
गोरखपुर शहर विधानसभा-भाजपा के दम के आगे बेदम विपक्ष यहां बेमन से चुनाव लड़ता है
यहां विपक्ष को नहीं मिलते प्रत्याशी,लिहाजा हर बार देते हैं नया चेहरा.गत तीन चुनावों में सपा, बसपा व कांग्रेस ने हर बार नए नाम पर लगाया दांव.औसतन 50 फीसद से अधिक मतों पर रहा भाजपा का कब्जा.
- गिरीश पांडेय
गोरखपुर । गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र। भाजपा का अभेद्य दुर्ग। तीन दशक से अधिक हो गए इस दुर्ग को कोई भेद नहीं पाया। यही वजह है कि भाजपा के दम के आगे यहां विपक्ष बेमन से लड़ता है। हर बार हर दल से अमूमन कोई नया चेहरा होता है। लड़ने वालों की अमूमन जमानत भी जब्त हो जाती है। अजेय मानी जाने वाली इस सीट से खुद 2022 के चुनाव में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उम्मीदवार हैं। लिहाजा देश-दुनिया में यह सीट सुर्खियों में है।
मालूम हो कि सांसद के रूप में योगी लोकसभा चुनावों में इस विधानसभा क्षेत्र में अजेय रहे हैं तो विधायक के चुनाव में भी उनकी ही प्रतिष्ठा कसौटी पर रहती रही है। हर चुनाव में वह इस पर खरे भी उतरे हैं। नतीजों से वाकिफ लड़ाने और लड़ने वाले बेमन से ही चुनाव लड़ते हैं। यही वजह रही है कि प्रमुख विपक्षी दल सपा, बसपा व कांग्रेस इस सीट पर पुराने प्रत्याशी को दोबारा चुनाव मैदान में उतारने की हिम्मत जुटाने की बजाय नए नामों पर प्रयोग करते रहे हैं। हालांकि बदले चेहरे भी अपने दलों की दाल इस विधानसभा क्षेत्र में नहीं गला पाते हैं।
शहर विधानसभा क्षेत्र -मुख्यमंत्री के विधानसभा चुनाव लड़ने से सुर्खियों में है गोरखपुर शहर की सीट
गत तीन विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने औसतन 50 फीसद से अधिक मतों पर अकेले कब्जा जमाया है। उसके मुकाबले विपक्ष का निकटतम प्रत्याशी एक तिहाई मतों का आंकड़ा भी छू नहीं पाया है। अब जबकि सीएम योगी अपने पांच साल के कार्यकाल का लेखाजोखा लेकर खुद चुनाव मैदान में हैं, विपक्ष के सामने पुराने आंकड़ों को मात देना किसी करिश्मे जैसा ही होगा। पिछले तीन विधानसभा चुनावों (2007 से 2017 तक) के आंकड़ों की पड़ताल करें तो गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने डॉ राधामोहन दास अग्रवाल को टिकट दिया और हर बार उन्होंने जीत हासिल की।
जबकि वर्ष 2007 में समाजवादी पार्टी ने भानु प्रकाश मिश्र को, बहुजन समाज पार्टी ने विनोद उपाध्याय और कांग्रेस ने सिद्धार्थ प्रिय श्रीवास्तव को प्रत्याशी बनाया था। परिणाम मुफीद नहीं आया तो इसके पांच साल बाद हुए चुनाव में इन तीनों दलों ने प्रत्याशी बदल दिए। 2012 के चुनाव में सपा ने राजकुमारी देवी, बसपा ने देवेश चंद श्रीवास्तव और कांग्रेस ने नरेंद्र मणि उर्फ कदम तिवारी को उम्मीदवार बनाकर अपने लिए उम्मीद जगाई। बदले प्रत्याशी इन पार्टियों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।
नतीजा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में भी भाजपा का गढ़ ध्वस्त करने की जिम्मेदारी नए या बदले प्रत्याशियों को दी गई। पिछले चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन हुआ था। गोरखपुर शहर की सीट पर साझा उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस के राणा राहुल सिंह को आजमाया गया जबकि बसपा ने भी नए प्रत्याशी जनार्दन चौधरी पर दांव खेला। इस बार भी चुनाव परिणाम का रंग भगवा ही बना रहा।
इन चुनावों के परिणाम की मतों के आईने में विश्लेषण करें तो 2007 में भाजपा को 54.76 प्रतिशत, 2012 में 49.12 प्रतिशत और 2017 में 58.85 प्रतिशत यानी कि औसतन 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त हुए। जबकि 2007 में सपा को 30.09, बसपा को 6.17 व कांग्रेस को 3.69 प्रतिशत वोट ही मिल सके। 2012 के चुनाव में सपा को 20.19, बसपा को 14.43 व कांग्रेस को 6.77 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा। 2017 के चुनाव में सपा से गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को 28.10 प्रतिशत मत ही हासिल हुआ। जबकि बसपा का मत प्रतिशत 11.10 तक ही सिमट गया।
भगवा गढ़ में सेनापति खुद मैदान में
भगवा गढ़ समझे जाने वाले गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में इस बार सेनापति यानी मुख्यमंत्री खुद चुनाव मैदान में हैं। उनसे सियासी मोर्चा लेने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस नेतृत्व अभी किसी नाम पर निर्णय नहीं ले सके हैं। अलबत्ता, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण का नाम आजाद समाज पार्टी से प्रत्याशी के रूप में सामने आ चुका है। योगी का सामना करने के लिए उनके सामने सबसे पहली चुनौती शहर सीट के सियासी इतिहास और भूगोल को समझने की होगी। कभी इस सीट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके शहर के प्रतिषिठत व्यापारी प्रमोद टेकरीवाल का कहना है कि योगीजी मैदान में आने से यहां का चुनाव सिर्फ औपचारिक्ता भर रह गया है। बतौर गोरक्षपीठाधीश्वर वह हम सबके अभिभावक हैं। भला अभिभावक को चुना जाता है।



