संगीत, दर्शन और स्थानीय जीवन के संगम से कैसे जीवित होती है काशी की आत्मा
महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल वाराणसी की आत्मा को केवल दिखाता नहीं, उसे महसूस कराता है। गंगा घाटों पर प्रभात-संगीत, कबीर के विचारों पर संवाद, ध्रुपद और बनारस घराने की प्रस्तुति, तथा स्थानीय कलाकारों की सहभागिता-ये सब मिलकर काशी को एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बनाते हैं। पर्यावरण-सम्मान और समुदाय की भागीदारी के साथ यह उत्सव वाराणसी को वैश्विक सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में स्थापित करता है।
वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक सतत प्रवाह है-जहाँ समय रुकता नहीं, बल्कि साधना करता है। गंगा के घाटों पर उतरती सुबह की रोशनी, मंदिरों की घंटियों में घुली प्रार्थना और गलियों में बहती लोक-स्मृतियाँ-यही काशी की पहचान है। इसी जीवित विरासत को शब्द, स्वर और संवेदना के साथ सामने लाता है महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल।
यह उत्सव वाराणसी को किसी पर्यटन पोस्टर की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक ब्रह्मांड के रूप में प्रस्तुत करता है। घाटों पर होने वाला प्रभात-संगीत, कबीर के विचारों पर केंद्रित गहन संवाद, और शहर की गलियों में होने वाले आध्यात्मिक भ्रमण-ये सभी मिलकर उस काशी का अनुभव कराते हैं, जहाँ आस्था और दैनिक जीवन के बीच कोई दीवार नहीं।
इतिहास और वर्तमान का सजीव संगम
काशी के घाट केवल स्थापत्य नहीं, स्मृतियों के भंडार हैं। महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल के हर कार्यक्रम को इन्हीं ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भों में रचा जाता है। नदी की लहरें, पत्थरों की सीढ़ियाँ और सुबह का उजास-ये सब मंच का हिस्सा बन जाते हैं। हेरिटेज वॉक के माध्यम से आगंतुक यह समझ पाते हैं कि कैसे ये घाट सदियों से शहर की सांस्कृतिक दिशा तय करते आए हैं।
संगीत में रची-बसी काशी
ध्रुपद की ध्यानपूर्ण गंभीरता हो या बनारस घराने की विशिष्ट छाप-यह उत्सव काशी की संगीत परंपरा को उसकी पूरी गरिमा के साथ सामने लाता है। वे कलाकार आमंत्रित किए जाते हैं जिनके स्वर इस शहर की साँसों में पले-बढ़े हैं। कबीर की कविता के साथ शास्त्रीय, लोक और समकालीन स्वरों का संवाद-परंपरा को सम्मान देता है और उसे आज के श्रोता के लिए जीवंत बनाता है।
स्थानीय कलाकार और शिल्प: उत्सव की आत्मा
बनारस के लोकगायक, बुनकर, कथावाचक और शिल्पी-ये केवल प्रतिभागी नहीं, उत्सव की आत्मा हैं। उनके गीतों, करघों और कथाओं में कबीर आज भी जीवित हैं। महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल उनकी आवाज़ को मंच देता है, सम्मान देता है और शहर की जीवित सांस्कृतिक स्मृति को सहेजता है।
पर्यावरण, सुरक्षा और पवित्रता का संकल्प
नदी तट पर आयोजित कार्यक्रमों में सुरक्षा और स्वच्छता सर्वोपरि रहती है। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से दूरी, कचरा प्रबंधन और स्थिरता से जुड़े साझेदारों के साथ सहयोग-यह सुनिश्चित करता है कि घाट उतने ही पवित्र और स्वच्छ रहें, जितने पाए गए थे, बल्कि उससे भी बेहतर।
खान-पान, हस्तशिल्प और रोज़मर्रा की काशी
यह उत्सव केवल मंच तक सीमित नहीं। बनारसी साड़ियाँ, हस्तशिल्प और स्थानीय भोजन-ये सब काशी की पहचान के अभिन्न अंग हैं। उत्सव आगंतुकों को शहर के असली अनुभव की ओर ले जाता है-छोटे भोजनालयों, बुनकरों और कारीगरों तक-ताकि पारंपरिक आजीविकाएँ सशक्त हों।
समुदाय की धड़कन में धड़कता उत्सव
महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल शहर से अलग होकर नहीं, शहर के साथ जीता है। स्थानीय निवासियों की भागीदारी-कलाकार, मार्गदर्शक और कथाकार के रूप में-इसे एक खुला, सहभागी और जीवंत अनुभव बनाती है।
पर्यटन से आगे: एक गहरी सांस्कृतिक यात्रा
यह उत्सव उन यात्रियों को बुलाता है जो केवल देखने नहीं, समझने आते हैं। विचार, संगीत और जीवित परंपराओं के माध्यम से वाराणसी को महसूस करने का अवसर देता है। यही कारण है कि यह शहर में ठहराव बढ़ाता है और काशी को एक वैश्विक सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में और सुदृढ़ करता है।
महिंद्रा कबीरा फ़ेस्टिवल, दरअसल, एक उत्सव से अधिक है-यह काशी की आत्मा से संवाद है। जहाँ कबीर आज भी कहते हैं, और काशी आज भी सुनती है।
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