“नरक चतुर्दशी अभ्यंग स्नान: पूरी प्रक्रिया, महत्व, शुभ मुहूर्त एवं वस्त्र-नियम”
नरक चतुर्दशी, जिसे रूप चौदस भी कहा जाता है, दीपावली से एक दिन पूर्व मनाई जाती है। इस दिन दरिद्र निस्तारण और अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। वाराणसी में गंगा स्नान और लखनऊ में पुराने सूपों के दहन से कुलक्ष्मी का निष्कासन किया जाता है। तिल तेल से मालिश, अपामार्ग (चिरचिटे) की पत्तियों से स्नान और दक्षिण दिशा में दीपदान करने से पाप, दरिद्रता और अकाल मृत्यु दोष दूर होता है। यह परंपरा आरोग्य, सौंदर्य और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
- सूप दहन के साथ मनाई जाती है नरक चतुर्दशी। भोर में तिल तेल अभ्यंग,अपामार्ग स्नान और यम दीपदान से होती है दरिद्रता व अकाल मृत्यु दोष से मुक्ति।
विरासत और विस्मृति की ओर
हर वर्ष दिवाली पर्व की पूर्व संध्या पर, घर-घर दीप जलते हैं, पटाखों की गूंज सुनाई देती है, और मंदिरों में मंगलमय वातावरण छा जाता है। लेकिन इस त्योहार की शुरुआत होती है रूप चौदस या नरक चतुर्दशी से, जब सूर्य डूबने के पहले या अगले प्रात: काल में एक पवित्र रात्रि/सुबह अनुष्ठान अदा किया जाता है – जिसे हम अभ्यंग स्नान कहते हैं। यह अनुष्ठान न केवल सत्कार्य, सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक है, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है – कि हमें पहले “भीतर की अंधकार, पाप, नकारात्मकता” से मुक्त होना चाहिए फिर प्रकाश और दिव्यता को आमंत्रित करना चाहिए। आजकल यह ज्ञान और परंपरा अधिकांश लोगों तक पहुँचती कम है। इसलिए इस पूरे विषय को बारीकी से, श्रेयस्कर स्रोतों एवं लोक मान्यताओं के आधार पर प्रस्तुत किया है, ताकि यह जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके – और वे इसे सही और श्रद्धापूर्वक अपना सकें।
पौराणिक पृष्ठभूमि : कृष्ण-नरकासुर कथा
शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है कि पूर्वकाल में नरकासुर नाम का राक्षस था, जिसने पृथ्वी पर अत्याचार किया। उसने देवों और मनुष्यों को अत्यंत कष्ट दिया। अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने उस दानव का वध किया। उस युद्ध के समय या उसे बाद में, श्रीकृष्ण ने अपने शरीर पर रक्तरंजित अवशेषों को शुद्ध करने के लिए तेल स्नान किया। इस घटना से प्रेरणा लेकर, भक्तों ने उस दिन को पवित्र रूप से मनाने की परंपरा प्रारंभ की। यह दिन नरक विजय का प्रतीक माना गया, और उसी से जुड़ी पवित्र प्रक्रिया को अभ्यंग स्नान कहा गया। इस प्रकार यह अनुष्ठान अंधकार पर प्रकाश की जीत, पाप पर पवित्रता की प्राप्ति का प्रतीक बन गया। इसके साथ ही शास्त्रों में वर्णित है कि यदि कोई व्यक्ति इस दिन इस अभ्यंग स्नान को विधिपूर्वक करे, तो वह नरक भय से मुक्त हो जाता है, और आरोग्य, सौंदर्य, दीर्घायु, पापनाश के फलों की प्राप्ति होती है।
स्नान का धार्मिक महत्व
- यह स्नान चतुर्दशी तिथि में ही किया जाना चाहिए – विशेष रूप से चंद्रोदय से पूर्व, अर्थात् चतुर्दशी तिथि के रहते हुए।
- यदि चतुर्दशी तिथि सूर्योदय तक बनी हुई हो, तो वह समय श्रेष्ठ माना जाता है।
- इस स्नान में तेल अभ्यंग (पूरी देह पर तेल लगाना और मालिश करना) और उबटन / चूर्ण या जड़ी-हर्बल मिश्रण से शारीरिक शुद्धि करना शामिल है।
- स्नान के बाद दीपदान (यमदीप) करना, यमराज की तर्पण करना, दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर प्रणाम करना आदि अनुष्ठान होते हैं।
- परंपरा कहती है कि यह स्नान सभी पापों का नाश करता है, और पुण्य प्रदान करता है।
यह सब मिलकर इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान बनाते हैं, जिसे अनदेखा नहीं करना चाहिए।
मुहूर्त और तिथि-विवरण
यह महत्वपूर्ण है कि अभ्यंग स्नान उचित समय (मुहूर्त) में किया जाए, तभी उसका श्रेष्ठ फल माना जाता है।
दरिद्र निस्तारण अनुष्ठान
- समय : भोर 5:15 से 6:00 बजे के बीच
- क्रम : पुराने सूप पीटकर कुलक्ष्मी प्रतीक का निष्कासन → सूप दहन → स्नान → दीपदान
- स्नान पूर्व : तिल के तेल का अभ्यंग
- स्नान में : अपामार्ग (चिरचिटा) पत्तियों का प्रयोग
- स्नान पश्चात : दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर यमराज की पूजा
- फल : अकालमृत्यु दोष से मुक्ति, दरिद्रता निवारण, आरोग्य और सौंदर्य की प्राप्ति
इसलिए, यदि आप इस दिन अभ्यंग स्नान करना चाहते हैं, तो इन समय-सारिणियों पर विशेष ध्यान दें।
संपूर्ण प्रक्रिया – चरणबद्ध विवरण
नीचे आप पाएँगे एक विस्तृत चरणबद्ध विधि, जिसमें प्रत्येक क्रिया, मंत्र, सामग्री, और सावधानी शामिल है।
पूर्व तैयारी (स्नान से पूर्व)
1. स्वयं का प्रारंभ और संकल्प
- प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सबसे पहले उठें। यदि संभव हो, मध्यरात्रि के बाद से ही कुछ विश्राम न करें – ताकि मन शांत और शरीर ताजगी से भरा हो।
- संकल्प लें:“अस्मिन्नेव कार्तिककृष्णचतुर्दश्यां अहं तैलाभ्यंगपूर्वकं स्नानं करिष्ये, यमराजप्रसादसिद्ध्यर्थं, सर्वपापनिवारणार्थं।”
2. जल स्रोत तैयार करना
- स्नान क्षेत्र (वार्न, स्नानघर) को पूर्व रात में स्वच्छ कर लें – ताकि सुबह भाग-दौड़ न हो।
- स्नान के लिए आवश्यक सामग्री जैसे तेल, उबटन सामग्री, तौलिया, नए वस्त्र इत्यादि तैयार रखें।
3. उपयुक्त वस्त्र
स्नान के पूर्व पहनने के लिए जो वस्त्र चयन करें, उस पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि स्नान के बाद वही वस्त्र पहनना है। कुछ नियम निम्नलिखित हैं:
- वह वस्त्र साफ और हल्का होना चाहिए।
- यदि संभव हो, नया वस्त्र चुनें – क्योंकि स्नान के पश्चात नए वस्त्र पहनने की परंपरा है।
- रंग के चयन में प्रकाश, पवित्रता और बचपन वरीय करें – जैसे सफेद, हल्का पीला, हल्का गुलाबी आदि।
- वस्त्र को पूर्व रात या स्नान से पहले ही स्वच्छ कर लें और यदि संभव हो, हल्का सुगंधित धूप/धुनका लगाएँ।
- स्नान के बाद पहनने के लिए वस्त्र उसी स्थान पर तैयार रखें ताकि जल्दी से पहन सकें।
अभ्यंग (तेल-विहार / मालिश)
4. तेल का चयन और उष्णीकरण
- पारंपरिक रूप से तिल का तेल (तुलसी या तिल) सर्वोत्तम माना गया है।
- यदि उपलब्ध हो, औषधीय हर्बल तेल जैसे सौंफ, चन्दन, नीम आदि का मिश्रण प्रयोग किया जा सकता है।
- तेल को हल्का गरम कर लें (बहुत अधिक गर्म न हो) ताकि वह त्वचा पर मालिश के समय आसानी से प्रवेश करे।
5. मालिश / अभ्यंग विधि
- पूरे शरीर को धीरे-धीरे तेल लगाएँ – सिर, चेहरे, गले, कंधे, बाहु, हथेलियाँ, पेट, कमर, पैरों तक।
- मालिश करते समय हल्के हाथों से गोलाकार, ऊपर से नीचे की ओर (सिर से पांव की ओर) लें।
- विशेष ध्यान दें जोड़ों (घुटना, कोहनी, टखने) और तलुओं को।
- सिर पर तेल लगाने के बाद हल्के हाथों से मसाज करें। कुछ परंपराएँ सिर पर अपामार्ग (चिरचिरा) पत्तियों को ऊपर से नीचे चारों ओर घुमाने की बताती हैं।
- इस अवधि में मन शांत रखें, यदि संभव हो, श्लोक या मंत्र ध्यान करें।
उबटन / चूर्ण / हर्बल लेप
6. उबटन या चूर्ण चूर्ण तैयार करना
- सामान्य सामग्री: बेसन, हल्दी, चावल का चूरा, चंदन पाउडर, गुलाब जल, दही आदि।
- यदि संभव हो, हर्बल औषधियाँ (नीम, चावल के भूसे, चंदन पत्तियाँ आदि) मिलाई जा सकती हैं।
- मिश्रण इतना गाढ़ा हो कि त्वचा पर आसानी से चिपके लेकिन बहुत कठोर न हो।
7. उबटन लगाना
तेल मालिश के बाद, शरीर पर उपरोक्त उबटन / चूर्ण को धीरे-धीरे लगाएँ।
लेप को लगभग 10–20 मिनट तक सूखने दें। इस समय शांत बैठकर ध्यान करना लाभदायक है।
यदि आवश्यक हो, हल्के हाथों से हल्की मालिश करते रहें ताकि लेप और तेल मिलकर सक्रिय असर दें।
स्नान (जल से शुद्धि)
8. स्नान की विधि
- स्नान के लिए पानी हल्का गुनगुना होना चाहिए।
- यदि संभव हो, स्नान पानी में तुलसी पत्तियाँ, गुलाब पंखुड़ियाँ, या नीम पत्तियाँ डाल सकते हैं।
- पहले चतुर्दशी तिथि के चंद्रोदय समय तक इंतजार करें – यदि समय हो।
- सिर पर जल डालते समय निम्न मंत्र बोल सकते हैं:
“यमाय नमः, नमो धर्मराजाय, नमः मृत्यवे; नमः अंतकाय च नमः कालाय च।”
स्नान करते हुए यह श्लोक या मंत्र पढ़ सकते हैं:
“गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति | नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ||”
धीरे-धीरे जल डालें, ऊपर से नीचे की ओर धोएँ, और सुनिश्चित करें कि पुरे शरीर पर जल पहुँचे।
स्नान के बाद क्रियाएँ
9. दर्द्र वस्त्र परिवर्तन और मुंह ग्रहण
- स्नान तुरंत पश्चात नए या साफ कपड़े पहनें।
- यदि संभव हो, उन वस्त्रों को पहले हल्की सुगंध (अगर दी हो) या धूप-स्नान दे लें।
- नया वस्त्र पहनने का उद्देश्य है – पवित्रता, नूतनता का प्रतीक।
10. दीपदान (यमदीप) और पूजा
- दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर यमराज को प्रणाम करें।
- दीपक जलाएँ – इसे यमदीप कहा जाता है – मुख्य द्वार या घर के दक्षिण दिशा की ओर रखें।
- यमराज के तर्पण (जल अर्पण) करें और उन्हें स्मरण करें।
- बाद में, यदि समय हो, करणीय पूजा करें – भगवान कृष्ण, देवी लक्ष्मी आदि की।
- श्रीकृष्ण, देवी लक्ष्मी, यमराज की स्तुति करें और आभार व्यक्त करें।
11. प्रार्थना एवं मनोवांछित फल की कामना
- इस दिन विशेष श्लोक, मंत्र जप सकते हैं जैसे “रूपं देहि लक्ष्मी” आदि।
- मन में यह विचार करें कि अब आप अंदर से पवित्र, सौम्य, उज्जवल बनकर आगे बढ़ेंगे।
- यदि संभव हो, तर्पण (पितरों को जल अर्पण) करना भी विधिपूर्वक किया जा सकता है।
विशेष सावधानियाँ और “क्या न करें”
एक सफल और फलदायी अभ्यंग स्नान के लिए निम्न बिंदुओं का विशेष ध्यान रखें:
- स्नान बिना तेल की अभ्यंग प्रक्रिया करना प्रत्याहार माना जाता है – इस दिन ऐसा अनाचार माना जाता है।
- स्नान समय को अनियंत्रित करना – अर्थात् चतुर्दशी तिथि समाप्त हो जाने पर स्नान करना – प्रभाव कम कर देता है।
- स्नान के बाद कच्चे दाल-चावल जैसी भारी भोजन तुरंत न करना – क्योंकि मन और शरीर को शांति चाहिए।
- स्नान के बाद तुरंत झाड़ू देना, सफाई करना या अत्यधिक शारीरिक क्रिया करना नहीं चाहिए।
- यदि संभव हो, नकारात्मक भावनाएँ, क्रोध, हिंसा, नेगेटिव विचार इस दिन न लाएँ।
- घर में अराजकता, गंदगी, अव्यवस्था न हो – पूर्व रात को ही स्वच्छता बनाएँ।
- यदि स्वास्थ्य कारणों से पूरे अभ्यंग मालिश नहीं हो सके, तो सावधानीपूर्वक जितना हो सके उतना करना चाहिए।
दीपावली की रौनक के पहले दिन, अधिकांश लोग अपनी तैयारी में जुटे हैं – घर की सफाई, दीप सजावट, मिठाइयाँ – लेकिन अब भी कई लोगों के लिए “रूप चौदस अभ्यंग स्नान” एक अलक्षित अनुष्ठान है।पुराने समय से चली आ रही यह पवित्र परंपरा अब कुछ ही परिवारों तक सीमित हो गई है। इस वर्ष, धार्मिक विद्वानों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर जागरूकता बढ़ाने हेतु यह अभियान शुरू किया है – “नरक चतुर्दशी अभ्यंग स्नान: जानो, करो, जीवन पावन बनाओ”। इस स्नान में क्या महत्व है, कैसे करना है, और क्यों इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
शास्त्र एवं आधुनिक शोध, दोनों मिलकर यह बताते हैं कि यह स्नान न सिर्फ प्रतीक है, बल्कि शरीर, मन व आत्मा की शुद्धि का पथ है। हर क्रिया – चाहे वह तेल लगाना हो, उबटन से लेप करना हो, स्नान करना हो, दीपदान हो – सबका अपना महत्व और नियत है। एक वृद्ध धर्मप्रेमी बताते हैं, “जब मैं बच्चा था, हमारे घर की दीवारों पर रात भर दीप जले रहते थे और सुबह हम तेल से स्नान करते थे। लेकिन अब बच्चों को यह ज्ञान ही नहीं है।” इसी जड़ से यह प्रचार शुरू हुआ कि परंपरा को भूलने न दें।
विद्वान पंडित अजित मिश्र कहते हैं, “यदि हम इन अनुष्ठानों की विधि-सम्मत जानकारी रखें और उन्हें कर पायें, तो यह आत्मा को भी जाग्रत करता है। यह केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंदर से परिवर्तन की शुरुआत है।” “क्या आप जानते हैं कि उस वस्त्र को जिसे स्नान से पहले पहना जाता है, उसका क्या महत्व है?” स्नान से पहले का वस्त्र न केवल स्वच्छ और हल्का होना चाहिए, वह नए या सुगंधित होना चाहिए, ताकि शरीर स्नान के बाद उसी वस्त्र में पवित्रता की अनुभूति करें।
नरक चतुर्दशी अभ्यंग स्नान केवल एक धार्मिक पहलू नहीं है – यह आध्यात्मिक पुनरुत्थान, शारीरिक शुद्धि, और संस्कार का अनुशासन है। यदि विधिपूर्वक, मुहूर्त में और समझदारी से किया जाए, तो यह व्यक्ति को अंदर से अधिक मजबूत और उज्जवल बनाता है।
वाराणसी के राजघाट स्थित आदि केशव मंदिर के महंत विद्या शंकर त्रिपाठी बताते हैं कि नरक चतुर्दशी की भोर में गंगा स्नान का विशेष महत्व है। उनके अनुसार, “स्नान के बाद वस्त्र वहीं छोड़ देने चाहिए। यदि कोई गंगा तक न पहुँच सके, तो गंगाजल को घर के स्नान जल में मिलाकर स्नान करे।” शास्त्रों में उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस दिन अभ्यंग स्नान विधिपूर्वक करता है, वह नरक भय से मुक्त होकर दीर्घायु, आरोग्य और सौंदर्य के फल प्राप्त करता है। काशी में इस परंपरा को लेकर घाटों पर सुबह-सुबह स्नानार्थियों की भीड़ लगती है, वहीं घरों में महिलाएँ सूप पीटकर दरिद्र निस्तारण का यह अनुष्ठान निभाती हैं। दीपदान के साथ नरक चतुर्दशी का यह दिवस दिवाली पर्व की शुद्ध शुरुआत माना जाता है।
वाराणसी के सिद्धगिरि बाग और लखनऊ के गोमती नगर स्थित स्वयंभू ज्योतिष कार्यालय के संचालक ज्योतिर्विद रमनजी के अनुसार, नरक चतुर्दशी की भोर में दरिद्र निस्तारण अनुष्ठान किया जाता है। इसमें परिवार की महिलाएँ पुराने सूपों को पीटते हुए “कुलक्ष्मी स्वरूपा ज्येष्ठा लक्ष्मी” को प्रतीकात्मक रूप से घर-घर से बाहर निकालती हैं। इसके बाद उन सभी सूपों को चौराहे पर एकत्र कर अग्नि में समर्पित किया जाता है। यह प्रक्रिया दरिद्रता और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक मानी जाती है। अनुष्ठान के बाद स्नान का क्रम प्रारंभ होता है।
इस बार इसका मुहूर्त २० अक्टूबर की भोर में सवा पाँच से छह बजे तक निर्धारित किया गया है। स्नान से पूर्व तिल के तैल से मालिश (अभ्यंग) की जाती है। फिर जल में अपामार्ग (चिरचिटे) की पत्तियाँ डालकर स्नान करना शुभ बताया गया है। स्नान के बाद घर के दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर यमराज की पूजा की जाती है। ज्योतिर्विद रमनजी के अनुसार, “काशी में तो साक्षात् गंगा जी विद्यमान हैं, इसलिए यहाँ के लोग दरिद्र निस्तारण के बाद सीधे गंगा स्नान कर लेते हैं। स्नान उपरांत दक्षिण दिशा की ओर दीपदान और यमराज ध्यान के साथ घर लौटना शुभ माना गया है। ऐसा करने से अकालमृत्यु दोष से रक्षा होती है।”
डिस्क्लेमर: इस लेख, चित्र और सामग्री में उल्लिखित सभी धार्मिक मान्यताएँ, परंपराएँ और विधियाँ प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक संदर्भों तथा लोकविश्वास पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य केवल जनजागरण, सांस्कृतिक संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान के प्रसार हेतु है। यह सामग्री किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की धार्मिक भावना को आहत करने हेतु नहीं है। विधि-विधान और मुहूर्त क्षेत्र, परंपरा व परिवार की मान्यता के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। पाठक या दर्शक किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करने से पूर्व अपने पंडित, ज्योतिषाचार्य या स्थानीय परंपरा-विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।
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