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कांग्रेस में अंदरूनी कलह साल 2021 में नेतृत्व के लिए सिरदर्द बनी रही

देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस के लिए 2021 की शुरुआत बड़े नेताओं के छिटकने, केरल में सत्ता गंवाने और अंतर्कलह की राजनीति से हुई और साल के अंत में भी पार्टी में नेतृत्व का मुद्दा, नेताओं के बीच कलह और कुछ बड़े नेताओं की नाराजगी जैसे कई मुद्दे अनुत्तरित सवालों की तरह तैर रहे हैं।इतिहास के पन्नों में बंद होने जा रहे वर्ष 2021 में सुष्मिता देव, अमरेंदर सिंह, जतिन प्रसाद, पीसी चाको जैसे कांग्रेस से लम्बे समय से जुड़े रहे कई प्रमुख नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस छोड़ी। साल का अंत होते होते इसी तरह का सवाल वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने भी खड़ा कर दिया है।

राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष पद पर नहीं रहते हुए भी कांग्रेस के सांगठनिक मामलों में निर्णकर्ता की भूमिका में दिखते हैं। छत्तीसगढ में भूपेश बघेल को लेकर चली कसरत और पंजाब में अमरेंदर सिहं को हटाए जाने के घटनाक्रमों से साफ है कि कांग्रेस की सरकार वाले राज्यों में मुख्यमंत्रियों को हटाने-बिठाने से लेकर हर समस्या के समाधान की राह 10 जनपथ नहीं बल्कि 12 तुगलक लेन से गुजरती है।साल 2021 के पूर्वार्ध में हुए विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका केरल ने दिया जहां की वायनाड लोक सभा सीट का प्रतिनिधित्व राहुल गांधी कर रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) ने केरल में सत्ता छीनने के लिए चुनाव लड़ा था पर नतीजे आने पर पार्टी के लिए सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गयी है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने वामपंथियों के साथ गठबंधन किया पर इस गठबंधन के पैर तले की पूरी जमीन खिसक गई। हालांकि हाल में हुए लोकसभा के उपचुनावों में पार्टी ने हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में अच्छा प्रदर्शन किया।कांग्रेस पार्टी को तमिलनाडु के चुनाव में मुस्काने का अवसर जरूर मिला लेकिन विश्लेषकों ने इसका अधिक श्रेय द्रमुक के साथ उसके गठबंधन को दिया। कांग्रेस को असम विधान सभा चुनाव में आल इंडिया यूनाइटेड डेमॉक्रेटिक फ्रंट ( एआईयूडीएफ )के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के साथ समझौता किया जिससे वहां भी पार्टी की छवि को नुकसान हुआ।कांग्रेस में अंदरूनी कलह साल 2021 में नेतृत्व के लिए सिरदर्द बनी रही।

पार्टी के अंदर जी-23 के नाम से चर्चित वरिष्ठ नेताओं के समूह के दबाव में पार्टी को दो बार अपनी सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था कांग्रेस कार्य समिति की बैठक आयोजित करनी पड़ी।वर्ष के दौरान पार्टी के कई दिग्गज संगठन से अलग हो गये। इधर पार्टी की चिंतित निगाह समूह 23 के नेता गुलाम नबी आजाद पर है जो जम्मू कश्मीर में ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं। वह पार्टी आलाकमान को संगठनात्मक चुनाव के जरिए नया नेता चुने जाने को लेकर पत्र लिख चुके हैं।साल 2021 में न सिर्फ कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल तेज हुआ बल्कि पंजाब में मुख्यमंत्री बदलने के लिए राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी ने जो भूमिका निभाई उससे सोनिया गांधी की पार्टी पर पकड़ को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

वर्ष के दौरान छत्तीसगढ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टी एस सिंहदेव खेमे के बीच खींच-तान का मामला बार बार दिल्ली दरबार पहुंचता रहा। राजस्थान में भी मुख्यमंत्री अशोक गहलाेत तथा युवा नेता सचिन पायलट के बीच सत्ता को लेकर तकरार बनी रही और मामला बार बार दिल्ली पहुंचा। गललोत और पायलट की सियासी रस्साकशी के बीच राजस्थान मंत्रिपरिषद का नवंबर के दूसरे पखवाड़े में पुनर्गठन करना पड़ा।इस साल कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा नुकसान पुराने नेताओं का उससे छिटकने का रहा है। कूटनीति के धुरंधर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 18 सितंबर को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से अचानक इस्तीफा देकर सबको चौंकाते हुए 2 नवंबर को कहा “सोनिया गांधी के बच्चों राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के आचरण से आहत होकर कांग्रेस से इस्तीफा दिया।” अब उन्होंने ‘पंजाब लोक कांग्रेस’ नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली है।

महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहते हुए सुष्मिता देव तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। वह असम के सिलचर से लोकसभा सदस्य रही हैं और अब तृणमूल कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य हैं। सुष्मिता देव ने 15 अगस्त को सोनिया गांधी को इस्तीफा दिया। केरल से वरिष्ठ नेता पीसी चाको ने आजीवन कांग्रेस की सेवा की लेकिन नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए वह 10 मार्च को कांग्रेस छोड़कर चले गये।कांग्रेस को इस साल बड़ा झटका देने का काम उत्तर प्रदेश कांग्रेस के युवा नेता जितिन प्रसाद ने भी किया जो 9 जून को कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये। खुद जितिन प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस से उनका संबंध तीन पीढ़ियों का रहा है लेकिन कुछ वर्षों से उनमें कांग्रेस नेतृत्व की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ही कांग्रेस को 2 अक्टूबर एक और तगड़ा झटका लगा जब एक शताब्दी से कांग्रेस और गांधी परिवार के करीबी रहे कमलापति त्रिपाठी के परिवार की चौथी पीढ़ी की बागडोर संभाल रहे कांग्रेस के बड़े नेता तथा पूर्व विधायक ललितेशपति त्रिपाठी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इसी तरह से कांग्रेस के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाली अदिति सिंह साल 2017 में रायबरेली सदर से कांग्रेस विधायक बनी लेकिन नवंबर 2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।इधर साल के आखिर में भी कांग्रेस को इसी तरह का झटका लगा जब पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल करते हुए उसके प्रति असंतोष व्यक्त किया और राजनीति से संन्यास लेने की बात की है। इससे साल के जाते जाते कांग्रेस में खलबली मच गई है और इससे साबित होता है कि पार्टी के लिए साल की शुरुआत जिन सवालों के साथ हुई वे साल के आखिर तक जस के तस बने हैं।

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