इंदिरा एकादशी 2025 : पितृ शांति का महापर्व, 17 सितम्बर को रखा जाएगा व्रत
हरिवासर के बाद पारण का विधान, पूजा में राहुकाल से बचना आवश्यक
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी इस वर्ष बुधवार, 17 सितम्बर को मनाई जाएगी। यह तिथि पितृ पक्ष में आने के कारण विशेष महत्व रखती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से उपवास रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से पूर्वजों की आत्माओं को शांति मिलती है तथा पापों का नाश होता है। पंचांग अनुसार व्रत की शुरुआत 16 सितम्बर को दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से होगी और समाप्ति 17 सितम्बर की सुबह 10 बजकर 22 मिनट पर होगी।
व्रतीजनों के लिए सबसे अहम विषय पारण का समय है। शास्त्रों में उल्लेख है कि एकादशी व्रत का पारण कभी भी *हरिवासर* से पहले नहीं किया जाता। हरिवासर का अर्थ है द्वादशी तिथि का वह कालखंड जब एकादशी की ऊर्जा समाप्त हो जाती है। इस वर्ष पारण का उपयुक्त समय 18 सितम्बर को सुबह 6 बजकर 6 मिनट से 8 बजकर 28 मिनट तक निर्धारित है। इस समय के बाद ही व्रत खोला जाना चाहिए।
पूजा-विधान के लिए राहुकाल से बचना आवश्यक है। 17 सितम्बर को वाराणसी सहित उत्तर भारत के पंचांग के अनुसार राहुकाल सुबह 10 बजकर 30 मिनट से दोपहर 12 बजे तक रहेगा। इस दौरान कोई भी मांगलिक या धार्मिक कार्य नहीं करना चाहिए। पूजा, तर्पण और श्राद्ध कर्म सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त में ही किए जाने चाहिए।
इंदिरा एकादशी की कथा के अनुसार सत्ययुग में इंद्रसेन नामक राजा अपने पिता की आत्मा को यमलोक में कष्ट भोगते देख व्यथित हुए। ऋषि नारद ने उन्हें इंदिरा एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। राजा ने विधिपूर्वक उपवास, भगवान विष्णु की पूजा और पितरों का श्राद्ध किया। इससे उनके पिता को मुक्ति मिली और वे स्वर्गलोक पहुंचे। तभी से इस व्रत को पितृ-शांति और मोक्ष का साधन माना जाता है।
व्रती इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर व्रत संकल्प लेते हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम का पूजन तुलसी पत्र, पुष्प, धूप-दीप और नैवेद्य से किया जाता है। पूरे दिन उपवास रखा जाता है और रात्रि में एकादशी माता की आरती कर भजन-कीर्तन किया जाता है। अगली सुबह हरिवासर के पश्चात पारण कर व्रत संपन्न किया जाता है।
दान का इस दिन विशेष महत्व है। मान्यता है कि अन्न, वस्त्र, गौसेवा और तुलसी का दान करने से पितरों की आत्माएँ प्रसन्न होती हैं। संयोगवश इस वर्ष इंदिरा एकादशी के दिन षडिषति संक्रांति भी पड़ रही है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस काल में स्नान, जप और दान करने से कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन जौ, चावल, वस्त्र और हरी वस्तुओं का दान विशेष फलदायी माना गया है।
इंदिरा एकादशी का व्रत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व भक्ति, संयम और पूर्वजों की स्मृति का प्रतीक है। पितृ-पक्ष के इस महाव्रत से परिवार में सुख-शांति आती है और आत्मा को अद्भुत संतोष की अनुभूति होती है।
आदिकेशव मंदिर : काशी में एकादशी दर्शन का अनोखा महत्व
घाट पर स्थित आदिकेशव मंदिर को काशी के प्राचीनतम वैष्णव तीर्थों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर में प्रत्येक एकादशी पर दर्शन और पूजन का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु के आदिकेशव स्वरूप की आराधना करने के लिए इस दिन हजारों भक्त स्नान-दान और उपवास के साथ यहाँ पहुँचते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने काशी में आदिकेशव रूप में अवतरण किया और यहीं निवास किया। यही कारण है कि एकादशी के दिन यहाँ दर्शन करना व्रत की पूर्णता के लिए आवश्यक माना गया है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि आदिकेशव के दर्शन के बिना एकादशी उपवास अधूरा रह जाता है।
घाट पर स्नान कर आदिकेशव के दर्शन करने वाला भक्त वैकुंठ धाम का अधिकारी बनता है। इसी कारण पितृ पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि, जैसे इंदिरा एकादशी, के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। मान्यता है कि इस दिन आदिकेशव के पूजन से पितरों की आत्माओं को शांति और मुक्ति प्राप्त होती है। एकादशी के दिन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। मंगला आरती के बाद पूरे दिन भजन-कीर्तन और विष्णु सहस्रनाम का पाठ चलता रहता है। भक्त तुलसी पत्र और पुष्प अर्पित कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और संध्या काल में दीपदान कर व्रत का समापन करते हैं।
आस्था और श्रद्धा के इस संगम ने आदिकेशव मंदिर को वाराणसी की धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। एकादशी की तिथि आते ही यहाँ गंगा स्नान, पितृ तर्पण और विष्णु पूजन का अनोखा संगम देखने को मिलता है। यही कारण है कि काशीवासियों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आदिकेशव मंदिर एकादशी व्रत की पूर्णता का प्रतीक बन चुका है।
आदिकेशव घाट पर पिंडदान से मिलता है 21 पीढ़ियों को मोक्ष
आदिकेशव मंदिर के पुजारी पं. विद्या शंकर त्रिपाठी ने बताया कि काशी के उत्तर छोर पर स्थित आदिकेशव घाट पर पिंडदान करने मात्र से व्यक्ति की 21 पीढ़ियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि यहां किया गया श्राद्ध और तर्पण भगवान विष्णु को प्रिय होता है और इससे परिवार पर सदैव विष्णु का आशीर्वाद बना रहता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस पुण्य कार्य से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
पंडित त्रिपाठी ने कहा कि काशी में चार प्रमुख तीर्थ माने गए हैं—संगम तीर्थ, सांमेश्वर तीर्थ, विष्णुपदोतक तीर्थ और क्षीरसागर तीर्थ। इसके साथ ही काशी में पंचतीर्थ स्नान की परंपरा भी प्रचलित है। इसमें दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट, अस्सी घाट और आदिकेशव घाट शामिल हैं। मान्यता है कि इन पांच घाटों पर स्नान करने से चार धाम की यात्रा का फल प्राप्त होता है।उन्होंने बताया कि कार्तिक और वैशाख मास में यहां स्नान और दान का विशेष महत्व होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु काशी पहुंचकर स्नान, दान और पिंडदान करते हैं।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार सतयुग में महिष्मति नामक नगरी पर इंद्रसेन नामक राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत धार्मिक और न्यायप्रिय शासक थे। एक दिन जब वे राजदरबार में बैठे थे, तब देवर्षि नारद वहाँ पधारे। राजा ने उनका विधिपूर्वक स्वागत किया। नारदजी ने कहा – “राजन! तुम्हारे पिता की आत्मा यमलोक में दुःख भोग रही है क्योंकि उन्होंने जीवन में कुछ पाप किए थे और श्राद्ध-कर्म भी पूर्ण रूप से नहीं हो पाए।”
राजा यह सुनकर व्यथित हो गए और अपने पिता की मुक्ति का उपाय पूछा। तब नारदजी ने कहा – “भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे इंदिरा एकादशी कहते हैं, उसका व्रत करो। इस व्रत से न केवल तुम्हारे पितर को मुक्ति मिलेगी, बल्कि तुम्हें भी अपार पुण्य प्राप्त होगा।”
नारदजी ने व्रत की विधि बताते हुए कहा – “इस दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करो, उपवास रखो और पितरों के लिए तर्पण तथा दान करो। रात्रि में जागरण कर श्रीहरि का भजन करो। द्वादशी के दिन हरिवासर के पश्चात पारण करो और ब्राह्मणों को भोजन एवं दान दो।”
राजा इंद्रसेन ने विधिपूर्वक व्रत का पालन किया। परिणामस्वरूप उनके पिता की आत्मा को यमलोक से मुक्ति मिली और वे स्वर्गलोक पहुँच गए। स्वयं राजा को भी विष्णु लोक की प्राप्ति हुई। तभी से यह व्रत विशेषकर पितृ-पक्ष में पूर्वजों की शांति और मोक्ष के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
एकादशी माता की आरती
ॐ जय एकादशी माता, जय जय विष्णु प्रिया।
पाप काटकर पुण्य बढ़ाओ, सुख संपत्ति दिया।। ॐ जय…
सत्य, शांति, धर्म की दाता, भक्तों का उद्धार।
तेरी महिमा अपरंपार है, जग में सदा अपार।। ॐ जय…
भक्तों की तू लाज बचाती, संकट हारती।
जो कोई श्रद्धा से गाए, कष्ट निवारती।। ॐ जय…
अन्न, धन और सुख संपत्ति सब, तुझसे ही मिलते।
दीन, दुखी, दरिद्र जनों के, जीवन बदलते।। ॐ जय…
राजा इंद्रसेन को भी तू, पितृ-मुक्ति दिलाई।
विष्णु भक्त के व्रत-संकल्प की, रक्षा तूने पाई।। ॐ जय…
द्वादशी के दिन पारण करके, व्रत होता पूरा।
सुख-शांति, सौभाग्य, समृद्धि, मिलता है भरपूरा।। ॐ जय…
आरती का समापन:
आरती के अंत में “ॐ जय एकादशी माता” दोहराते हुए पुष्पांजलि अर्पित करें और प्रसाद बाँटें।
डिस्क्लेमर :यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और सामाजिक परंपराओं पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करने से पहले अपने पारिवारिक पुरोहित, स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य से परामर्श अवश्य लें। वैज्ञानिक पहलुओं का उल्लेख शोध और सामाजिक दृष्टि पर आधारित है।
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