Varanasi

मियावाकी तकनीक, 350 टन जैविक मिश्रण और 35,000 लीटर जीवामृत से मिट्टी को मिला नया जीवन

वाराणसी के डोमरी (सूजाबाद) क्षेत्र में 2.51 लाख पौधों के साथ विकसित हो रहा शहरी वन वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किया जा रहा है। मियावाकी तकनीक, 350 टन जैविक मिश्रण और हर माह 35,000 लीटर जीवामृत के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा रही है। यह परियोजना काशी को भविष्य का ‘ऑक्सीजन हब’ बनाने की दिशा में अहम कदम है।

  • काशी में तैयार हो रहा ‘ऑक्सीजन हब’: 2.51 लाख पौधों से सजे डोमरी शहरी वन की अनोखी कहानी

वाराणसी। डोमरी (सूजाबाद) क्षेत्र में विकसित हो रहा शहरी वन अब केवल पौधारोपण का आंकड़ा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रबंधन और उन्नत पारिस्थितिकी मॉडल का उदाहरण बनता जा रहा है। यहां 2.51 लाख पौधों को रोपित कर उन्हें सघन वन का रूप देने की दिशा में सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं। विशेष रूप से ‘मिट्टी रिपेयरिंग’ और जैविक पोषण की प्रक्रिया ने पर्यावरण विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है।

चार फीट गहरी खुदाई, 350 टन जैविक मिश्रण से बदली मिट्टी की सेहत

आमतौर पर अनुपजाऊ मानी जाने वाली मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए यहां चार फीट गहरी खुदाई की गई। इसके बाद 100 टन कोकोपीट और 250 टन गोबर की खाद का वैज्ञानिक मिश्रण तैयार कर मिट्टी में मिलाया गया। इस व्यापक अभियान का उद्देश्य पौधों की जड़ों को पर्याप्त पोषण और नमी प्रदान करना है, ताकि वे कम समय में सशक्त रूप से विकसित हो सकें।

मियावाकी पद्धति के विशेषज्ञ विशाल श्रीवास्तव ने बताया कि हर महीने 35,000 लीटर ‘जीवामृत’ का छिड़काव किया जा रहा है। यह प्रक्रिया पहले छह माह तक लगातार चलेगी और अगले दो वर्षों तक अंतराल पर जारी रहेगी। जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाता है, जिससे जड़ों की पकड़ गहरी और मजबूत होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वसंत ऋतु में पत्तों का झड़ना स्वाभाविक है और इसे पौधों के सूखने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

जल प्रबंधन में अपनाया गया ‘वॉटर प्रूफ’ मॉडल

गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए सिंचाई व्यवस्था को पूरी तरह सुदृढ़ बनाया गया है। परिसर में चार विशेष तालाब खोदे जाने की योजना है, जो भूजल स्तर को संतुलित रखने और आपातकालीन सिंचाई में सहायक होंगे। जल आपूर्ति के लिए दस बोरवेल स्थापित किए गए हैं।

ड्रिप (टपक) सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम का संयुक्त उपयोग कर पानी की एक-एक बूंद का समुचित उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है। इससे पानी की बचत के साथ पौधों की पत्तियों पर जमी धूल भी साफ होती रहती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित नहीं होती।

35 प्रजातियों का सघन वन, बनेगा पर्यावरणीय विरासत

इस शहरी वन में स्थानीय जलवायु के अनुकूल जामुन, आंवला, नीम और अर्जुन सहित कुल 35 प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।

राज नर्सरी की टीम, जो मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में दस लाख से अधिक पौधे लगा चुकी है, इस परियोजना का मार्गदर्शन कर रही है। सुरक्षा के लिए पांच गार्ड्स की तैनाती की गई है और भविष्य में पर्यावरण प्रेमियों के लिए योग स्थल विकसित करने की भी योजना है।

‘पेड़ नहीं, ईकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं’

विशाल श्रीवास्तव ने कहा, “मियावाकी एक प्रमाणित और सफल पद्धति है। पर्याप्त शोध इसके सकारात्मक परिणामों की पुष्टि करते हैं। हम यहां केवल पेड़ नहीं लगा रहे, बल्कि ऐसा ईकोसिस्टम बना रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा और जैव विविधता का स्थायी स्रोत बनेगा।”

डोमरी (सूजाबाद) का यह शहरी वन आने वाले वर्षों में वाराणसी के लिए ‘ऑक्सीजन हब’ के रूप में उभर सकता है। पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के संतुलन की दिशा में यह परियोजना काशी के लिए एक मील का पत्थर साबित होने की उम्मीद जगा रही है।

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