैरते हुए और खेतों की मेड़ों पर दौड़ते हुए पंकज बड़े हुए। उनके घर का माहौल धार्मिक और सादा था। पूजा-पाठ, खेती का काम और गाँव का जीवन ही उनकी दुनिया थी। उस समय यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि यही बच्चा एक दिन फिल्मों और ओटीटी की दुनिया में इतना बड़ा नाम कमाएगा।
पंकज त्रिपाठी का बचपन कठिनाइयों से भरा नहीं था, लेकिन साधारणता से ज़रूर भरा था। गाँव में बिजली की कमी, पढ़ाई के सीमित साधन और मनोरंजन के नाम पर सिर्फ़ मेलों-ठेलों में लगने वाले नाटक या रामलीला। यही रामलीला उनके लिए जीवन का पहला थिएटर था। गाँव के लोग जब पौराणिक किरदार निभाते थे, तो छोटे पंकज मंत्रमुग्ध होकर देख लेते। वे अकसर कहते हैं कि पहली बार अभिनय का कीड़ा उन्हें इन्हीं मेलों और नाटकों से लगा।
पढ़ाई में भी वे अच्छे थे, लेकिन ज़्यादा गंभीर नहीं। खेती-बाड़ी और गाँव के जीवन में रमकर ही उन्होंने बचपन के दिन गुज़ारे। बचपन में ही उनके माता-पिता चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर या तो सरकारी नौकरी करे या फिर पुजारी का काम आगे बढ़ाए। लेकिन पंकज के मन में कुछ और ही रंग चल रहा था।
गाँव की कहानियाँ, लोकगीत, नाटकों की गूँज-सबने उनके मन में अभिनय की एक अलग दुनिया बना दी थी। गाँव के स्कूल में पढ़ाई के दौरान जब नाटक करने का मौका मिला, तो उन्होंने अपने किरदार से सबको चौंका दिया। धीरे-धीरे गाँव और आस-पास के कस्बों में उनका नाम एक अच्छे नाटककार और मंच कलाकार के रूप में लिया जाने लगा।
हालाँकि उस समय न तो उन्होंने यह सोचा था कि वे फिल्म अभिनेता बनेंगे, न ही गाँव के लोगों को ऐसा कोई खयाल आया था। वे बस इतना जानते थे कि यह लड़का गाँव का बेटा है, जो अभिनय में अच्छा है और लोगों को हँसा-रुला देता है।
पंकज त्रिपाठी के बचपन की सबसे ख़ास बात उनकी सादगी थी। वह आज भी अपने गाँव को नहीं भूले हैं। अक्सर इंटरव्यूज़ में वे बताते हैं कि मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली और गाँव का जीवन ही उनकी असली पूँजी है। यही वजह है कि बड़े स्टार बनने के बाद भी वे अपने गाँव जाते हैं, वहाँ के लोगों से मिलते हैं और कहते हैं – “मैं वही पंकज हूँ, जो पहले था, बस अब काम बदल गया है।”
शुरुआती शिक्षा और संघर्ष के पहले पड़ाव – पटना से दिल्ली तक का सफर
गोल्टी गाँव से बाहर की दुनिया देखने की शुरुआत पंकज त्रिपाठी की स्कूली शिक्षा से हुई। गाँव में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें पास के स्कूल में भेजा गया। वहीं उन्होंने पहली बार जाना कि किताबों और कक्षा के बाहर भी एक अलग दुनिया है। पढ़ाई में औसत लेकिन समझने में तेज़ पंकज अक्सर शिक्षकों की नज़र में आ जाते थे। लेकिन उन्हें पढ़ाई से ज़्यादा आकर्षण था रंगमंच और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का।
गाँव और छोटे कस्बे की सीमित दुनिया से निकलकर जब वे किशोरावस्था में पटना पहुँचे, तो उनके लिए यह एक नया अध्याय था। बिहार की राजधानी पटना उस समय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र थी। यहीं से उनके सपनों ने आकार लेना शुरू किया।
पटना में कॉलेज जीवन के दौरान उन्होंने कई नाटकों में हिस्सा लिया। यहीं उनकी पहचान बनी एक अच्छे रंगकर्मी के तौर पर। उस दौर में नुक्कड़ नाटक, सामाजिक मुद्दों पर आधारित छोटे-छोटे मंचन और विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पंकज त्रिपाठी का नाम लिया जाने लगा।
लेकिन पटना का सफर सिर्फ रंगमंच तक सीमित नहीं था। जीवन चलाने के लिए उन्हें कई तरह के छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। कभी होटल में काम किया, कभी आयोजनों में छोटे-मोटे काम सँभाले। इन सबके बीच उन्होंने अपने सपनों को थामे रखा।
इसी दौरान पंकज त्रिपाठी ने होटल मैनेजमेंट का कोर्स भी किया। होटल के किचन में काम करने का उनका अनुभव आज भी चर्चा में रहता है। वह कहते हैं कि इस दौर ने उन्हें अनुशासन और धैर्य सिखाया। लेकिन भीतर ही भीतर उन्हें लगने लगा कि उनकी मंज़िल कुछ और है।
पटना के रंगमंच ने उन्हें आत्मविश्वास दिया, लेकिन अभिनय की असली शिक्षा और बड़े मंच की तलाश उन्हें दिल्ली तक ले आई। यहीं उन्होंने निश्चय किया कि वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लेंगे। NSD उस समय देश का सबसे बड़ा थिएटर संस्थान था, जहाँ से नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अन्नुपम खेर जैसे दिग्गज निकले थे।
दिल्ली पहुँचना आसान नहीं था। न आर्थिक साधन थे, न कोई बड़ी पहचान। लेकिन पंकज त्रिपाठी की जिद और लगन उन्हें 2001 में NSD तक ले गई। यह उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था।
दिल्ली की गलियों में घूमते, लाइब्रेरी में किताबें पढ़ते और रंगमंच के दिग्गजों से सीखते हुए पंकज त्रिपाठी ने अपनी कला को निखारा। यही वह दौर था जिसने उनके भीतर के अभिनेता को गढ़ा।
थिएटर का दौर – दिल्ली के रंगमंच से निकला सधा हुआ अभिनेता
दिल्ली का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) हर कलाकार का सपना होता है। यही वह जगह है जहाँ भारतीय रंगमंच की आत्मा बसती है। पंकज त्रिपाठी जब 2001 में यहाँ दाख़िल हुए, तो यह उनके जीवन का सबसे अहम मोड़ था। बिहार के छोटे से गाँव से निकला यह युवक अब देश के सबसे बड़े रंगमंच संस्थान में खड़ा था।
NSD में दाख़िले से पहले उन्होंने पटना और आस-पास के मंचों पर काफी अनुभव ले लिया था, लेकिन NSD ने उन्हें अभिनय का गहरा व्याकरण सिखाया। यहाँ उन्होंने जाना कि अभिनय सिर्फ संवाद बोलने का नाम नहीं, बल्कि शरीर की भाषा, चेहरे की भावनाएँ, मंच पर खड़े होने का अंदाज़, यहाँ तक कि साँस लेने का तरीका भी अभिनय का हिस्सा है।
दिल्ली का रंगमंच उस समय अनेक धाराओं से गुजर रहा था। एक तरफ शास्त्रीय नाटकों का मंचन था, तो दूसरी ओर समकालीन विषयों पर प्रायोगिक नाटक हो रहे थे। पंकज त्रिपाठी दोनों में ही खुद को आज़माते रहे। कभी शेक्सपीयर के किरदार निभाए, तो कभी हिंदी के आधुनिक नाटकों में उतर गए।
रंगमंच पर उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी सच्चाई। मंच पर आते ही वे अभिनय नहीं करते थे, बल्कि किरदार को जीते थे। यही वजह थी कि साथी कलाकार और शिक्षक उन्हें अलग नज़र से देखने लगे।
दिल्ली का यह दौर उनके लिए सीखने का ही नहीं, संघर्ष का भी समय था। NSD में पढ़ाई के दौरान उन्हें खर्च चलाने के लिए कभी छोटे-मोटे काम भी करने पड़ते। कई बार तो जेब में पैसे नहीं होते, लेकिन रंगमंच के लिए जुनून इतना था कि भूखे रहकर भी रिहर्सल करते।
इसी दौर में उनकी मुलाकात कई समकालीन कलाकारों से हुई, जो बाद में बॉलीवुड और थिएटर की दुनिया में बड़े नाम बने। पंकज त्रिपाठी का कहना है कि NSD ने उन्हें सिर्फ़ अभिनेता नहीं बनाया, बल्कि इंसान भी बनाया। यहाँ उन्होंने अनुशासन, धैर्य और जीवन की बारीकियों को समझा।
थिएटर से निकलने के बाद भी पंकज त्रिपाठी लंबे समय तक रंगमंच से जुड़े रहे। दिल्ली और आस-पास के शहरों में वे नाटक करते रहे। धीरे-धीरे उनके भीतर यह विश्वास पक्का हो गया कि वे सिनेमा की दुनिया में भी अपनी पहचान बना सकते हैं।
लेकिन दिल्ली से मुंबई तक का सफर आसान नहीं था। थिएटर से फिल्मों तक पहुँचना एक लंबी और कठिन यात्रा थी। हर कदम पर अनिश्चितता थी। फिर भी पंकज त्रिपाठी ने अपने सपनों को थामा और निश्चय किया कि अब वक्त आ गया है- मुंबई की ओर बढ़ने का।
मुंबई में जद्दोजहद – छोटे-छोटे रोल, रिजेक्शन और संघर्ष की रातें
दिल्ली का रंगमंच पंकज त्रिपाठी को आत्मविश्वास दे चुका था। उन्होंने तय कर लिया था कि अब सिनेमा की असली दुनिया में उतरने का वक्त है। बैग में सपने, जेब में सीमित पैसे और आँखों में उम्मीद लिए वह मुंबई पहुँचे।
मुंबई- सपनों का शहर। यहाँ हर रोज़ हजारों लोग आते हैं, लेकिन कुछ ही अपने सपनों को पूरा कर पाते हैं। पंकज भी उन्हीं भीड़ में से एक थे। शुरुआत बेहद कठिन रही। कोई जान-पहचान नहीं, न कोई गॉडफादर। सिर्फ़ थिएटर का अनुभव और अभिनय का जुनून उनके पास था।
मुंबई में शुरुआती दिनों में उन्हें छोटे-छोटे रोल ही मिले। टीवी सीरियल्स, विज्ञापनों और फिल्मों में ऐसे किरदार जिनका नाम तक दर्शकों को याद नहीं रहता। कभी पुलिसवाले की भूमिका, कभी गुंडे की, तो कभी राह चलते किसी इंसान की झलक- बस उतना ही। कई बार तो उनका चेहरा परदे पर आता भी नहीं था, लेकिन वह हर रोल को गंभीरता से निभाते।
2004 में आई फिल्म ‘रन’ में उन्हें पहला छोटा-सा अवसर मिला। उसके बाद वे लगातार ऑडिशन देते रहे, लेकिन सफलता दूर ही रही। कई बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। कभी कास्टिंग डायरेक्टर कहते-“चेहरा कैरेक्टर के लिए फिट नहीं है”, तो कभी कहा जाता-“अच्छा है, लेकिन अभी जरूरत नहीं।”
इन हालातों में पंकज त्रिपाठी ने हार नहीं मानी। उन्होंने जीवन यापन के लिए भी कई तरह के काम किए। होटल किचन में काम करने का उनका अनुभव मुंबई में भी साथ आया। कभी-कभी उन्हें सोचकर तकलीफ होती कि इतने संघर्ष के बावजूद उन्हें पहचान क्यों नहीं मिल रही। लेकिन भीतर से एक आवाज़ कहती-“रुको, वक्त आएगा।”
मुंबई में संघर्ष का सबसे कठिन पहलू था आर्थिक तंगी। किराए का घर, ऑडिशन के लिए भाग-दौड़, और खाने-पीने के सीमित साधन। कई बार तो उन्होंने सिर्फ़ चाय और बिस्किट पर दिन काटा। लेकिन यह भी सच है कि इन्हीं कठिन दिनों ने उनके भीतर धैर्य और सहनशीलता को और मजबूत बनाया।
इसी दौर में उन्होंने कई बार छोटे विज्ञापनों और टीवी सीरियल्स में काम किया। दर्शकों को शायद याद हो कि उन्होंने टीवी शो ‘गुलाल’ और कुछ अन्य धारावाहिकों में छोटी भूमिकाएँ निभाईं। भले ही ये किरदार बहुत छोटे थे, लेकिन उन्होंने कभी इन्हें हल्के में नहीं लिया।
मुंबई का यह संघर्ष उन्हें बार-बार परख रहा था। लेकिन पंकज त्रिपाठी की खासियत यही थी कि उन्होंने हार नहीं मानी। वे मानते थे कि अभिनेता का असली हथियार उसका धैर्य और निरंतरता है। सालों की इस तपस्या के बाद आखिरकार वह मोड़ आया जिसने उनकी जिंदगी बदल दी।
पहचान का सफर – ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से चमका सितारा
मुंबई में सालों के संघर्ष और दर्जनों छोटे-छोटे रोल निभाने के बाद 2012 वह साल आया, जिसने पंकज त्रिपाठी की जिंदगी की दिशा ही बदल दी। अनुराग कश्यप की फिल्म “गैंग्स ऑफ वासेपुर” भारतीय सिनेमा में एक मील का पत्थर साबित हुई, और इसी फिल्म ने पंकज त्रिपाठी को पहचान दिलाई।
फिल्म में उनका किरदार था -“सुल्तान कुरैशी”, एक ऐसा इंसान जो दबंग भी है और खतरनाक भी। इस किरदार के लिए उन्हें ज्यादा संवाद नहीं मिले थे, लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव, चाल-ढाल और खामोशी ने ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वह पहली बार था जब दर्शकों ने कहा-“ये कलाकार कौन है? ये तो अलग ही स्तर का एक्टर है।”
गैंग्स ऑफ वासेपुर से पहले पंकज ने दर्जनों फिल्मों में काम किया था, लेकिन दर्शकों को शायद ही याद हो। इस फिल्म ने उन्हें “नजर में” ला दिया। फिल्म की रिलीज़ के बाद इंडस्ट्री के लोगों ने भी माना कि हिंदी सिनेमा को एक सधा हुआ, गहराई से अभिनय करने वाला कलाकार मिल गया है।
पंकज त्रिपाठी ने खुद कई बार कहा है कि ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था। अगर यह फिल्म न होती तो शायद वे अभी भी संघर्ष कर रहे होते। लेकिन इस फिल्म ने उनका पासपोर्ट बना दिया बॉलीवुड के बड़े किरदारों की ओर।
गैंग्स ऑफ वासेपुर की सफलता के बाद उन्हें लगातार फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे। लेकिन पंकज त्रिपाठी की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने किरदार चुनने में समझदारी दिखाई। वे सिर्फ बड़े हीरो की परछाईं बनकर नहीं रहना चाहते थे। वे ऐसे किरदार निभाना चाहते थे, जिनमें गहराई हो और जो दर्शकों को याद रहें।
इसके बाद उन्होंने ‘ओंकारा’, ‘मसान’, ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’ और ‘फुकरे’ जैसी फिल्मों में काम किया। हर फिल्म में उन्होंने अपनी पहचान छोड़ी।
2017 में आई फिल्म ‘न्यूटन’ में उन्होंने एक सरकारी अफसर की भूमिका निभाई। यह फिल्म न सिर्फ़ भारत में सराही गई, बल्कि ऑस्कर में भारत की ओर से भेजी गई। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार (विशेष जूरी अवॉर्ड) भी मिला। यह सम्मान उनके करियर की बड़ी उपलब्धि थी और इससे यह साबित हो गया कि वह अब सिर्फ़ “सपोर्टिंग एक्टर” नहीं, बल्कि एक “क्लास एक्टर” बन चुके हैं।
हर फिल्म के साथ पंकज त्रिपाठी दर्शकों के और करीब आते गए। उन्होंने दिखाया कि बिना बड़े डायलॉग, बिना हीरो की तरह स्क्रीन पर छाए रहकर भी कोई अभिनेता लोगों के दिलों पर राज कर सकता है।गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद पंकज त्रिपाठी सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि अभिनय का पर्याय बन चुके थे।
वेब सीरीज़ का जादू – ‘मिर्ज़ापुर’ से घर-घर में पहचान
भारतीय सिनेमा की दुनिया जब बदल रही थी और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स ने दर्शकों की पसंद में जगह बना ली थी, उसी समय पंकज त्रिपाठी का करियर भी एक नए मोड़ पर पहुँचा। फिल्मों से पहचान तो मिल चुकी थी, लेकिन वेब सीरीज़ ने उन्हें हर घर का जाना-पहचाना नाम बना दिया।
साल 2018 में अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई सीरीज़ “मिर्ज़ापुर” ने पूरे देश में धूम मचा दी। इस सीरीज़ में पंकज त्रिपाठी ने निभाया “कालेन भैया” का किरदार – मिर्ज़ापुर का माफिया डॉन, शांत, ठंडा दिमाग और बेहद खतरनाक।
कालेन भैया का किरदार स्क्रीन पर आते ही दर्शकों की नसों में उतर गया। उनकी धीमी आवाज़, गहरी नज़र और बेमिसाल अभिनय ने उन्हें सीरीज़ का सबसे बड़ा आकर्षण बना दिया। यह वह भूमिका थी जिसने पंकज त्रिपाठी को “जनता का स्टार” बना दिया।
गाँव-कस्बों से लेकर महानगरों तक, हर जगह लोग सिर्फ़ एक नाम लेने लगे – “कालेन भैया।” सोशल मीडिया पर उनके डायलॉग्स वायरल हो गए। मीम्स बनने लगे, और उनके अभिनय का असर इतना गहरा हुआ कि कई लोग उन्हें उनके असली नाम से कम और “कालेन भैया” के नाम से ज्यादा पहचानने लगे।
मिर्ज़ापुर की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसके बाद रिलीज़ हुए इसके दूसरे सीज़न का इंतज़ार पूरे देश ने किया। दूसरे सीज़न में भी पंकज त्रिपाठी ने साबित किया कि उनका अभिनय ही इस शो की असली जान है।
लेकिन वेब सीरीज़ की दुनिया में उनकी चमक सिर्फ़ “मिर्ज़ापुर” तक सीमित नहीं रही। उन्होंने “क्रिमिनल जस्टिस” में भी वकील माधव मिश्रा का किरदार निभाया। एक साधारण, चालाक लेकिन ईमानदार वकील के इस किरदार ने दर्शकों के दिलों को छू लिया। लोगों को लगा जैसे वे किसी असली वकील से मिल रहे हों। इस किरदार के लिए पंकज को खास तौर पर सराहा गया।
इसके अलावा उन्होंने “सेक्रेड गेम्स 2”, “गुलमोहर”, और कई अन्य ओटीटी प्रोजेक्ट्स में भी अपनी अदाकारी से पहचान बनाई। हर शो में उन्होंने यह साबित किया कि चाहे किरदार छोटा हो या बड़ा, उनकी मौजूदगी से वह असाधारण बन जाता है।
ओटीटी की दुनिया ने पंकज त्रिपाठी को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाया। अब वे सिर्फ़ बॉलीवुड तक सीमित नहीं थे, बल्कि भारत के हर घर और दुनिया भर में बसे भारतीय दर्शकों के पसंदीदा अभिनेता बन चुके थे।
मिर्ज़ापुर और क्रिमिनल जस्टिस जैसी सीरीज़ ने यह भी साबित कर दिया कि पंकज त्रिपाठी की असली ताक़त उनकी साधारणता में छुपा असाधारण अभिनय है। न चिल्लाना, न ओवर एक्टिंग – बस किरदार को जीना, और दर्शकों को यह यकीन दिलाना कि यह इंसान सच में है।यही वजह है कि ओटीटी के इस दौर में पंकज त्रिपाठी को “King of OTT” भी कहा जाने लगा।
निजी जीवन – पत्नी मृदुला और परिवार की अनकही कहानियाँ
चमक-दमक और शोर-शराबे वाली फिल्मी दुनिया में रहते हुए भी पंकज त्रिपाठी हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। उनकी इस सादगी के पीछे सबसे बड़ा सहारा रहा उनका परिवार। पंकज त्रिपाठी की पत्नी का नाम है मृदुला त्रिपाठी। दोनों की मुलाक़ात पटना में हुई थी। कॉलेज के दिनों में ही पंकज की नज़र मृदुला पर पड़ी और यहीं से उनकी कहानी शुरू हुई। यह मुलाक़ात धीरे-धीरे दोस्ती और फिर प्रेम में बदल गई। पंकज उस समय एक साधारण युवक थे, जिनके पास न तो बड़ी नौकरी थी और न ही कोई चमकदार पहचान। लेकिन उनके व्यक्तित्व, उनकी ईमानदारी और सपनों ने मृदुला को आकर्षित किया। दोनों ने अपने रिश्ते को मजबूत किया और साल 2004 में शादी कर ली।
पंकज अक्सर इंटरव्यूज़ में कहते हैं – “अगर मृदुला का साथ न होता, तो शायद मैं यहाँ तक नहीं पहुँच पाता। उन्होंने मेरे संघर्ष के दिनों में हर कदम पर मेरा साथ दिया।”शादी के शुरुआती साल बेहद कठिन थे। मुंबई में एक छोटे-से किराए के घर में दोनों रहते थे। कभी पैसों की कमी होती, तो कभी काम का अभाव। लेकिन मृदुला ने कभी शिकायत नहीं की। वे हमेशा पंकज को प्रेरित करतीं कि संघर्ष करते रहो, एक दिन सफलता ज़रूर मिलेगी।आज जब पंकज त्रिपाठी सुपरस्टार बन चुके हैं, तब भी वे अपनी पत्नी को बराबरी का श्रेय देते हैं। उनका कहना है कि घर की जिम्मेदारी और मानसिक सहारा मृदुला ने दिया, तभी वे बेझिझक अपने सपनों का पीछा कर सके।
पंकज और मृदुला की एक बेटी भी है – अदिति त्रिपाठी। वह अभी छोटी है और पढ़ाई कर रही है। पंकज का कहना है कि वे अपनी बेटी के लिए वही साधारण माहौल बनाए रखना चाहते हैं, जिसमें वह खुद पले-बढ़े। वे नहीं चाहते कि शोहरत का असर उसकी मासूमियत पर पड़े। परिवार से पंकज त्रिपाठी का रिश्ता बेहद गहरा है। वे अक्सर अपने गाँव गोल्टी जाते हैं, माता-पिता से मिलते हैं और गाँव वालों से वैसे ही बात करते हैं जैसे पहले करते थे। स्टार बनने के बाद भी उनके भीतर वह गाँव का बेटा जीवित है।
इंडस्ट्री के लोग कहते हैं कि पंकज त्रिपाठी को अगर शूटिंग से फुर्सत मिले, तो वे सबसे ज़्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना पसंद करते हैं। न पार्टियों का शौक, न ग्लैमर की चाह – बस सादा जीवन और परिवार का सुख। उनकी यही सादगी और पारिवारिक जुड़ाव दर्शकों को भी अपना सा लगता है।
पुरस्कार और मान्यता – संघर्ष से सम्मान तक का सफर
किसी भी कलाकार के लिए असली पहचान तब मिलती है, जब उसका काम केवल दर्शकों को ही नहीं, बल्कि आलोचकों और संस्थानों को भी प्रभावित करे। पंकज त्रिपाठी का सफर भी ऐसा ही रहा। छोटे-छोटे किरदारों से शुरू होकर वह मुकाम तक पहुँचे, जहाँ हर सम्मान और पुरस्कार उनका इंतज़ार करता नज़र आया।
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद इंडस्ट्री ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू किया। लेकिन असली उछाल आया ‘न्यूटन’ (2017) से। इस फिल्म में उन्होंने राजकुमार राव के साथ काम किया और एक सरकारी अफसर की भूमिका निभाई। उनके किरदार की सादगी और यथार्थ ने दर्शकों को छू लिया। यही फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर में भेजी गई। इस फिल्म के लिए पंकज त्रिपाठी को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – विशेष जूरी अवॉर्ड मिला। यह उनके करियर का पहला बड़ा राष्ट्रीय स्तर का सम्मान था, जिसने साफ़ कर दिया कि पंकज अब केवल सहायक अभिनेता नहीं रहे, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बन चुके हैं।
इसके बाद पुरस्कारों की झड़ी लग गई। फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में उन्हें बार-बार नामांकन मिला और कई बार जीत भी हासिल हुई।आईटीए अवॉर्ड्स (Indian Television Academy Awards) में उन्हें “क्रिमिनल जस्टिस” और “मिर्ज़ापुर” के लिए सम्मानित किया गया। IIFA और Zee Cine Awards जैसी बड़ी मंचों पर भी वे सराहे गए। ओटीटी की दुनिया में कदम रखते ही उन्हें “OTT का किंग” कहा जाने लगा। 2020 और 2021 में रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ ने उन्हें लगातार पुरस्कार दिलाए। खासकर “क्रिमिनल जस्टिस” में वकील माधव मिश्रा का किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि दर्शकों ने उन्हें अपना पसंदीदा बना लिया।
लेकिन पंकज त्रिपाठी की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि वे सिर्फ़ अवॉर्ड विनर ही नहीं बने, बल्कि जनता के दिलों के अभिनेता बने। सिनेमा और वेब सीरीज़ देखने वाला हर वर्ग उनके अभिनय में खुद को देखता है। जहाँ एक ओर बॉलीवुड के पारंपरिक स्टार्स अक्सर बड़े बजट और चमकदार किरदारों से पहचाने जाते हैं, वहीं पंकज त्रिपाठी को उनके किरदार की गहराई और सादगी के लिए सम्मान मिला। यही कारण है कि आज उनके नाम पर फिल्में और सीरीज़ बिकती हैं।
समाचार जगत में भी उनके पुरस्कारों की गूंज रही। कई बार उनके बारे में हेडलाइन बनी – “गोल्टी गांव का बेटा बना राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता”, “संघर्ष से सफलता तक : पंकज त्रिपाठी का सफर”।ये केवल हेडलाइन नहीं थीं, बल्कि उस कलाकार की गाथा थीं, जिसने अपने धैर्य और ईमानदारी से हर दर्शक और समीक्षक का दिल जीता।
उनकी सादगी और दर्शन – क्यों लोग उन्हें अपना मानते हैं
फिल्मी दुनिया की चमक-दमक में जहाँ अक्सर कलाकार अपने असलीपन को खो बैठते हैं, वहाँ पंकज त्रिपाठी एक अलग ही मिसाल हैं। सफलता और शोहरत की ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने अपने भीतर की सादगी को कभी नहीं छोड़ा। वे आज भी गाँव के बेटे हैं। मिट्टी की खुशबू, खेतों की याद और बचपन के अनुभव उनके जीवन का हिस्सा हैं। इंटरव्यूज़ में अक्सर कहते हैं – “मैं गाँव से निकला हूँ, लेकिन गाँव अब भी मेरे भीतर है। मेरा अभिनय भी उसी मिट्टी की उपज है।”
उनकी सादगी का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि वे फिल्मों और ओटीटी सीरीज़ में जितने विविध किरदार निभाते हैं, असल जिंदगी में उतने ही सरल रहते हैं। उन्हें पार्टियों में जाना पसंद नहीं, न ही बड़े आयोजनों में दिखावा करना। वे फुर्सत मिलते ही परिवार के साथ समय बिताना या किताबें पढ़ना पसंद करते हैं।
दर्शन के स्तर पर भी पंकज त्रिपाठी अलग सोच रखते हैं। उनका मानना है कि कला का असली मकसद सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाना भी है। वे कहते हैं- “एक्टर होना सिर्फ़ रोल निभाना नहीं है, बल्कि ज़िम्मेदारी है। जब मैं स्क्रीन पर आता हूँ, तो दर्शक सिर्फ़ किरदार नहीं देखते, वे एक विचार भी देख रहे होते हैं।”
यही वजह है कि वे अपने किरदार चुनने में बेहद सावधान रहते हैं। वे चमकदार लेकिन खोखले रोल से बचते हैं। उन्हें ऐसे किरदार पसंद हैं जिनमें इंसानियत, संवेदनशीलता और यथार्थ की झलक हो। उनका जीवन दर्शन सीधा है -“सफलता स्थायी नहीं होती। इंसान वही बड़ा होता है जो जमीन से जुड़ा रहता है।” शायद यही कारण है कि आज की पीढ़ी उन्हें सिर्फ़ अभिनेता नहीं, बल्कि एक प्रेरणा मानती है।
गाँव से निकलकर मुंबई की भीड़ तक और फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचना आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने यह सफर बिना घमंड, बिना शोर और बिना दिखावे के पूरा किया।
आज जब दर्शक उन्हें “कालेन भैया” या “माधव मिश्रा” के रूप में देखते हैं, तो लगता है कि ये किरदार हमारे आस-पास के ही लोग हैं। यही पंकज त्रिपाठी की सबसे बड़ी सफलता है- उन्होंने अभिनय को असली जीवन से जोड़ा। इसलिए ही लोग कहते हैं कि पंकज त्रिपाठी सिर्फ़ एक बड़े अभिनेता नहीं, बल्कि आम आदमी के असली हीरो हैं।
नागरिकों के जीवन में खुशहाली लाना सरकार का संकल्प : मुख्यमंत्री


