
साल 1986 में एक फिल्म आई थी “नाम”। इसमें एक गाना था, चिट्ठी आई है। पंकज उधास के इस गाने को फिल्म के दौरान जिसने सुना उसकी आंखें नम हो गईं। तब सुख-दुख के संदेशवाहन के लिए चिट्ठी ही एकमात्र जरिया थी। दरअसल कुछ चिट्ठियां होती ही थीं इतनी भावनात्मक कि लिखने वाला रोता था और पढ़ने वाला भी। बहन-भाई, पिता-पुत्र, मां-बेटी की चिट्ठियां इसी श्रेणी में आती थीं। मित्रों की चिट्ठियां उनकी खबरों के साथ हौसला भी देती थीं। तब लोग, खासकर गावों में, कम पढ़े-लिखे होते थे। लिहाजा उनकी चिट्ठियां कोई और लिखता था, बांचता था कोई और। भावनाएं मुख्य प्रेषक और प्राप्तकर्ता की होती थीं। ऐसी चिट्ठी किसी प्रेमी या प्रेमिका भी हो सकती थी। सोचिए, इसको लिखने और बांचने वाला कितना भरोसेमंद होता रहा होगा।

तब अखबारों एवं पत्रिकाओं के संपादकीय पेज के नीचे का कुछ हिस्सा पाठकों की प्रतिक्रिया का होता था। यह खासा महत्वपूर्ण होता था। इसे देखने वाला कोई जवाबदेह होता था। ढेर सारे पत्रों में से स्तरीय पत्र को छांटना, एडिट कर फाइनल करना खासा जिम्मेदारी का काम होता था। सूचना क्रांति के बाद मोबाइल के बढ़ते चलन के साथ ही व्हाट्सएप के मैसेज, मेल, ट्वीटर, कू, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने चिठ्ठियों की जगह ले ली। धीरे-धीरे उन भावनाओं की भी मौत हो गई जो 10-15 पैसे के पोस्टकार्ड, 50 से 75 पैसे के अन्तर्देशीय पत्र और एक रुपये के लिफाफे में पिरोये जाते थे। पोस्टकार्ड का प्रयोग अक्सर पढ़ाई या कमाई के सिलसिले में एक-दूसरे से दूर रहने वाले पिता-पुत्र के द्वारा होता था। कम शब्दों में जरूरी संवाद हो जाता था। संपादक के नाम पत्र में भी अधिकांश पोस्टकार्ड ही होते थे।
संदेश कुछ बड़ा है और तकाजा थोड़ी सी निजता का है तो उसके लिए अन्तर्देशीय पत्र होता था। संदेश और बड़ा है, पत्र की निजता भी बरकरार रखनी है तो बंद लिफाफे का प्रयोग होता था। जवाबी पत्र देने में अगले को आसानी हो, इसके लिए कुछ पत्रों के साथ मुकम्मल पते वाला जबाबी पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र या लिफाफे के अंदर लिफाफा भी होता था। अगर आपका पत्र कई पन्नों का है और डाक के लिफाफे में समाने की सीमा पार कर रहा है तो आपके पास स्टेशनरी की दुकान के लिफाफे का भी विकल्प होता था। ऐसे लोग डॉक टिकट खरीद कर रखते थे। लिखा, लिफाफे को सीलबंद किया और पोस्ट कर दिया। लिफाफा देखकर मजमून भांप लेने वाला मुहावरा शायद उसी समय चलन में आया हो।
कई तरह की चिट्ठियों में एक बैरंग चिट्ठी भी होती थी। इसमें पोस्ट आफिस का शुल्क पत्र पाने वाले को देना होता था। रजिस्ट्री कम लोगों के बस की बात होती थी। हां, इसके पहुंचने की गारंटी होती थी। क्योंकि इसके साथ पावती (एक्नॉलेजमेंट) भी मिलती थी। तब डाकिए का इंतजार रहता था। उसका समाज में सम्मान होता था। वह पत्र के साथ कभी-कभी मनीआर्डर भी लाता था। नौकरी का पत्र भी। तार तो बहुत इमरजेंसी में आता था। तब चिट्ठी अगर गंतव्य तक जल्दी पहुंचानी हो तो रेलवे स्टेशन पर कुछ घन्टे तक खुलने वाले आरएमएस तक जाना होता था। अक्सर यहां लंबी लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना होता था। अब तो कुरियर सेवा पूरे डाक विभाग पर भारी पड़ रही है।
चिट्ठियों के साथ गुम हुईं भावनाएं
पोस्टकार्ड एवं अन्तर्देशीय पत्र का जमाना गुजर गया। लिफाफा भी अपना होता है। टिकट चिपकाने के लिए गोद या थूक लगाने की जरूरत नहीं। सब डिजिटली हो जाता है। संदेश मोबाइल के फीचर से हो जाते हैं। पर इनमें वह भावनाएं नहीं जो पत्रों में होती थीं। चिट्ठियों के उस दौर में होली, दीवाली, दशहरा पर आने वाली ग्रीटिंग्स बहुत सीमित होती थी। जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर शुभकामनाएं नहीं ही आती थीं। नया साल इसका अपवाद था। 5, 10, 25 और 50 पैसे के सिक्कों साथ ही गुम हो गए पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र और लिफाफे।



