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लोन मोरेटोरियम : सुप्रीम कोर्ट का बैंकों के पक्ष में फैसला , अवधि बढ़ाने से किया मना

फैसले से कई सेक्टर को लगा झटका

लोन मोरेटोरियम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आदेश दिया कि ब्याज पर कोई ब्याज, चक्रवृद्धि ब्याज या दंड ब्याज उधारकर्ताओं से नहीं लिया जाएगा, चाहे जो भी राशि हो। मोरेटोरियम पीरियड के दौरान और इस तरह की कोई भी राशि अगर पहले से ही चार्ज की गई है तो वापस कर दी जाएगी। कोर्ट ने लोन मोरेटोरियम मामले में आदेश देते हुए कहा कि वह इस विषय पर कोर्ट को सरकार की पॉलिसी पर कोई भी निर्देश नहीं देना चाहिए। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि शीर्ष न्यायालय केंद्र की राजकोषीय नीति संबंधी फैसले की न्यायिक समीक्षा तब तक नहीं कर सकता है, जब तक कि यह दुर्भावनापूर्ण और मनमाना न हो। कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर पिछले साल लोन मोरेटोरियम की घोषणा की गई थी।

यह एक नीतिगत निर्णय है: शीर्ष न्यायालय

शीर्ष न्यायालय ने 31 अगस्त 2020 से आगे लोन मोरेटोरियम का विस्तार नहीं करने के केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह एक नीतिगत निर्णय है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वह पूरे देश को प्रभावित करने वाली महामारी के दौरान राहत देने के संबंध में प्राथमिकताओं को तय करने के सरकार के फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इस ऑर्डर को पढ़ते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार को आर्थिक फैसले लेने का अधिकार है, क्योंकि इस महामारी के चलते सरकार को भी आर्थिक नुकसान हुआ है। इस मसले पर दायर तमाम याचिकाओं में की गई अन्य मांगों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह नीतिगत मामला है और अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

ब्याज पर ब्याज का मामला

उच्चतम न्यायालय ने बैंकों द्वारा कर्जदारों से ब्याज पर ब्याज की वसूली पर रोक का आग्रह करने वाली विभिन्न याचिकाओं पर भी आज फैसला सुनाया है। रिजर्व बैंक द्वारा कोविड-19 महामारी के मद्देनजर ऋण की किस्तों के भुगतान पर रोक की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। बैंकों ने इस सुविधा का लाभ लेने वाले ग्राहकों से ऋण की मासिक किस्तों (EMI) के ब्याज पर ब्याज वसूला जिसे लोन मोरेटोरियम का फायदा उठाने वाले लोगों ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

कोर्ट में केंद्र, आरबीआई और वित्त मंत्रालय ने दिये ये जवाब

भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय में अलग-अलग हलफनामे देकर कहा कि बैंक, वित्तीय संस्थान और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफसी) पांच नवंबर तक पात्र कर्जदारों के खातों में चक्रवृद्धि और साधारण ब्याज के अंतर के बराबर राशि डालेंगे। बैंकों ने इसे ग्राहकों के खाते में डाल दिया है और एसएमएस के जरिये ग्राहकों को इस बारे में जानकारी भी दी गई। 2 करोड़ तक के कर्ज पर चक्रवृद्धि ब्याज और साधारण ब्याज के बीच का वसूला गया अंतर 5 नवंबर तक कर्जदारों के खातों में वापस किया जा चुका है।

नहीं वसूला जाएगा कम्पाउंडिंग इंट्रेस्ट

फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वो आम जनता की सेहत, शिक्षा, आर्थिक स्थिति आदि पर ध्यान देते हुए बेहतर से बेहतर नीति बनाए। कोर्ट आर्थिक मामलों का विशेषज्ञ नहीं है। एक बड़ी बात है कि किसी को भी लोन मोरेटोरियम अवधि के लिए किसी को भी ब्याज पर ब्याज नहीं वसूला जाएगा।

ब्याज माफी से 6 लाख करोड़ का होगा नुकसान

आरबीआई और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने 16 दिसंबर, 2020 को अपनी पिछली सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत से वित्तीय सहायता मांगने वाली याचिकाओं पर कोई और आदेश पारित नहीं करने का आग्रह किया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने ब्याज माफी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को चेताया भी था। सरकार ने कहा था कि यदि सभी प्रकार के लोन पर ब्याज छूट दी जाती है, तो माफ की गई राशि 6 लाख करोड़ रुपए से अधिक होगी। इस कारण ब्याज माफी पर विचार नहीं किया गया। यह बैंकों के शुद्ध मूल्य का एक बड़ा हिस्सा समाप्त कर देगा और बैंकों के अस्तित्व के लिए गंभीर सवाल पैदा कर देगा। सरकार ने कहा था कि अकेले SBI में ब्याज माफी बैंक के शुद्ध मूल्य का आधा हिस्सा मिटा देगी।

क्या है मामला

25 मार्च को भारत में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। इसके बाद कोरोना काल में भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज देने वाली संस्थाओं को लोन के भुगतान पर मोरेटोरियम की सुविधा देने के लिए कहा था। ये सुविधा पहले 1 मार्च 2020 से 31 मई 2020 के बीच दिए गए लोन पर दी जा रही थी, जिसके बाद इसे 31 अगस्त 2020 तक बढ़ा दिया गया था। बाद में रिजर्व बैंक ने बाकी सभी बैंकों को एक बार लोन रीस्ट्रक्चर करने की इजाजत दी, वो भी उस कर्ज को बिना एनपीए में डाले, जिससे कंपनियों और इंडिविजुअल्स को कोरोना महामारी के दौरान वित्तीय परेशानियों से लड़ने में मदद मिल सके। इस लोन रीस्ट्रक्चरिंग के लिए सिर्फ वही कंपनियां या इंडिविजुअल योग्य थे, जिनके खाते 1 मार्च 2020 तक 30 दिन से अधिक डिफॉल्ट स्टेटस में नहीं रहे हों।

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